nazmKuch Alfaaz

“अक़्सर ख़ामोश हो जाता हूँ मैं” ख़्वाबों की छतरियों तले जब कोई मेरी उदासी का शबब पूछता है अक़्सर ख़ामोश हो जाता हूँ मैं किसी क़फ़स में सदियों से बैठे किसी मुज़रिम की उदास आँखों से निकलती हुई बूँद जब उस के गालों को सहलाती है या किसी अनचाहे मौसम की कोई बहार मुझे पुकारती है अक़्सर ख़ामोश हो जाता हूँ मैं अर्श के मानिंद कोई था मेरे लिए कभी उस की याद में तो कभी उस के साथ गुज़रे लम्हों में खोने की तलब जब बेचैन करती है एक आह दिल से निकलती है जब कोई ग़म मन में तूफान लाता है अक़्सर ख़ामोश हो जाता हूँ मैं जिसे ख़ुदा मानकर दोस्ती का हाथ बढ़ाया था मैं ने जिस की ओर उस के दामन में भीड़ हज़ारों की है गै़रों से यूँँ मुख़्तलिफ़ होने की तलब उस के दिल को ज़रा भी नहीं तड़पाती जब ये ख़याल मन में उठता है मेरे तो अक़्सर ख़ामोश हो जाता हूँ मैं मेरी ख़ुद्दारी का शबब उसे पसंद नहीं मेरे एहसासों की जिसे क़दर नहीं जिस के लिए तड़पा है दिन रात ये दिल उसे मेरे ख़ुश रहने की कोई फ़िक्र नहीं छोड़ दिया उसे भी कोई ग़ैर समझकर जो अपना बना कर गै़रों सा रहा अक़्सर फिर भी जब उस की याद सताती है मुझे अक़्सर ख़ामोश हो जाता हूँ मैं

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.

Gulzar

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"सफ़र" ऐ मेरी जान मैं खोने को चला हूँ ख़ुद को फिर मिलूँगा कभी इस दिल ने इजाज़त दी तो फिर मिलूँगा कभी ये दर्द भुला पाया तो फिर मिलूँगा मैं ख़ुद को ढूँढ़ कर ले आया तो पर ये हालात बताते हैं सफ़र लम्बा है लौटते वक़्त है मुमकिन कि कफ़न में आऊँ तुझ सेे मिलने मैं किसी और बदन में आऊँ

Shivang Tiwari

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"सिगरेट की राख" धुएँ का बादल जो हर पल उठता है जैसे जीवन की हर साँस जलती है सुलगती सिगरेट जैसे एक उम्मीद जो धीरे-धीरे राख बनकर बिख़रती है हर कश में कुछ खो जाता है जैसे सपने किसी कोने में दब जाते हैं हाथों में थमी ये पतली सी चीज़ जैसे ज़िन्दगी की एक छोटी सी ख़्वाहिश जलते हैं होंठ जलते हैं ख़्वाब हर धुएँ में दिखता है दिल का अज़ाब मगर क्या मिला इस आग में सिर्फ़ राख और कुछ सूनी यादें सिगरेट बुझती है पर जलना जारी है जैसे दिल के कोने में कोई दर्द भारी है मगर कौन समझे इस धुएँ की सच्चाई जो दिखता है वो सिर्फ़ पल भर की रिहाई ये सिगरेट बस एक आदत नहीं जैसे ज़िन्दगी की कोई छुपी हुई बेबसी है हर सुलगता कश एक चीख सुनाता है जो शायद किसी ने कभी समझा ही नहीं

Shivang Tiwari

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“है एक ऐसी भी लड़की” वो इश्क़ है वो वफ़ा है वो आयत है, इबादत है वो दुआ है, वो आमीन है वो सच है, वो यक़ीन है वो मेरी धूप है, छाँव है आसमाँ है, ज़मीन है है एक ऐसी भी लड़की जो सच में औला-तरीन है वो थोड़ी सी पागल है थोड़ी थोड़ी ज़हीन है, उस की हरकतों में अल्हड़पन, जिस का नक़्श आ'ला जिस का चर्बा हसीन है, हर भौंरा दिवाना उस का जो बर्ग-ए-गुल पे नशीन है, है एक ऐसी भी लड़की जो सच में औला-तरीन है। वो इस क़दर माहेरीन है वही मेरी दामन भी है वही मेरी आस्तीन है, वो इमली सी खट्टी है शहद सी मीठी है, कभी वो चटपटी सी कभी वो नमकीन है, वो एक उम्दा परवाज़ है एक आ'ला शाहीन है, है एक ऐसी भी लड़की जो सच में औला-तरीन है। वो मेरी दुनिया है, जहान है मेरी पगड़ी है, ज़बीन है, मेरा क़लमा है, ईमान है वो एक तशरीह-ए-दीन है, वो बर्ग-ए-गुल है, काँटा है वो मतीन है, वो महीन है, वो नील-कँवल है, गुलाब है, एक गुलदस्ता रंगीन है, मैं अब क्या क्या लिखूँ सर से पाँव तक वो हसीन है, है एक ऐसी भी लड़की जो सच में औला-तरीन है।

Shivang Tiwari

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"आख़िरी मोहब्बत" तू आख़िरी मोहब्बत है मेरी तेरे बा'द कोई ख़्वाहिश नहीं वक़्त थम जाए बस इस लम्हे में और कोई दरकार नहीं तेरे बिना सब सूना है तेरे साथ सब पूरा ख़्वाबों में तेरी परछाईं हक़ीक़त में तू मंज़िल मेरे दिल की हर इक धड़कन तेरे नाम की हाज़िरी है पहली मोहब्बत में थे ख़्वाब बहुत आख़िरी में सच्चाई है पहली में थी मासूमियत शायद आख़िरी में गहराई है तू वो किताब है जिस के हर पन्ने पे मैं बिखरा हूँ जिस में ख़ुद को बार-बार ढूँढा तू वो पन्ना है जो मुड़ा नहीं कभी तू आख़िरी मोहब्बत है अब और कुछ माँगा नहीं मैं ने तेरी हँसी में है एक सुकून तेरे आँसुओं में मेरी दुआ तेरे नाम में खोया हुआ तेरे प्यार में पाया ख़ुदा तू आख़िरी मोहब्बत है मेरी तेरे बा'द कोई ख़्वाहिश नहीं जिस दिन भी ख़त्म हो जाएँ साँसें तू मेरे साथ हो यही आरज़ू है मेरी

Shivang Tiwari

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'गुनाह क्या था' जकड़ लिया मुझे कुछ बंदिशों ने झकझोर दिया मन को रंजिशों ने बर्बाद कर दिया तेरी साजिशों ने पूछता हूँ मेरा गुनाह क्या था जला हूँ दिन रात विरह की तपन में ज़िंदा हूँ पर पैर रहे हैं मेरे कफ़न में पानी भी नहीं डाला देख जलन में पूछता हूँ मेरा गुनाह क्या था पाक थी मोहब्बत कोई दोष न था तुम सेे मिल कर यार मुझे होश न था पूछता हूँ मेरा गुनाह क्या था

Shivang Tiwari

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