nazmKuch Alfaaz

तह-दर-तह जंगल के अंदर उस का इक छोटा सा घर था और ख़ुद जंगल शब के काले रेशम के इक थान के अंदर दबा पड़ा था चुर-मुर सी आवाज़ बना था और शब गोरे दिन के मकड़ी-जाल में जकड़ी इक काली मक्खी की सूरत लटक रही थी मैं क्या करता मजबूरी सी मजबूरी थी मैं ने ख़ुद को घर छप्पर में उल्टा लटका देख लिया था कितनी ही गिरहों में जकड़ा देख लिया था मकड़ी जाने कहाँ गई थी अपनी तहों के अंदर शायद फँसी हुई थी मैं क्या जानूँ

Wazir Agha0 Likes

Related Nazm

"कब" कब ये पेड़ हरे होंगे फिर से कब ये कलियाँ फूटेंगी और ये फूल हसेंगे कब ये झरने अपनी प्यास भरेंगे कब ये नदियाँ शोर मचाएँगी कब ये आज़ाद किए जाएँगे सब पंछी कब जंगल साँसे लेंगे कब सब जाएँगे अपने घर कब हाथों से ज़ंजीरें खोली जाएँगी कब हम ऐसों को पूछेगा कोई और ये फ़क़ीरों को भी क़िस्से में लाया जाएगा कब इन काँटों की भी क़ीमत होगी और मिट्टी सोने के भाव में आएगी कब लोगों की ग़लती टाली जाएगी कब ये हवाएँ पायल पहने झूमेगी कब अंबर से परियाँ उतरेंगी कब पत्थरों से भी ख़ुशबू आएगी कब हंसों के जोड़ें नदियों पे बैठेंगे बरखा गीत बनाएगी और मोर उठा के पर कत्थक करते देखे जाएँगे नीलकमल पानी से इश्क़ लड़ाएंगे मछलियाँ ख़ुशी के गोते मारेंगी कब कोयल की कूक सुनाई देगी कब भॅंवरे फिर गुन- गुन करते लौटेंगे बागों में और कब ये प्यारी तितलियाँ कलर फेकेंगी फिर सब कुछ डूबा होगा रंगों में कब ये दुनिया रौशन होगी कब ये जुगनू अपने रंग में आएँगे कब ये सब मुमकिन है कब सबके ही सपने पूरे होंगे कब अपने मन के मुताबिक़ होगा सब कुछ कब ये बहारें लोटेंगी कब वो तारीख़ आएगी बस मुझ को ही नहीं सब को इंतिज़ार है तेरे ' बर्थडे ' का

BR SUDHAKAR

16 likes

"अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है" गुज़रती उम्र ढ़लती जा रही है ज़मीं पाँव निगलती जा रही है अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है परी आगे निकलती जा रही है सितारे बारी-बारी बुझ रहे हैं हवा मोअत्तर होती जा रही है चमकती जा रही है कोई मछली समुंदर बर्फ़ करती जा रही है मैं अपनी नाव में बेकस पड़ा हूँ उफकती नब्ज़ डूबी जा रही है अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है अँधेरा ही समुंदर का ख़ुदा है ख़ुदा मछली पकड़ना चाहता है

Ammar Iqbal

13 likes

जब छुआ साथ तुलसी चौरा आँखों में साँसों को खींचे तुम सेे जो वा'दा किया कभी पड़िया जी के पीपल नीचे तुम ने चाहा था ख़ुश रहना ख़ुद ख़ुशी सदा मुझ से सीखे दुनिया भर के संकल्प सतत पूरे होते मुझ में दीखे ख़ुद से अनुबंध किया है अब मन को निर्बंध किया है अब गत-विगत मुक्त हो सकने का सम्पूर्ण प्रबन्ध किया है अब इस नए साल के पहले दिन तुम से बाहर सोचा तो है मन-प्राण सुमरनी छोड़ेंगे सुनते तो हैं होता तो है काफ़ी है।

Kumar Vishwas

13 likes

"याद-ए-बेवफ़ा" बे-वफ़ा बे-वफ़ा बे-वफ़ा बे-वफ़ा बे-वफ़ा बे-वफ़ा ऐ मेरी बे वफ़ा याद आएँगी मुझ को तेरी हर जफ़ा क्या से क्या हो गया मैं तेरे प्यार में दिल लगाया था तुझ सेे यूँँ बेकार में प्यार करना भी इक ज़ुर्म है और ख़ता प्यार ज़्यादा मैं करता हूँ तुझ सेे फ़क़त मैं ने नफ़रत न की तुझ सेे जाँ आज तक वो सबब तू बता क्यूँ किया अलविदा सर झुका कर के माँगा था तुझ को सनम तू न मुझ को मिला हो गई आँखें नम तुझ को आबाद रक्खे मेरा वो ख़ुदा तेरी यादों को दिल में बसाऊँगा मैं ये तो मुमकिन नहीं भूल जाऊँगा मैं याद करता है 'दानिश' ये तुझ को सदा

