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चुना हम ने पहाड़ी रास्ता और सम्त का भारी सलासिल तोड़ कर सम्तों की नैरंगी से हम वाक़िफ़ हुए उभरी चट्टानों से लुढ़कने घाटियों से करवटें लेने की इक बिगड़ी रविश हम ने भी अपनाई खड्डों की तह में बहते पानियों से हम ने चलने का चलन सीखा दरख़्तों और फूलों से क़तारें तोड़ने की और हवा से मुँह उठा कर अपनी मर्ज़ी से कई सम्तों में बे-आराम होने की अदा सीखी ज़माँ से हम ने सीखा सब ज़मानों में रवाँ होना हमें रास आ गया कोसों में चलना उफ़ुक़ की सुरमई मेहराब पर नज़रें जमाए किसी सीधी सड़क पर दूर इक बस्ती के सीने से लगे बरसों पुराने हिचकियाँ लेते मकाँ की और जाने का जुनूँ मद्धम पड़ा हम बट गए चीढ़ों की शाख़ों से उतरती कतरनों में चुना हम ने पहाड़ी रास्ता

Wazir Agha0 Likes

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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"क्या लगती हो" मैं जब कोई नज़्म कहता हूँ तुम उस का उनवान लगती हो मुझ सेे मिरी बातें करती हो कौन हो तुम मेरी क्या लगती हो कितनी कम मुयस्सर हो तुम मुझ को फिर भी सारी की सारी लगती हो तुम्हें तितलियाँ तलाश करती हैं बारिशों में भीगा गुलाब लगती हो सितारे तुम्हारा तवाफ़ करते हैं फ़लक पर चमकता चाँद लगती हो आँखें ग़ज़ल हिरणी ज़ुल्फ़ घटा सावन पहाड़ी पर रक़्स करता बादल लगती हो हर एक बात वली सी करती हो जैसे किसी मज़ार की दुआ लगती हो ये हुस्न-ए-आतिश दहकता शबाब कितने ही कोह-ए-तूर जलाती हो तुम्हें ख़ामोशियाँ इस तरह पुकारती हैं जैसे गाँव में मग़रिब की अज़ान लगती हो अब क्या ज़ेहमत करें ये कहने में फ़लक से उतरा हुआ फरिश्ता लगती हो

ALI ZUHRI

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पसीना बहाता चल पसीना अपने माथे से बहाता चल गीत अपनी जीत के यूँँ गाता चल मंज़िल परखती है तो परखने दे फिर भी रोज़ नया क़दम बढ़ाता चल वक़्त देगा अपने हिसाब से मगर हर रोज़ नई ग़ज़लें सुनाता चल बहर बे-बहर सब को भूल पहले तो ख़यालों के साथ ख़ुद को बहाता चल महफ़िल आज तेरे हक़ में नहीं है तो क्या मगर तू अपने दिलकश नज़ारे सुनाता चल आँधियों ने रास्ता कब किस का रोका है तू बस इनको अपना ठेंगा दिखाता चल सुब्ह इक रोज़ दर्द से तड़पा था मगर माँ की दुआ को यादकर ख़ुद को जगाता चल हिंदू मुस्लिम मंदिर मस्जिद क्या रक्खा है तू बस बेहतर ख़ुद को इंसान बनाता चल ख़ुदा ने क्यूँ भेजा है तुझ को यहाँ पता है तू भी ख़ुद को बस बेहतर इंसान बनाता चल

