nazmKuch Alfaaz

तुझे छू कर बहार आई थी कुंज-ए-ग़म में बरसा था तिरे आने से सावन चाँदनी छिटकी थी फूली थी शफ़क़ बोली थी कोयल देख कर तुझ को अमल ये साँस लेने का बहुत आसाँ हुआ था खेल सा लगने लगा था आज़माइश से गुज़रना कारज़ार-ए-ज़ीस्त में, दिन रात करता अब... मगर फिर इब्तिदास काविश-ए-पैहम में घू में जा रहे हैं वक़्त के पहिए नए तकलीफ़-दह आग़ाज़ से हम को गुज़रना पड़ रहा है फिर।।।

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।

Divya 'Kumar Sahab'

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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!

Raghav Ramkaran

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जब वो मुझ को कहती थी एक शे'र सुनाओ उस के उपरी लब को चूम के हट जाता था उस के ज़ेहन में क्या आता था? तैश में आ कर कहती थी - “शे'र मुकम्मल कौन करेगा? सानी मिसरा कौन पढ़ेगा?”

Zubair Ali Tabish

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राग डूब जाते हैं साज़ टूट जाते हैं आसमाँ के गोशों में अन-गिनत सितारों के दीप बुझने लगते हैं दिन की धूप में अक्सर वस्ल-ए-मुमकिना के सब अहद छोड़ देते हैं बातों में खनक नापैद और चमक निगाहों में माँद पड़ती जाती है रेश्मीन लहजे भी खुरदुरे से लगते हैं सोहबतों में पहली सी बे-ख़ुदी नहीं रहती चेहरा-ए-रिफ़ाक़त पर ज़र्दी छाने लगती है जज़्ब-ए-इश्क़ को थक कर नींद आने लगती है तजरबे की सरहद पर आ के भेद खुलता है कोई भी तअल्लुक़ हो, एक सा नहीं रहता

Mah Talat Zahidi

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अभी तो फ़ुटपाथ के मकीनों की क़िस्मतों में घरों के सपने हैं ना-मुकम्मल अभी तो रस्ते तवील हैं राह में गड्ढे हैं अभी तो जंगें हैं सरहदें हैं मुहाजरत है अभी तो ज़ातों का देवता मुस्कुरा रहा है अभी शिकस्तें हैं चार-जानिब अभी मोहब्बत बरहना-पा है अभी है शहर-ए-बुताँ का मरकज़ बहुत सा रेशम बहुत सी चाँदी बहुत सा सोना अभी तो इंसान तुल रहा है अभी हवाएँ जिला-वतन हैं अभी है ख़ुशबू गुरेज़-पा कोहर है धुआँ है अभी सुरंगें हैं लंबी लंबी और उन सुरंगों के पार क्या है किसे पता है कि अब वो आँखें नहीं रहीं जिन में रौशनी थी

Mah Talat Zahidi

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रोज़-ओ-शब हल्क़ा-ए-आफ़ात हैं हर लहजा जवाँ सिलसिला वक़्त की गर्दिश का यहाँ सब हैं पाबंदी-ए-औक़ात-ए-ज़माना में मगन जान-आे-तन फ़हम-ओ-ख़िरद होश-ओ-गुमाँ तुम ही तन्हा नहीं इस सैल-ए-रवाँ में मजबूर मैं भी जीती हूँ यहाँ ख़ुद से गुरेज़ाँ हो कर फिर भी इक लम्हे की फ़ुर्सत जो मुयस्सर आए दिल वहीं चुपके से धड़कन को जगा देता है तार-रातों में बिखरती हैं रुपहली किरनें चाँदनी पिछली मुलाक़ातों के आईने में रोज़-ए-आइंदास मिलती है गले कहती है अन-कही बातों की ख़ुश्बू से मोअ'त्तर रखना अपनी आवाज़ अभी ज़िंदगी कितनी ही बे-मेहर सहमी फिर भी बहार आएगी आँखों में बसाए रखना मेरे अंदाज़ अभी

Mah Talat Zahidi

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