nazmKuch Alfaaz

“है एक ऐसी भी लड़की” वो इश्क़ है वो वफ़ा है वो आयत है, इबादत है वो दुआ है, वो आमीन है वो सच है, वो यक़ीन है वो मेरी धूप है, छाँव है आसमाँ है, ज़मीन है है एक ऐसी भी लड़की जो सच में औला-तरीन है वो थोड़ी सी पागल है थोड़ी थोड़ी ज़हीन है, उस की हरकतों में अल्हड़पन, जिस का नक़्श आ'ला जिस का चर्बा हसीन है, हर भौंरा दिवाना उस का जो बर्ग-ए-गुल पे नशीन है, है एक ऐसी भी लड़की जो सच में औला-तरीन है। वो इस क़दर माहेरीन है वही मेरी दामन भी है वही मेरी आस्तीन है, वो इमली सी खट्टी है शहद सी मीठी है, कभी वो चटपटी सी कभी वो नमकीन है, वो एक उम्दा परवाज़ है एक आ'ला शाहीन है, है एक ऐसी भी लड़की जो सच में औला-तरीन है। वो मेरी दुनिया है, जहान है मेरी पगड़ी है, ज़बीन है, मेरा क़लमा है, ईमान है वो एक तशरीह-ए-दीन है, वो बर्ग-ए-गुल है, काँटा है वो मतीन है, वो महीन है, वो नील-कँवल है, गुलाब है, एक गुलदस्ता रंगीन है, मैं अब क्या क्या लिखूँ सर से पाँव तक वो हसीन है, है एक ऐसी भी लड़की जो सच में औला-तरीन है।

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"नसरी नज़्म" नस्र अब्बा नज़्म अमाँ दोनों को इनकार है ये जो नसरी नज़्म है ये किस की पैदा-वार है सिर्फ़ लफ्फ़ाज़ी पे मब्नी है ये तजरीदी कलाम जिस में अन्क़ा हैं मआ'नी लफ़्ज़ पर्दा-दार है नस्र है गर नस्र तो वो नज़्म हो सकती नहीं नज़्म जो हो नस्र की मानिंद वो बे-कार है क़ाफ़िए की कोई पाबंदी न है क़ैद-ए-रदीफ़ बे-दर-ओ-दीवार का ये घर भी क्या पुरकार है बहरस आज़ाद क़ैद-ए-वज़न से है बे-नियाज़ वाह क्या मदर पिदर आज़ाद ये दिलदार है मर्तबे में 'मीर' ओ 'मोमिन' से है हर कोई बुलंद इन में हर बे-बहर ग़ालिब से बड़ा फ़नकार है जिस के चमचे जितने ज़्यादा हों वो उतना ही अज़ीम आज कल मिसरा उठाना एक कारोबार है दाद सिर्फ़ अपनों को देते हैं गिरोह-अंदर-गिरोह उन के टोले से जो बाहर हो गया मुरदार है बन गया उस्ताद-ओ-अल्लामा यहाँ हर बे-शुऊर कोर-चश्म अहल-ए-नज़र होने का दावेदार है शा'इरी जुज़-शाइरी है है ज़रा मेहनत-तलब और मेहनत ही वो शय है जिस से उन को आर है पाप-म्यूज़िक के लिए मौज़ूँ है नसरी शा'इरी हर रिवायत से बग़ावत की ये दावेदार है तब्अ-ए-मौज़ूँ गर न बख़्शी हो ख़ुदा ने आप को शा'इरी क्यूँँ कीजे आख़िर क्या ख़ुदा की मार है दाद देना ऐसी नज़्मों को बड़ी बे-दाद है जो न समझा और कहे समझा बड़ा मक्कार है

Aasi Rizvi

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"वो" वो किताब-ए-हुस्न वो इल्म ओ अदब की तालीबा वो मोहज़्ज़ब वो मुअद्दब वो मुक़द्दस राहिबा किस क़दर पैराया परवर और कितनी सादा-कार किस क़दर संजीदा ओ ख़ामोश कितनी बा-वक़ार गेसू-ए-पुर-ख़म सवाद-ए-दोश तक पहुँचे हुए और कुछ बिखरे हुए उलझे हुए सिमटे हुए रंग में उस के अज़ाब-ए-ख़ीरगी शामिल नहीं कैफ़-ए-एहसासात की अफ़्सुर्दगी शामिल नहीं वो मिरे आते ही उस की नुक्ता-परवर ख़ामुशी जैसे कोई हूर बन जाए यकायक फ़लसफ़ी मुझ पे क्या ख़ुद अपनी फ़ितरत पर भी वो खुलती नहीं ऐसी पुर-असरार लड़की मैं ने देखी ही नहीं दुख़तरान-ए-शहर की होती है जब महफ़िल कहीं वो तआ'रुफ़ के लिए आगे कभी बढ़ती नहीं

