nazmKuch Alfaaz

मैं गया उस तरफ़ जिस तरफ़ नींद थी जिस तरफ़ रात थी बंद मुझ पर हुए सारे दर सारे घर मैं गया उस तरफ़ जिस तरफ़ तीर थे जिस तरफ़ घात थी मुझ पे मरकूज़ थी इक निगाह-ए-सियह और अजब ज़ाविए से बनाए हुए थी मुझे सर से पा तक हदफ़ मैं गया उस तरफ़ जिस तरफ़ रेत की लहर थी मौज-ए-ज़र्रात थी मैं नहीं जानता उस घड़ी तीरगी के तिलिस्मात में जो इशारा हुआ किस की उँगली का था और जो खोली गई थी मिरे क़ल्ब पर कौन सी बात थी सिर्फ़ इतना मुझे याद है जब मैं आगे बढ़ा एक ज़ंजीर-ए-गिर्या मिरे साथ थी मैं परिंदा बना मेरी परवाज़ के दाएरे ने जना एक साया घना कश्फ़ होने लगा मैं हरे पानियों में बदन का सितारा डुबोने लगा और इक ला-तअय्युन सुबुक नींद सोने लगा इक उड़न-तश्तरी बन गई साएबाँ मैं जहाँ था वहाँ था कहाँ आसमाँ एक शो'ला था बस मेरे होंटों से लफ़ मैं गया उस तरफ़ जिस तरफ़ जिस्म-ओ-जाँ की हवालात थी जिस तरफ़ नींद थी जिस तरफ़ रात थी चार जानिब बिछी थी बिसात-ए-अदम दरमियाँ जिस के तन्हा मिरी ज़ात थी

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में

Muneer Niyazi

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अजीब मा-फ़ौक़ सिलसिला था शजर जड़ों के बग़ैर ही उग रहे थे ख़े में बग़ैर चोबों के और तनाबों के आसरे के ज़मीं पे इस्तादा हो रहे थे चराग़ लौ के बग़ैर ही जल रहे थे कूज़े बग़ैर मिट्टी के चाक पर ढल रहे थे दरिया बग़ैर पानी के बह रहे थे सभी दुआएँ गिरफ़्ता-पा थीं रुकी हुई चीज़ें क़ाफ़िला थीं पहाड़ बारिश के एक क़तरे से घुल रहे थे बग़ैर चाबी के क़ुफ़्ल अज़-ख़ुद ही खुल रहे थे निडर पियादा थे और बुज़दिल असील घोड़ों पे बैठ कर जंग लड़ रहे थे गुनाहगारों ने सर से पा तक बदन को बुर्राक़ चादरों से ढका हुआ था वली की नंगी कमर छुपाने को कोई कपड़ा नहीं बचा था अजीब मा-फ़ौक़ सिलसिला था

Rafiq Sandelvi

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कैसी मख़्लूक़ थी आग में उस का घर था अलाव की हिद्दत में मव्वाज लहरों को अपने बदन की मलाहत में महसूस करती थी लेकिन वो अंदर से अपने ही पानी से डरती थी कितने ही उश्शाक़ अपनी जवानी में पानी में इक सानिया उस को छूने की ख़्वाहिश में नीचे उमुक़ में बहुत नीचे उतरे मगर फिर न उभरे समुंदर ने मंथन से उन के वजूदों को ज़म कर लिया दूधिया झाग ने और कोहना नमक ने उन्हें अपनी तेज़ाबियत में घुलाया भड़कती हुई आग ने जज़्र-ओ-मद में लपेटा उन्हें सर से पा तक जलाया मगर कोई शो'लों से कुंदन सा सीपों से मोती सा बाहर न आया वो अब भी समुंदर में इठलाती सत्हों के नीले बहाव में अपने अलाव में क़स्र-ए-ज़मुर्रद में तन्हा भटकती है इक बा-आह आब-ओ-आतिश में रंगों की बारिश में अब भी वो ज़ुल्फ़ें झटकती है तो ऊद-ओ-अम्बर की महकार आती है क़तरात उड़ कर दहन कितने घोंगों का भरते हैं उस की झलक देखने के लिए आज भी लोग मरते हैं अब भी यहाँ कश्तियों आब-दोज़ों जहाज़ों के अर्शों पे उस की ही बातें हैं दुनिया के सय्याह सातों समुंदर के मल्लाह उस के न होने पे होने पे तकरार करते हैं उस की कशिश में बहुत दूर के पानियों में सफ़र के लिए ख़ुद को तयार करते हैं मैं भी यहाँ मुज़्तरिब और बेहाल ख़स्ता-ओ-पारीना तख़्ते पे बहता हुआ एक ख़ुफ़्ता जज़ीरे के नज़दीक क्या देखता हूँ कि वो एक पत्थर पे बैठी है पानी पे तारी है इक कैफ़ सा चाँदनी की लपक और हवा की मधुर लय पे मछली सा नीचे का धड़ उस का शफ़्फ़ाफ़ पानी में हिलता है अबरेशमीं नूर में अक्स-ए-सीमाब सा उस के गलना चेहरे पे खिलता है अब देखिए मुझ सा मबहूत आशिक़ उसे अपनी आग़ोश में कैसे भरता है ग़र्क़ाब होता है मरता है

