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गर्मी की तपती दोपहर की शिद्दत हो या सर्द शामों की ख़ुनकी जिस्मों में उतरी हो तेरा साथ हो तो मौसमों से क्या होता है

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"नज़र से मिलाकर नज़र मत चुराओ" नज़र से मिलाकर नज़र मत चुराओ मिरी जान हो तुम मिरे पास आओ नहीं दूर से देख कर मुस्कुराओ मिरी जाँ मोहब्बत में क्या शर्म करना ग़लत कुछ नहीं है मोहब्बत में आओ नज़र से मिलाकर नज़र मत चुराओ मोहब्बत को मेरी न हल्के में लेना मैं पहुँचा हुआ आदमी हूँ समीना बहादुर हूँ बंदा किसी से न डरता मुझे जो भी कहना है मुँह पर ही कहता सुनाना है जो कुछ भी जल्दी सुनाओ नज़र से मिलाकर नज़र मत चुराओ मिरी बात का मत बुरा मान जाना मैं ऐसा ही हूँ यार पागल दिवाना इधर देखो बातों पे मेरी न जाना समझदार हो तुम मैं पागल दिवाना मिरी जान हो तुम मिरे पास आओ नज़र से मिलाकर नज़र मत चुराओ अगर आह भर के मुझे देखना हो अगर फूल ऊपर मिरे फेंकना हो घुमाकर नज़र हर तरफ़ देख लेना कहीं कोई है तो नहीं पास हमदम अगर पास हो कोई रुक जाना हमदम मिरी जान तुम काम दिल से ही लेना न तुम चुपके चुपके मिरे पास आना कोई चीज़ मेरे लिए तुम न लाना अगर देख लेगा कोई क्या कहेगा वो बदनाम सारे जहाँ में करेगा मोहब्बत है मुझ सेे तो मुझ को बताओ नज़र से मिलाकर नज़र मत चुराओ जिधर बैठता मैं उधर बैठते हो हमेशा मिरी ही तरफ़ देखते हो समझदार हो यार समझा करो तुम मुझे देर तक यूँँ न देखा करो तुम अकेले मिलूँ तब ही बोला करो तुम कोई सामने हो तो बन जाओ अंजान फिर ऐसे रहो जैसे हो मेरे मेहमान करो काम सारे नज़र में मत आओ नज़र से मिलाकर नज़र मत चुराओ तुम ऐसे में निकलो न लूँ चल रही है हवा भी कई रंग में ढल रही है बहुत तेज़ गर्मी इधर बैठ जाओ लो पानी पियो और फिर मुस्कुराओ नज़र से मिलाकर नज़र मत चुराओ

Prashant Kumar

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नज़्म- क्या लिखूँ लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को मेरे दिलबर मैं तुम को शाम, तुम को रात, तुम को चाँद, तुम को राह, तुम को चाह, तुम को शाह, तुम को बाह, तुम को नाह, बोलो मैं लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को मेरे दिलबर तुम्हें जीवन लिखूँ अपना या फिर लोबान मैं लिख दूँ लिखूँ महफ़िल तुम्हें अपना या फिर सुनसान मैं लिख दूँ लिखूँ दिलबर तुम्हें अपना या फिर मेहमान मैं लिख दूँ लिखूँ आँसू तुम्हें अपना या फिर मुस्कान मैं लिख दूँ लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को तुम्हें नादान, या अंजान या साथी, या लिख दूँ राह का रहबर, बता भी दो लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को मेरे दिलबर मैं तुम को धूप सूरज सा या शामों सा सुकूँ लिख दूँ लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को मैं अपना दिल मैं अपनी जान या धड़कन लिखूँ तुम को लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को क़लम लिख दूँ किताबें भी लिखूँ तुम को नयन की मैं चमक या फूल की धड़कन लिखूँ तुम को लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को लिखूँ तुम को मैं ठंडी रात का चादर या लिख दूँ नींद का बिस्तर, बता भी दो लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को मेरे दिलबर तुम्हें झुमका, तुम्हें आँचल, तुम्हें धड़कन तुम्हें चाँदी, तुम्हें सोना, तुम्हें हीरा तुम्हें पायल, तुम्हें कोमल, तुम्हें मूरत तुम्हें पीतल, तुम्हें जल थल, बता भी दो लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को मेरे दिलबर

Raunak Karn

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"तन्हाई" मेरी तन्हाई को अंगार बनाया न करो या तो आ जाओ या फिर याद भी आया न करो कितनी मुश्किल से सँभाला है अभी फिर दिल को बीती यादों में रुलाया है अभी फिर दिल को ख़्वाब मिलने का मुझे ऐसे दिखाया न करो या तो आ जाओ या फिर याद भी आया न करो रेत तपती मेरे एहसासों की है धू-धूकर उस पे यादों की अगन जाती जिगर छू-छूकर इस क़दर दिल को मेरे आप जलाया न करो या तो आ जाओ या फिर याद भी आया न करो खिड़कियाँ आप की राहों को निहारा करतीं आहटें आने का जब-जब भी इशारा करतीं मुझ में यूँँ ज्वार मुहब्बत का उठाया न करो या तो आ जाओ या फिर याद भी आया न करो रोज़ कहते हो कि कल आ के मिलूँगा तुम सेे हो के दुनिया में सफल आ के मिलूँगा तुम सेे अपनी तक़दीर को इतना भी सताया न करो या तो आ जाओ या फिर याद भी आया न करो

Nityanand Vajpayee

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"ज़माना और उन के रंग" ज़माना मेरे ख़िलाफ़ जहर उगल सकता है इस में कौन कहाँ किसी को रोक सकता है अब इन ज़ेहनी बीमार लोगों की फ़ितरत से कैसे कोई अपनी मंज़िल को भूल सकता है हर दफ़ा मेरी फिर से उठने की शिद्दत को हर बार यहाँ कोई न कोई तोड़ सकता है और क्या उस टूटने और गिरने के डर से कैसे कोई कोशिश करना छोड़ सकता है ये ज़माना है जनाब यहाँ अक्सर ये सब यहाँ दिल हर रोज़ दुखाया जा सकता है आसमाँ में उड़ते आज़ाद हर उस परिंदे के यहाँ कोई भी उस के परों को काट सकता है कामयाबी के शिखर में पहुँचे हुए लोगों को कोई कभी भी उन्हें शिखर से उतार सकता है

Lalit Mohan Joshi

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दुल्हन का दुख कैसी उलझन बैठी है सामने दुल्हन बैठी है इक लड़का जो मेहमाँ है उस की धड़कन बैठी है कैसे इश्क़ सितारों को मार गया बेचारों को दुल्हन के रोते-रोते सात वचन होते-होते लड़का सत्तर बार मरा और सहर के साढ़े दस सर्द पड़ी सारी नस-नस दुल्हन पी के संग गई असली पी को छोड़ गई लड़के का दिल आधा था सच कहता हूँ पर यारों दुल्हन का दुख ज़्यादा था मैं उस का दुख लिख न सका कोशिश की पर लिख न सका

Lekhak Suyash

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