Jaun Elia

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"दुख" मुझे जो लगा, वो नहीं हूँ मैं अब उस जगह तो नहीं हूँ तू इक कॉल मैसेज नहीं कर रही है कि ऐसी वो क्या ही शिकायत है? जो मुझ सेे तू कर नहीं पा रही है बताती नहीं है सताती रही है मुझे तू बता क्यूँ ख़फ़ा है मुझे तू बता क्या हुआ है तू कुछ बोल ये ख़ामोशी काटती है मुझे जान ले बस ये आँखें किसे रोती है बस? मुझे किस का दुख है? मुझे पूछ तू फिर बताऊँ तेरा नाम मैं और तुझे मैं सुनाऊँ दिखाऊँ मेरा ग़म मेरे ज़ख़्म जो भर नहीं पा रहे हैं मुझे तेरे ऐसे सताने का दुख है तेरे लौट के फिर न आने का दुख है मेरे पास आ मेरा दुख जान लड़की सखी कोई इतना ख़फ़ा भी नहीं होता है जैसे कि तू है कि ग़ुस्सा ज़ियादा दिनो तक नहीं करना होता है समझी ए लड़की कि ग़लती भुलाने के ख़ातिर बनी है मोहब्बत निभाने के ख़ातिर बनी है कि जब दोस्ती कर ली जाए उसे फिर निभाना भी होता है लड़की मुझे याद है तू मगर मैं भुलाया गया हूँ तू बेशक मुझे छोड़ दे पर ज़रा सुन कहीं भी कभी भी किसी भी हाँ दरिया ने प्यासे को प्यासा नहीं मारा है फिर तो अब तू चली आ घड़ी हाथ की बंद हो जाए इस सेे के पहले चली आ मेरे हाथ को थाम ले दोस्त ये ज़िंदगी बाय बोले मुझे इस सेे पहले तू आ और मुझे तू गले से लगा ले

BR SUDHAKAR

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"याद-ए-बेवफ़ा" बे-वफ़ा बे-वफ़ा बे-वफ़ा बे-वफ़ा बे-वफ़ा बे-वफ़ा ऐ मेरी बे वफ़ा याद आएँगी मुझ को तेरी हर जफ़ा क्या से क्या हो गया मैं तेरे प्यार में दिल लगाया था तुझ सेे यूँँ बेकार में प्यार करना भी इक ज़ुर्म है और ख़ता प्यार ज़्यादा मैं करता हूँ तुझ सेे फ़क़त मैं ने नफ़रत न की तुझ सेे जाँ आज तक वो सबब तू बता क्यूँ किया अलविदा सर झुका कर के माँगा था तुझ को सनम तू न मुझ को मिला हो गई आँखें नम तुझ को आबाद रक्खे मेरा वो ख़ुदा तेरी यादों को दिल में बसाऊँगा मैं ये तो मुमकिन नहीं भूल जाऊँगा मैं याद करता है 'दानिश' ये तुझ को सदा

Danish Balliavi

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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"सफ़र" ऐ मेरी जान मैं खोने को चला हूँ ख़ुद को फिर मिलूँगा कभी इस दिल ने इजाज़त दी तो फिर मिलूँगा कभी ये दर्द भुला पाया तो फिर मिलूँगा मैं ख़ुद को ढूँढ़ कर ले आया तो पर ये हालात बताते हैं सफ़र लम्बा है लौटते वक़्त है मुमकिन कि कफ़न में आऊँ तुझ सेे मिलने मैं किसी और बदन में आऊँ

Shivang Tiwari

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'गुनाह क्या था' जकड़ लिया मुझे कुछ बंदिशों ने झकझोर दिया मन को रंजिशों ने बर्बाद कर दिया तेरी साजिशों ने पूछता हूँ मेरा गुनाह क्या था जला हूँ दिन रात विरह की तपन में ज़िंदा हूँ पर पैर रहे हैं मेरे कफ़न में पानी भी नहीं डाला देख जलन में पूछता हूँ मेरा गुनाह क्या था पाक थी मोहब्बत कोई दोष न था तुम सेे मिल कर यार मुझे होश न था पूछता हूँ मेरा गुनाह क्या था