Rafiq Sandelvi

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मगरमच्छ ने मुझे निगला हुआ है इक जनीन-ए-ना-तवाँ हूँ जिस घड़ी रक्खी गई बुनियाद मेरी उस घड़ी से तीरगी के पेट में हूँ ख़ून की तर्सील आँवल से ग़िज़ा जारी है कच्ची आँख के आगे तनी मौहूम सी झिल्ली हटा कर देखता हूँ! देखता हूँ गर्म गहरे लेस के दरिया में कछुओं, मेंडकों जल-केकड़ों के पारचों में ओझड़ी के खुरदुरे रेशों में सालिम हूँ नबूद ओ बूद के तारीक अंदेशों में बाहर कौन है जो ज़ात के इस ख़ेमा-ए-ख़ाकिस्तरी के पेट के फूले हुए गदले ग़ुबारे पर अज़ल से कान रख कर सुन रहा है सर पटख़ने हाथ पाँव मारने करवट बदलने की सदा! पानी का गहरा शोर है इन्दर भी बाहर भी बरहना जिस्म से चिमटे हुए हैं काई के रेज़े मुझे फिर से जनम देने की ख़ातिर ज़चगी के इक कलावे ने उगलने के किसी वादे ने सदियों से मुझे जकड़ा हुआ है माँ मगरमच्छ ने मुझे निगला हुआ है!!

Rafiq Sandelvi

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तुम नहीं जानते इस धुँद का क़िस्सा क्या है धुँद जिस में कई ज़ंजीरें हैं एक ज़ंजीर किसी फूल किसी शब्द किसी ताइर की एक ज़ंजीर किसी रंग किसी बर्क़ किसी पानी की ज़ुल्फ़ ओ रुख़्सार लब ओ चश्म की पेशानी की तुम नहीं जानते इस धुँद का ज़ंजीरों से रिश्ता क्या है ये फ़ुसूँ-कार तमाशा क्या है! तुम ने बस धुँद के उस पार से तीरों के निशाने बाँधे और इधर मैं ने तुम्हारे लिए झंकार में दिल रख दिया कड़ियों में ज़माने बाँधे जाओ अब रोते रहो वक़्त के महबस में ख़ुद अपने ही गले से लग कर तुम मिरे सीना-ए-सद-रंग के हक़दार नहीं अब तुम्हारे मिरे माबैन किसी दीद का ना-दीद का असरार नहीं!!

Rafiq Sandelvi

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बहर-कैफ़ जो दर्द होता है वो दर्द होता है एड़ी में काँटा चुभे तो बदन तिलमिलाता है दिल ज़ब्त करता है रोता है जो बर्ग टहनी से गिरता है वो ज़र्द होता है चक्की के पाटों में दाने तो पिसते हैं पानी से निकले तो मछली तड़पती है ताइर क़फ़स में गिरफ़्तार हों तो फड़कते हैं बादल से बादल मिलें तो कड़कते हैं बिजली चमकती है बरसात होती है जो हिज्र की रात होती है वो हिज्र की रात होती है हम अपनी वहशत में जो भेस बदलें कोई रूप धारें समुंदर बलोएँ या दीवार चाटें तसव्वुर की झिलमिल में दिन रात काटें पहाड़ों पे छुट्टी मनाने को जाएँ नदी में नहाएँ ग़िज़ाओं की लज़्ज़त में सरशार हों रोज़ पोशाक पर एक पोशाक बदलें किसी इत्र की फुवार छिड़कें चराग़ों की रंगीन लौ में भरे रस भरे होंट छू लें सनोबर के बाग़ों में घू में मगर बोझ दिल का जो होता है वो तो ब-दस्तूर होता है अंदर ही अंदर कहीं सात पर्दों में मस्तूर होता है! मैं आज की सुब्ह मामूल से क़ब्ल जागा हूँ ख़्वाबीदा बेटों के गालों पे बोसा दिया है वज़ू कर के सज्दा किया है बहुत देर तक आलती-पालती मार कर ख़ुद में गुम हो के योगा के आसन में बैठा हूँ सूखे हुए सारे गमलों को पानी दिया है छतों खिड़कियों और ज़ीनों में मकड़ी के जालों को पोंछा है चिड़ियों को रोटी के रेज़े भी डाले हैं लेकिन जो छाले मिरे दिल के हैं वो बहर-कैफ़ छाले हैं छालों की सोज़िश से तकलीफ़ होती है दिल ज़ब्त करता है रोता है जो दर्द होता है वो दर्द होता है!!

Rafiq Sandelvi

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