Danish Balliavi

11 likes

"ख़त" तुम को ये बताना था या फिर ये समझाना था दिल की बस ये चाहत थी बस तुम पर प्यार लुटाना था तुम को ये बताना था था छेड़ना तुम को थोड़ा थोड़ा तुम्हें सताना था जो रूठ जाते तुम मुझ सेे हाँ मुझ को तुम्हें मनाना था फिर तुम को गले लगाना था तुम को ये बताना था लड़ के भी तुम सोते तो तुम्हारा सिर सहलाना था मक़्सद सिर्फ़ एक था तुम्हारा प्यार कमाना था सारी दुनिया मिट्टी है तुम्हारा साथ ख़ज़ाना था तुम को ये बताना था मिलने तुम सेे आना था या फिर तुम्हें बुलाना था माँग तुम्हारी भरनी थी अपना तुम्हें बनाना था तुम्हारा ही कहलाना था तुम को ये बताना था इस जीवन का हर मंज़र तुम्हारे साथ बिताना था हर फेरे का हर वा'दा तुम्हारे साथ निभाना था मंगलसूत्र इन हाथों से तुम को ही पहनाना था तुम को ये बताना था फ़ासले जितने भी थे उन को मुझे मिटाना था उस ख़ुदा से हर जन्म में तुम्हारा साथ लिखाना था फिर बारात तुम्हारी चौखट पर तुम सेे ही ब्याह रचाना था तुम को ये बताना था बिन बोले बस चुपके से गजरा तुम्हें दिलाना था बनाता मैं एक दिन खाना फिर खाना तुम्हें खिलाना था तुम्हारे हाथों से खाना मुझ को भी तो खाना था तुम को ये बताना था खो दिया तुम को मैं ने ये दुख अब मुझे मनाना था डूब जाता आसमान बस आँसू मुझे बहाना था फिर लिख दिया मैं ने आँसू बस इतना मेरा फ़साना था तुम को ये बताना था बस तुम को ये बताना था

Divya 'Kumar Sahab'

28 likes

More from Wazir Agha

कभी हवा इक झोंका है जो दीवारों को फाँद के अक्सर हल्की सी एक चाप में ढल कर सहन में फिरता रहता है कभी हवा इक सरगोशी है जो खिड़की से लग कर पहरों ख़ुद से बातें करती है कभी हवा वो मौज-ए-सबा है जिस के पहले ही बोसे पर नन्ही मुन्नी कलियों की निन्दिया से बोझल सूजी आँखें खुल जाती हैं कभी हवा अब कैसे बताएँ हवा के रूप तो लाखों हैं पर उस का वो इक रूप तुझे भी याद तो होगा जब सन्नाटे पोरी पोरी टूट गिरे थे चाप के पाँव उखड़ गए थे सरगोशी पर कितनी चीख़ें झपट पड़ी थीं और फूलों की आँखों से शबनम की बूँदें फ़र्श-ए-ज़मीं पर चारों जानिब बिखर गई थीं

Wazir Agha

0 likes

चुना हम ने पहाड़ी रास्ता और सम्त का भारी सलासिल तोड़ कर सम्तों की नैरंगी से हम वाक़िफ़ हुए उभरी चट्टानों से लुढ़कने घाटियों से करवटें लेने की इक बिगड़ी रविश हम ने भी अपनाई खड्डों की तह में बहते पानियों से हम ने चलने का चलन सीखा दरख़्तों और फूलों से क़तारें तोड़ने की और हवा से मुँह उठा कर अपनी मर्ज़ी से कई सम्तों में बे-आराम होने की अदा सीखी ज़माँ से हम ने सीखा सब ज़मानों में रवाँ होना हमें रास आ गया कोसों में चलना उफ़ुक़ की सुरमई मेहराब पर नज़रें जमाए किसी सीधी सड़क पर दूर इक बस्ती के सीने से लगे बरसों पुराने हिचकियाँ लेते मकाँ की और जाने का जुनूँ मद्धम पड़ा हम बट गए चीढ़ों की शाख़ों से उतरती कतरनों में चुना हम ने पहाड़ी रास्ता