Shivang Tiwari

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“अक़्सर ख़ामोश हो जाता हूँ मैं” ख़्वाबों की छतरियों तले जब कोई मेरी उदासी का शबब पूछता है अक़्सर ख़ामोश हो जाता हूँ मैं किसी क़फ़स में सदियों से बैठे किसी मुज़रिम की उदास आँखों से निकलती हुई बूँद जब उस के गालों को सहलाती है या किसी अनचाहे मौसम की कोई बहार मुझे पुकारती है अक़्सर ख़ामोश हो जाता हूँ मैं अर्श के मानिंद कोई था मेरे लिए कभी उस की याद में तो कभी उस के साथ गुज़रे लम्हों में खोने की तलब जब बेचैन करती है एक आह दिल से निकलती है जब कोई ग़म मन में तूफान लाता है अक़्सर ख़ामोश हो जाता हूँ मैं जिसे ख़ुदा मानकर दोस्ती का हाथ बढ़ाया था मैं ने जिस की ओर उस के दामन में भीड़ हज़ारों की है गै़रों से यूँँ मुख़्तलिफ़ होने की तलब उस के दिल को ज़रा भी नहीं तड़पाती जब ये ख़याल मन में उठता है मेरे तो अक़्सर ख़ामोश हो जाता हूँ मैं मेरी ख़ुद्दारी का शबब उसे पसंद नहीं मेरे एहसासों की जिसे क़दर नहीं जिस के लिए तड़पा है दिन रात ये दिल उसे मेरे ख़ुश रहने की कोई फ़िक्र नहीं छोड़ दिया उसे भी कोई ग़ैर समझकर जो अपना बना कर गै़रों सा रहा अक़्सर फिर भी जब उस की याद सताती है मुझे अक़्सर ख़ामोश हो जाता हूँ मैं

Shivang Tiwari

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"सिगरेट की राख" धुएँ का बादल जो हर पल उठता है जैसे जीवन की हर साँस जलती है सुलगती सिगरेट जैसे एक उम्मीद जो धीरे-धीरे राख बनकर बिख़रती है हर कश में कुछ खो जाता है जैसे सपने किसी कोने में दब जाते हैं हाथों में थमी ये पतली सी चीज़ जैसे ज़िन्दगी की एक छोटी सी ख़्वाहिश जलते हैं होंठ जलते हैं ख़्वाब हर धुएँ में दिखता है दिल का अज़ाब मगर क्या मिला इस आग में सिर्फ़ राख और कुछ सूनी यादें सिगरेट बुझती है पर जलना जारी है जैसे दिल के कोने में कोई दर्द भारी है मगर कौन समझे इस धुएँ की सच्चाई जो दिखता है वो सिर्फ़ पल भर की रिहाई ये सिगरेट बस एक आदत नहीं जैसे ज़िन्दगी की कोई छुपी हुई बेबसी है हर सुलगता कश एक चीख सुनाता है जो शायद किसी ने कभी समझा ही नहीं

Shivang Tiwari

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"आख़िरी मोहब्बत" तू आख़िरी मोहब्बत है मेरी तेरे बा'द कोई ख़्वाहिश नहीं वक़्त थम जाए बस इस लम्हे में और कोई दरकार नहीं तेरे बिना सब सूना है तेरे साथ सब पूरा ख़्वाबों में तेरी परछाईं हक़ीक़त में तू मंज़िल मेरे दिल की हर इक धड़कन तेरे नाम की हाज़िरी है पहली मोहब्बत में थे ख़्वाब बहुत आख़िरी में सच्चाई है पहली में थी मासूमियत शायद आख़िरी में गहराई है तू वो किताब है जिस के हर पन्ने पे मैं बिखरा हूँ जिस में ख़ुद को बार-बार ढूँढा तू वो पन्ना है जो मुड़ा नहीं कभी तू आख़िरी मोहब्बत है अब और कुछ माँगा नहीं मैं ने तेरी हँसी में है एक सुकून तेरे आँसुओं में मेरी दुआ तेरे नाम में खोया हुआ तेरे प्यार में पाया ख़ुदा तू आख़िरी मोहब्बत है मेरी तेरे बा'द कोई ख़्वाहिश नहीं जिस दिन भी ख़त्म हो जाएँ साँसें तू मेरे साथ हो यही आरज़ू है मेरी

Shivang Tiwari

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