nazmKuch Alfaaz

तमाम शब की दुखन, बे-कली, सुबुक ख़्वाबी नुमूद-ए-सुब्ह को दरमाँ समझ के काटी है रगों में दौड़ते फिरते लहू की हर आहट अजल-गिरफ़्ता ख़यालों को आस देती है मगर वो आँख जो सब देखती है हँसती है उफ़ुक़ से सुब्ह की पहली किरन उभरती है तमाम रात की फ़रियाद इक सुकूत में चुप तमाम शब की दुखन, बे-कली, सुबुक-ख़्वाबी हरीरी पर्दों की ख़ामोश सिलवटों में गुम जो आँख ज़िंदा थी ख़ामोश छत को तकती है और एक आँख जो सब देखती है हँसी नुमूद-ए-सुब्ह की ज़रतार रौशनी के साथ महकते फूल दरीचे से झाँक कर देखें तू मेज़ दर पे किसी दर्द का निशाँ न मिले उगालदान दवाओं की शीशियाँ पंखा कुँवारी माँ का तबस्सुम, सलीब आवेज़ां हर एक चीज़ ब-दस्तूर अपनी अपनी जगह नए मरीज़ की आमद का इंतिज़ार करे और एक आँख जो सब देखती है हँसती रहे.

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मिरी सदा है गुल-ए-शम्-ए-शाम-ए-आज़ादी सुना रहा हूँ दिलों को पयाम आज़ादी लहू वतन के शहीदों का रंग लाया है उछल रहा है ज़माने में नाम-ए-आज़ादी मुझे बक़ा की ज़रूरत नहीं कि फ़ानी हूँ मिरी फ़ना से है पैदा दवाम-ए-आज़ादी जो राज करते हैं जम्हूरियत के पर्दे में उन्हें भी है सर-ओ-सौदा-ए-ख़ाम-ए-आज़ादी बनाएँगे नई दुनिया किसान और मज़दूर यही सजाएँगे दीवान-ए-आम-ए-आज़ादी फ़ज़ा में जलते दिलों से धुआँ सा उठता है अरे ये सुब्ह-ए-ग़ुलामी ये शाम-ए-आज़ादी ये महर-ओ-माह ये तारे ये बाम हफ़्त-अफ़्लाक बहुत बुलंद है इन से मक़ाम-ए-आज़ादी फ़ज़ा-ए-शाम-ओ-सहर में शफ़क़ झलकती है कि जाम में है मय-ए-लाला-फ़ाम-ए-आज़ादी स्याह-ख़ाना-ए-दुनिया की ज़ुल्मतें हैं दो-रंग निहाँ है सुब्ह-ए-असीरी में शाम-ए-आज़ादी सुकूँ का नाम न ले है वो क़ैद-ए-बे-मीआद है पय-ब-पय हरकत में क़याम-ए-आज़ादी ये कारवान हैं पसमाँदगान-ए-मंज़िल के कि रहरवों में यही हैं इमाम-ए-आज़ादी दिलों में अहल-ए-ज़मीं के है नीव उस की मगर क़ुसूर-ए-ख़ुल्द से ऊँचा है बाम-ए-आज़ादी वहाँ भी ख़ाक-नशीनों ने झंडे गाड़ दिए मिला न अहल-ए-दुवल को मक़ाम-ए-आज़ादी हमारे ज़ोर से ज़ंजीर-ए-तीरगी टूटी हमारा सोज़ है माह-ए-तमाम-ए-आज़ादी तरन्नुम-ए-सहरी दे रहा है जो छुप कर हरीफ़-ए-सुब्ह-ए-वतन है ये शाम-ए-आज़ादी हमारे सीने में शो'ले भड़क रहे हैं 'फ़िराक़' हमारी साँस से रौशन है नाम-ए-आज़ादी

Firaq Gorakhpuri

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"शर्तें" वो एक लम्हा जो उस की मेरी अमीक़ क़ुर्बत की रौशनी था हमारी दोनों की ज़िन्दगी था अजीब शर्तों पे जल रहा है वो लम्हा करवट बदल रहा है वो कह रही है कि मुझ सेे मिलने की आरज़ू तुम जब इतनी ज़ियादा शदीद कर लो कि साँस लेने में मुश्किलें हों तो मुझ को आ कर गले लगाना और अपनी सारी उखड़ती साँसों की क़ैद परियाँ छुड़ा ले जाना लिहाज़ा इक दिन मैं जैसे तैसे तमाम अपनी उखड़ती साँसों की क़ैद परियाँ बचाने निकला छुड़ाने निकला तो भेद जाना किसे ख़बर थी कि मेरी साँसें जब एक मंज़िल पे जा रुकेंगी तो उस की शर्तें नकार देंगी वो एक लम्हा जो उस की मेरी अमीक़ क़ुर्बत की रौशनी था हमारी दोनों की ज़िन्दगी था हलाक शर्तों को कर गया है किसी अँधेरे में मर गया है

