मैं ने आवाज़ दी और हिसार-ए-रिफ़ाक़त में उस को बुलाया मगर वो न आया गुल-ए-ख़्वाब की पतियाँ धूप की गर्म राहत में गुम थीं मिरे जिस्म पर नर्म बारिश की बूँदें भी घोड़े का सुम थीं ज़मीं एक अम्बोह-ए-हिज्राँ में उस चाप की मुंतज़िर थी जो ला-इल्म फैलाव में मुंतशिर थी परिंदे सुबुक रेशमीं टहनियाँ अपनी मिंक़ार में थाम कर उड़ रहे थे नशेब-ए-जुनूँ की तरफ़ पानियों की तरह मेरे साए बहे थे कफ़-ए-चश्म पर मैं ने उस के लिए शहर-ए-गिर्या सजाया मगर वो न आया किसी सम्त से उस की आहट न आई बहुत देर तक रात के सर्द-ख़ाने में इक आग मैं ने जलाई कहीं दूर से कोई बे-अंत महरूम आवाज़ आई जुदाई जुदाई तो फिर मैं ने उस के लिए धुँद हमवार की रस्ता-ए-नौ बनाया मगर वो न आया
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
Faiz Ahmad Faiz
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं
Tehzeeb Hafi
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कैसी मख़्लूक़ थी आग में उस का घर था अलाव की हिद्दत में मव्वाज लहरों को अपने बदन की मलाहत में महसूस करती थी लेकिन वो अंदर से अपने ही पानी से डरती थी कितने ही उश्शाक़ अपनी जवानी में पानी में इक सानिया उस को छूने की ख़्वाहिश में नीचे उमुक़ में बहुत नीचे उतरे मगर फिर न उभरे समुंदर ने मंथन से उन के वजूदों को ज़म कर लिया दूधिया झाग ने और कोहना नमक ने उन्हें अपनी तेज़ाबियत में घुलाया भड़कती हुई आग ने जज़्र-ओ-मद में लपेटा उन्हें सर से पा तक जलाया मगर कोई शो'लों से कुंदन सा सीपों से मोती सा बाहर न आया वो अब भी समुंदर में इठलाती सत्हों के नीले बहाव में अपने अलाव में क़स्र-ए-ज़मुर्रद में तन्हा भटकती है इक बा-आह आब-ओ-आतिश में रंगों की बारिश में अब भी वो ज़ुल्फ़ें झटकती है तो ऊद-ओ-अम्बर की महकार आती है क़तरात उड़ कर दहन कितने घोंगों का भरते हैं उस की झलक देखने के लिए आज भी लोग मरते हैं अब भी यहाँ कश्तियों आब-दोज़ों जहाज़ों के अर्शों पे उस की ही बातें हैं दुनिया के सय्याह सातों समुंदर के मल्लाह उस के न होने पे होने पे तकरार करते हैं उस की कशिश में बहुत दूर के पानियों में सफ़र के लिए ख़ुद को तयार करते हैं मैं भी यहाँ मुज़्तरिब और बेहाल ख़स्ता-ओ-पारीना तख़्ते पे बहता हुआ एक ख़ुफ़्ता जज़ीरे के नज़दीक क्या देखता हूँ कि वो एक पत्थर पे बैठी है पानी पे तारी है इक कैफ़ सा चाँदनी की लपक और हवा की मधुर लय पे मछली सा नीचे का धड़ उस का शफ़्फ़ाफ़ पानी में हिलता है अबरेशमीं नूर में अक्स-ए-सीमाब सा उस के गलना चेहरे पे खिलता है अब देखिए मुझ सा मबहूत आशिक़ उसे अपनी आग़ोश में कैसे भरता है ग़र्क़ाब होता है मरता है
Rafiq Sandelvi
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तुम नहीं जानते इस धुँद का क़िस्सा क्या है धुँद जिस में कई ज़ंजीरें हैं एक ज़ंजीर किसी फूल किसी शब्द किसी ताइर की एक ज़ंजीर किसी रंग किसी बर्क़ किसी पानी की ज़ुल्फ़ ओ रुख़्सार लब ओ चश्म की पेशानी की तुम नहीं जानते इस धुँद का ज़ंजीरों से रिश्ता क्या है ये फ़ुसूँ-कार तमाशा क्या है! तुम ने बस धुँद के उस पार से तीरों के निशाने बाँधे और इधर मैं ने तुम्हारे लिए झंकार में दिल रख दिया कड़ियों में ज़माने बाँधे जाओ अब रोते रहो वक़्त के महबस में ख़ुद अपने ही गले से लग कर तुम मिरे सीना-ए-सद-रंग के हक़दार नहीं अब तुम्हारे मिरे माबैन किसी दीद का ना-दीद का असरार नहीं!!