Wazir Agha

0 likes

सफ़र में हूँ और रुका खड़ा हूँ मैं चारों सम्तों में चल रहा हूँ मगर कहाँ हूँ वहीं जहाँ सुर्ख़ रौशनाई का एक क़तरा किसी क़लम की कसीफ़ निब से टपक पड़ा है मैं ख़ुद भी शायद किसी क़लम से गिरा हुआ एक सुर्ख़ क़तरा हूँ ज़िंदगी की सजल जबीं पर चमकती बिंदिया सी बन गया हूँ मगर मैं बिंदिया नहीं हूँ शायद कि वो तो तक़्दीस का निशाँ है दिलों के धागों की इक गिरह है गिरह जो सदियों में बनने वाले हसीन रिश्तों का आश्रम है जो आने वाले तड़पती सदियों की इब्तिदा है गिरह तो जंक्शन है पटरियों का मुसाफ़िरों का नई-नवेली रफ़ाक़तों का मोहब्बतों का अज़िय्यतों का मगर मैं तन्हा हूँ बे-कराँ वुसअ'तों में तन्हा सफ़ेद माज़ी सफ़ेद फ़र्दा सफ़ेद ये लम्हा-ए-इबादत कि जिस पे कोई नहीं इबारत सफ़ेद माथे पे सुर्ख़ धब्बा हूँ इब्तिदा इंतिहा के धागों से कट चुका हूँ मैं सुर्ख़ धब्बा हूँ कपकपाते लतीफ़ अक्सों का सिलसिला हूँ तमाम चेहरे जो तेरे अंदर से झाँकते हैं मिरे ही चेहरे की झलकियाँ हैं मिरे ही सीने की धड़कनें हैं ये तेज़ रंगों के तुंद दरिया जो दुख के कोह-ए-गिराँ से रस कर ज़मीं की बंजर उदास सी सल्तनत को छू कर उस एक बे-अंत सुर्ख़ नुक़्ते के बहर-ए-ज़ुल्मात में गिरे हैं मिरे ही बे-नाम दस्त-ओ-पा हैं ये जगमगाती सी कहकशाएँ जो इब्तिदास ख़ला की ज़ुल्मत में क़ैद बाहर को उड़ रही हैं गिर्हें बनी हैं वहीं खड़ी हैं वहीं जहाँ सुर्ख़ रौशनाई का एक क़तरा किसी क़लम की कसीफ़ निब से टपक पड़ा है वो एक क़तरा जो मेरा दिल है जो मेरे अक्सों का सिलसिला है जो मेरे होने से सुर्ख़-रू है जो मेरी पा-बस्ता आरज़ू है

Wazir Agha

0 likes

छतों मुंडेरों और पेड़ों पर ढलती धूप के उजले कपड़े सूख रहे थे बादल सुर्ख़ सी झालर वाले बाँके बादल हँसते चहकते फूलों का इक गुलदस्ता थे हर शय कुंदन रूप में ढल कर दमक रही थी गालों पर सोने की डलग और आँखों में इक तेज़ चमक थी सारा मंज़र कैफ़ के इक लम्हे में बेबस लज़्ज़त की बाँहों में जकड़ा हुमक रहा था और फिर दो आँखों को मिलती काले उलझे बालों को मुख पर बिखराए छोटे छोटे क़दम उठाती बढ़ती आई पहली खिड़की में जब उस ने झाँका खिड़की की दहलीज़ पे रक्खा इक नाज़ुक गुल-दान चटख़ कर टूट गया उलझे बालों पागल आँखों वाली ने तब आगे बढ़ कर दूसरी तीसरी और फिर गली की हर खिड़की में झाँक के देखा गुल-दानों को ठोकर मारी इक इक फूल को रौंद दिया तब वो मुझ को देख के लपकी मेरी जानिब ग़ैज़-भरी नज़रों का रेला आया फिर जैसे कुछ शोख़ के ठिठकी सुर्ख़ गुलाब का फूल मिरे हाथों में थमाया और ख़ुद चिकने फ़र्श पे गिर कर टूट गई

Wazir Agha

0 likes

अजीब है ये सिलसिला ये सिलसिला अजीब है हवा चले तो खेतियों में धूम चहचहों की है हवा रुके तो मुर्दनी है मुर्दनी की राख का नुज़ूल है कहाँ है तू कहाँ है तू कहाँ नहीं है तू बता अभी था तेरे गिरते उड़ते आँचलों का सिलसिला और अब उफ़ुक़ पर दूर तक गए दिनों की धूल है गए दिनों की धूल का ये सिलसिला फ़ुज़ूल है मैं रो सकूँ तो क्या ये गदली काएनात धुल सकेगी मेरे आँसुओं के झाग से मैं मुस्कुरा सकूँ तो क्या सफ़र की ख़स्तगी को भूल कर ये कारवाँ नुजूम के बरस पड़ेंगे मोतिए के फूल बन के इस मुहीब कासा-ए-हयात में न तू सुने न मैं कहूँ न मेरे अंग अंग से सदा उठे यूँँ ही मैं आँसुओं को क़हक़हों को अपने दिल में दफ़न कर के गुम लबों पे सिल धरे तिरे नगर में पा-पियादा पा-बरहना शाम के फ़िशार तक रवाँ रहूँ मगर कभी तिरी नज़र के आस्ताँ को पार तक न कर सकूँ कि तू अज़ल से ता-अबद हज़ार सद हज़ार आँख वाले वक़्त की नक़ीब है ये सिलसिला अजीब है ये सिलसिला अजीब है

Wazir Agha

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Wazir Agha.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Wazir Agha's nazm.