Lalit Mohan Joshi

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"तलाश-ए-हक़" तलाश-ए-हक़ है गर तुझ को नज़र को तीरों के रुख़ पर लगा दे तू हदफ़ को देख दुनिया के उसे पहचान उस की जुस्तजू में रात-दिन लग जा तुझे हक़ भी मिलेगा उस तलक जाने का रस्ता भी मगर वो रास्ता चुन ले तो फिर तो ज़ख़्म खाने को जिगर भी साथ ले आना सितम पर मुस्कुराने का हुनर भी साथ ले आना यही है इंतिहा उस की यही अंजाम होता है कि इस रस्ते पे चलने का यही ईनाम होता है मगर इस रास्ते पर ज़ख़्म खाने का मज़ा कुछ और है सुन ले यहाँ पर जान देने की जज़ा कुछ और है सुन ले अगर तू अज़्म कर ले बस ज़रा सा हौसला कर ले तो फिर कल क्या पता जब फिर कोई हक़ का हो जोइंदा निशाँ रस्ते लहू के तेरे कोई नक़्श-ए-पा कर ले कि ये दुनिया तो फ़ानी है ये जाँ तो यूँँ भी जानी है तलाश-ए-हक़ है गर तुझ को नज़र को तीरों के रुख़ पर लगा दे तू

Dharmesh bashar

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“शहर-ए-ख़्वाब” कि शब तू मेरी नींदें क्यूँ नहीं लाई कई दिन हो गए उस शहर जाना है कि जिस का रास्ता नींदों से जाता है बसा है ख़ूब-सूरत शहर ख़्वाबों में यहाँ रौनक है बाज़ारों में, गलियों में महकती है फ़ज़ा फूलों की ख़ुशबू से उड़ आती तितलियाँ घर में दरीचों से शब-ए-ज़ुल्मात में भी याँ उजाला है बरसता है फ़लक से नूर रातों में यहाँ हर शख़्स जीता है रज़ा से ख़ुद यहाँ इंसानियत ज़िंदा है लोगों में यहाँ रहते हैं मुझ जैसे ही दीवाने मुहब्बत है जिन्हें पूरे ज़माने से यहाँ आब-ओ-हवा में सिर्फ़ उल्फ़त है कि ऐसे शहर की सब को ज़रूरत है कि शब तू मेरी नींदें क्यूँ नहीं लाई कि मुझ को फिर से शहर-ए-ख़्वाब जाना है

MAHESH CHAUHAN NARNAULI

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अजीब है ये सिलसिला ये सिलसिला अजीब है हवा चले तो खेतियों में धूम चहचहों की है हवा रुके तो मुर्दनी है मुर्दनी की राख का नुज़ूल है कहाँ है तू कहाँ है तू कहाँ नहीं है तू बता अभी था तेरे गिरते उड़ते आँचलों का सिलसिला और अब उफ़ुक़ पर दूर तक गए दिनों की धूल है गए दिनों की धूल का ये सिलसिला फ़ुज़ूल है मैं रो सकूँ तो क्या ये गदली काएनात धुल सकेगी मेरे आँसुओं के झाग से मैं मुस्कुरा सकूँ तो क्या सफ़र की ख़स्तगी को भूल कर ये कारवाँ नुजूम के बरस पड़ेंगे मोतिए के फूल बन के इस मुहीब कासा-ए-हयात में न तू सुने न मैं कहूँ न मेरे अंग अंग से सदा उठे यूँँ ही मैं आँसुओं को क़हक़हों को अपने दिल में दफ़न कर के गुम लबों पे सिल धरे तिरे नगर में पा-पियादा पा-बरहना शाम के फ़िशार तक रवाँ रहूँ मगर कभी तिरी नज़र के आस्ताँ को पार तक न कर सकूँ कि तू अज़ल से ता-अबद हज़ार सद हज़ार आँख वाले वक़्त की नक़ीब है ये सिलसिला अजीब है ये सिलसिला अजीब है

Wazir Agha

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कभी हवा इक झोंका है जो दीवारों को फाँद के अक्सर हल्की सी एक चाप में ढल कर सहन में फिरता रहता है कभी हवा इक सरगोशी है जो खिड़की से लग कर पहरों ख़ुद से बातें करती है कभी हवा वो मौज-ए-सबा है जिस के पहले ही बोसे पर नन्ही मुन्नी कलियों की निन्दिया से बोझल सूजी आँखें खुल जाती हैं कभी हवा अब कैसे बताएँ हवा के रूप तो लाखों हैं पर उस का वो इक रूप तुझे भी याद तो होगा जब सन्नाटे पोरी पोरी टूट गिरे थे चाप के पाँव उखड़ गए थे सरगोशी पर कितनी चीख़ें झपट पड़ी थीं और फूलों की आँखों से शबनम की बूँदें फ़र्श-ए-ज़मीं पर चारों जानिब बिखर गई थीं