Rafiq Sandelvi
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ख़्वाब मज़दूर है रात दिन सर पे भारी तग़ारी लिए साँस की बाँस की हाँफती-काँपती सीढ़ियों पर उतरता है चढ़ता है रू-पोश मेमार के हुक्म पर एक ला-शकल नक़्शे पे उठती हुई ऊपर उठती हुई गोल दीवार के ख़िश्त-दर-ख़िश्त चक्कर में महसूर है ख़्वाब मज़दूर है! इक मशक़्क़त-ज़दा आदमी की तरह मैं हक़ीक़त की दुनिया में या ख़्वाब में रोज़ मामूल के काम करता हूँ कुछ देर आराम करता हूँ काँटों भरी खाट में प्यास के जाम पीता हूँ और सोज़न-ए-हिज्र से अपनी उधड़ी हुई तन की पोशाक सीता हूँ जीता हूँ कैसी अनोखी हक़ीक़त है कैसा अजब ख़्वाब है इक मशक़्क़त-ज़दा आदमी की तरह अपने हिस्से की बजरी उठाने पे मामूर है ख़्वाब मज़दूर है!!
Rafiq Sandelvi
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ये कुंद और यख़ बे-नुमू नींद जिस में शब-ए-इर्तिक़ा और सुब्ह-ए-हरीरा का ताज़ा अमल राएगाँ हो रहा है शिकस्ता किनारों के अंदर मचलती हुई सोख़्ता-जान लहरों का रक़्स-ए-ज़ियाँ हो रहा है चराग़-ए-तहर्रुक कफ़-ए-सुस्त पर बे-निशाँ हो रहा है मिरे दहर का ताक़-ए-तहज़ीब जिस पर मुक़द्दस सहीफ़ा नहीं इक रिया-कार मशअ'ल धरी है हर इक शीशा-ए-पाक-बाज़-ओ-सफ़ा की समावी रगों में किसी अक्स-ए-फ़ाजिर की मिट्टी भरी है मुनज़्ज़ह दरख़्तों के पाक और शीरीं फलों में कोई नोक-ए-तेग़-ए-नजासत गड़ी है ख़ुदाया तिरे नेक बंदों पर उफ़्ताद कैसी पड़ी है ये कैसी घड़ी है
Rafiq Sandelvi
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मैं गया उस तरफ़ जिस तरफ़ नींद थी जिस तरफ़ रात थी बंद मुझ पर हुए सारे दर सारे घर मैं गया उस तरफ़ जिस तरफ़ तीर थे जिस तरफ़ घात थी मुझ पे मरकूज़ थी इक निगाह-ए-सियह और अजब ज़ाविए से बनाए हुए थी मुझे सर से पा तक हदफ़ मैं गया उस तरफ़ जिस तरफ़ रेत की लहर थी मौज-ए-ज़र्रात थी मैं नहीं जानता उस घड़ी तीरगी के तिलिस्मात में जो इशारा हुआ किस की उँगली का था और जो खोली गई थी मिरे क़ल्ब पर कौन सी बात थी सिर्फ़ इतना मुझे याद है जब मैं आगे बढ़ा एक ज़ंजीर-ए-गिर्या मिरे साथ थी मैं परिंदा बना मेरी परवाज़ के दाएरे ने जना एक साया घना कश्फ़ होने लगा मैं हरे पानियों में बदन का सितारा डुबोने लगा और इक ला-तअय्युन सुबुक नींद सोने लगा इक उड़न-तश्तरी बन गई साएबाँ मैं जहाँ था वहाँ था कहाँ आसमाँ एक शो'ला था बस मेरे होंटों से लफ़ मैं गया उस तरफ़ जिस तरफ़ जिस्म-ओ-जाँ की हवालात थी जिस तरफ़ नींद थी जिस तरफ़ रात थी चार जानिब बिछी थी बिसात-ए-अदम दरमियाँ जिस के तन्हा मिरी ज़ात थी
Rafiq Sandelvi
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