ZARKHEZ

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"जंगल" रोज़ शाम आती है और वो बताती है पहले सब मुकम्मल था ये उजाड़ जंगल था जो तमाम पत्थर हैं शोर के वो मंज़र हैं शोर भी मशीनों का पेड़ों का ज़मीनों का और हसरतों का था शोर नफ़रतों का था जो उठा था ग़ारों से उजड़े इन दयारों से एक शोर पल पल था ये उजाड़ जंगल था

Ajay Kumar

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सफ़ेद शर्ट थी तुम सीढ़ियों पे बैठे थे मैं जब क्लास से निकली थी मुस्कुराते हुए हमारी पहली मुलाक़ात याद है ना तुम्हें? इशारे करते थे तुम मुझ को आते जाते हुए तमाम रात को आँखें न भूलती थीं मुझे कि जिन में मेरे लिए इज़्ज़त और वक़ार दिखे मुझे ये दुनिया बयाबान थी मगर इक दिन तुम एक बार दिखे और बेशुमार दिखे मुझे ये डर था कि तुम भी कहीं वो ही तो नहीं जो जिस्म पर ही तमन्ना के दाग़ छोड़ते हैं ख़ुदा का शुक्र कि तुम उन सेे मुख़्तलिफ़ निकले जो फूल तोड़ के ग़ुस्से में बाग़ छोड़ते हैं ज़ियादा वक़्त न गुज़रा था इस तअल्लुक़ को कि उस के बा'द वो लम्हा करीं करीं आया छुआ था तुम ने मुझे और मुझे मोहब्बत पर यक़ीन आया था लेकिन कभी नहीं आया फिर उस के बा'द मेरा नक़्शा-ए-सुकूत गया मैं कश्मकश में थी तुम मेरे कौन लगते हो मैं अमृता तुम्हें सोचूँ तो मेरे साहिर हो मैं फ़ारिहा तुम्हें देखूँ तो जॉन लगते हो हम एक साथ रहे और हमें पता न चला तअल्लुक़ात की हद बंदियाँ भी होती हैं मोहब्बतों के सफ़र में जो रास्ते हैं वहीं हवस की सिम्त में पगडंडियाँ भी होती हैं तुम्हारे वास्ते जो मेरे दिल में है 'हाफ़ी' तुम्हें ये काश मैं सब कुछ कभी बता पाती और अब मज़ीद न मिलने की कोई वजह नहीं बस अपनी माँ से मैं आँखें नहीं मिला पाती

Tehzeeb Hafi

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"एक सीख" रिश्ते छूटे मेरे तो रिश्तों में समझौता करना सीखा भरोसा हार कर मोहब्बत में, फिर भरोसा करना सीखा मुझे समझा नहीं किसी ने तो लोगों को और अच्छे से समझना सीखा टूटा जब जब रेत का किला नया बनाते बनाते सब्र करना सीखा ख़ुद भटकने के बा'द मुसाफ़िरों के लिए राहों पर निशान छोड़ना सीखा दगा सेह के मैं ने हर बार ही वफ़ा करना सीखा जब झेला तन्हाई लोगों के अकेलेपन में साथ रहना सीखा तमाम उम्र सीख सीख कर गुज़ारी तो मैं ने हर तजरबे के दो पहलू में से हर दफा अच्छा ही सीखना सीखा

Pushkar Tripathi

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रात भर नर्म हवाओं के झोंके वक़्त की मौज रवाँ पर बहते तेरी यादों के सफ़ीने लाए कि जज़ीरों से निकल कर आए गुज़रा वक़्त का दामन था में तिरी यादें तिरे ग़म के साए एक इक हर्फ़-ए-वफ़ा की ख़ुश्बू मौजा-ए-गुल में सिमट कर आए एक इक अहद-ए-वफ़ा का मंज़र ख़्वाब की तरह गुज़रते बादल तेरी क़ुर्बत के महकते हुए पल मेरे दामन से लिपटने आए नींद के बार से बोझल आँखें गर्द-ए-अय्याम से धुँदलाए हुए एक इक नक़्श को हैरत से तकें लेकिन अब उन से मुझे क्या लेना मेरे किस काम के ये नज़राने एक छोड़ी हुई दुनिया के सफ़ीर मेरे ग़म-ख़ाने में फिर क्यूँँ आए दर्द का रिश्ता रिफ़ाक़त की लगन रूह की प्यास मोहब्बत के चलन मैं ने मुँह मोड़ लिया है सब से मैं ने दुनिया के तक़ाज़े समझे अब मेरे पास कोई क्यूँँ आए रात भर नौहा-कुनाँ याद की बिफरी मौजें मेरे ख़ामोश दर ओ बाम से टकराती हैं मेरे सीने के हर इक ज़ख़्म को सहलाती है मुझे एहसास की उस मौत पर सह दे कर सुब्ह के साथ निगूँ सार पलट जाती है