Wazir Agha

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कौन मुझे दुख दे सकता है दुख तो मेरे अंदर की किश्त वीराँ का इक तना बे-बर्ग शजर है रुत की नाज़ुक लाँबी पोरें किरनें ख़ुश्बू चाप हवाएँ जिस्मों पर जब रेंगने फिरने लगती हैं मेरे अंदर दुख का सोया पेड़ भी जाग उठता है तंग मसामों के ग़ुर्फों से लंबी नाज़ुक शाख़ें फन फैला कर तन की अंधी शिरयानों में क़दम क़दम चलने लगती हैं शरयानों से रगों रगों से नसों के अंदर तक जाने लगती हैं फिर वो गर्म लहू में मिल कर इक इक बाल की जड़ तक फैलती जाती हैं और ये मेरा सदियों पुराना मस्कन ख़ाकी मस्कन ख़ुद भी एक शजर बन जाता है वक़्त की क़तरा क़तरा टपकती सुर्ख़ ज़बाँ की नोक पे आ कर जम जाता है

Wazir Agha

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हवा कहती रही आओ चलो उस खेत को छू लें उधर इस पेड़ के पत्तों में छुप कर तालियाँ पीटें गिरें उट्ठें लुढ़क कर नहर में उतरें नहाएँ मख़मलीं सब्ज़े पे नंगे पाँव चल कर दूर तक जाएँ हवा कहती रही आओ मगर मैं ख़ुश्क छागल अपने दाँतों में दबाए प्यास की बरहम सिपह से लड़ रहा था मैं कहाँ जाता मुझे सूरज के रथ से आतिशीं तीरों का आना और छागल से हुमक कर आब का गिरना किसी बच्चे का रोना और पानी माँगना भूला नहीं था मैं कहाँ जाता मैं अपने हाथ पर उभरी रगों में क़ैद अपनी आँख की तपती हुई रेग-ए-रवाँ में जज़्ब था यकसर मुझे इक जुरआ'-ए-आब-ए-सफ़ा दरकार था और मेरे बच्चे ने सदा दी थी मुझे आओ ख़ुदारा अब तो आ जाओ कि मेरे होंट अब फट भी चुके आँखों का अमृत सूख कर बादल बना उड़ भी गया हवा कहती रही आओ ये बंधन तोड़ दो प्यारे मगर मैं हाथ पर उभरी रगों में क़ैद अपनी आँख की तपती हुई रेग-ए-रवाँ में जज़्ब क्या करता कहाँ जाता

Wazir Agha

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घुटनों पे रख कर हाथ उठी थकी आवाज़ में बोली बहुत लम्बा सफ़र है उम्र के मुँह ज़ोर दरिया का उखड़ते पत्थरों चिकनी फिसलती साअ'तों का ये सफ़र मुश्किल बहुत है थकन बोझल मनों बोझल बदन अपना उठा कर चल पड़ी चलती रही फिर एक दिन भारी पपोटों को उठा कर उस ने देखा रास्ते के बीच एक बरगद पुराना समाधी ओढ़ कर बैठा हुआ था थकन कुब्ड़े असा को टेकती बरगद के साए में चली आई मअन ठिटकी ठिठक कर रुक गई बोली चलो हम भी यहाँ रुक कर समाधी ओढ़ लेते हैं चलो हम भी उतरते हैं ख़ुद अपनी तह के अंदर और ख़ुद को ढूँडते हैं अबद तक नींद के दरिया में हम भी ऊँघते हैं थकन घुटनों पे रख कर हाथ उठी थकी आवाज़ में बोली बहुत लम्बा सफ़र है

Wazir Agha

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