Mahmood Ayaz

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खुली आँखों को कोई बंद कर दो खुली आँखों की वीरानी से हौल आता है कोई इन खुली आँखों को बढ़ कर बंद कर दो ये आँखें इक अनोखी यख़-ज़दा दुनिया की साकित रौशनी में खो गई हैं अब इन आँखों में कोई रंग पैदा है न कोई रंग पिन्हाँ है न कोई अक्स-ए-गुल-बन है न कोई दाग़-ए-हिर्मां है न गंज-ए-शाएगाँ की आरज़ू-ए-बे-निहायत है न रंज-ए-राएगाँ का अक्स-ए-लर्ज़ां है अगर कुछ है तो बस इक यख़-ज़दा नया का नक़्श-ए-जावेदाँ है ये आँखें अब शुआ-ए-आरज़ू की हर किरन से यूँँ गुरेज़ाँ हैं कि पत्थर बन गई हैं ये आँखें मर गई हैं

Mahmood Ayaz

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सारे अफ़्क़ार-ओ-अक़ाएद के तिलिस्म सारे असनाम-ए-ख़याल हम ने वो बुत-शिकनी की है कि मिस्मार हैं सब अपने घर बार की महफ़ूज़ फ़सीलें हम ने यूँँ गिराई हैं कि अब दूर-ओ-नज़दीक की हर तुंद हवा सब चराग़ों को बस इक फूँक में गुल कर जाए हम कि हर सिलसिला-ओ-क़ैद की ज़ंजीर से आज़ाद हुए ऐसे मज्लिस के मकीं हैं कि जहाँ कोई दरवाज़ा कोई रौज़न-ए-दीवार नहीं या ख़ुदा कोई ग़म ऐसा कि हर ग़म को सुबुकसार करे कोई आग ऐसी कि हर आग को ख़ाशाक करे कोई मफ़्हूम कोई नक़्श-ए-तमन्ना कि जिसे अपने दिल-ओ-जाँ का लहू नज़्र करूँँ सुर्ख़-रू हो के कहूँ ज़ीस्त की ये मोहलत दो-एक नफ़स इतनी बे-रंग न थी इतनी फ़रोमाया न थी

Mahmood Ayaz

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तुम ने मुझ से कोई इक़रार‌‌‌‌-ए-रिफ़ाक़त न किया ये न कहा तुम से बिछड़ जाऊँ तो ज़िंदा न रहूँ मैं ने तुम्हें ज़ीस्त का सरमाया मिरा हासिल-ए-यक-उम्र-ए-तमन्ना न कहा इस क़दर झूट से दहशत-ज़दा थे हम कि कोई सच न कहा मैं ने बस इतना कहा देखो हम और तुम इस आग का हिस्सा हैं जो ख़ाशाक की मानिंद जलाती है हमें तुम ने बस इतना कहा देखो इस आग में हम दोनों अकेले भी हैं साथी भी हैं और हम करते रहे उम्र-ए-मह-ओ-साल के ज़ख़्मों का शुमार कहकशाँ फीकी है कुछ देर का मेहमान है चाँद डूबती रात में ढलते हुए साए चुप हैं मेरी शिरयानों में यख़-बस्ता लहू हैराँ है अव्वलीं क़ुर्ब की ये आँच कहाँ से आई अजनबी कैसे कहूँ तुम तो मिरे दिल के निहाँ-ख़ाने में सोए हुए हर ख़्वाब का चेहरा निकले

Mahmood Ayaz

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गुज़रे हुए माह ओ साल के ग़म तन्हाई शब में जाग उट्ठे हैं उम्र-ए-रफ़्ता की जुस्तुजू में अश्कों के चराग़ जल रहे हैं आसाइश-ए-ज़िंदगी की हसरत माज़ी का नक़्श बन चुकी है हालात की ना-गुज़ीर तल्ख़ी एक एक नफ़स में बस गई है नाकामी-ए-आरज़ू को दिल ने तस्लीम ओ रज़ा के नाम बख़्शे मिलने की ख़ुशी बिछड़ने का ग़म क्या क्या थे फ़रेब-ए-ज़िंदगी के इक उम्र में अब समझ सके हैं ख़ुशियों का फ़ुसूँ गुरेज़ पा है अब तर्क दुआ की मंज़िलें हैं दामान-ए-तलब सिमट चुका है नाकामी-ए-शौक़ मिटते मिटते जीने का शुऊर दे गई है ये ग़म है नवाए शब का हासिल ये दर्द मता-ए-ज़िंदगी है उजड़ी हुई हर रविश चमन की देती है सुराग़ रंग ओ बू का वीरान हैं ज़िंदगी की राहें रौशन है चराग़ आरज़ू का

Mahmood Ayaz

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