nazmKuch Alfaaz

अभी तो फ़ुटपाथ के मकीनों की क़िस्मतों में घरों के सपने हैं ना-मुकम्मल अभी तो रस्ते तवील हैं राह में गड्ढे हैं अभी तो जंगें हैं सरहदें हैं मुहाजरत है अभी तो ज़ातों का देवता मुस्कुरा रहा है अभी शिकस्तें हैं चार-जानिब अभी मोहब्बत बरहना-पा है अभी है शहर-ए-बुताँ का मरकज़ बहुत सा रेशम बहुत सी चाँदी बहुत सा सोना अभी तो इंसान तुल रहा है अभी हवाएँ जिला-वतन हैं अभी है ख़ुशबू गुरेज़-पा कोहर है धुआँ है अभी सुरंगें हैं लंबी लंबी और उन सुरंगों के पार क्या है किसे पता है कि अब वो आँखें नहीं रहीं जिन में रौशनी थी

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!

Raghav Ramkaran

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"तुम हो" तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो मैं होश में बाहोश में मिरे जिस्म का तुम ख़ून हो तुम सर्द हो बरसात भी मिरी गर्मियों की तुम जून हो तुम ग़ज़ल हो हो तुम शा'इरी मिरी लिखी नज़्म की धुन हो मिरी हँसी भी तुम मिरी ख़ुशी भी तुम मिरे इस हयात की मम्नून हो तुम धूप हो मिरी छाँव भी तुम सियाह रात का मून हो तुम सिन हो तुम काफ़ भी तुम वाओ के बा'द की नून हो तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो

ZafarAli Memon

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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।

Divya 'Kumar Sahab'

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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो

Gulzar

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तुझे छू कर बहार आई थी कुंज-ए-ग़म में बरसा था तिरे आने से सावन चाँदनी छिटकी थी फूली थी शफ़क़ बोली थी कोयल देख कर तुझ को अमल ये साँस लेने का बहुत आसाँ हुआ था खेल सा लगने लगा था आज़माइश से गुज़रना कारज़ार-ए-ज़ीस्त में, दिन रात करता अब... मगर फिर इब्तिदास काविश-ए-पैहम में घू में जा रहे हैं वक़्त के पहिए नए तकलीफ़-दह आग़ाज़ से हम को गुज़रना पड़ रहा है फिर।।।

Mah Talat Zahidi

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राग डूब जाते हैं साज़ टूट जाते हैं आसमाँ के गोशों में अन-गिनत सितारों के दीप बुझने लगते हैं दिन की धूप में अक्सर वस्ल-ए-मुमकिना के सब अहद छोड़ देते हैं बातों में खनक नापैद और चमक निगाहों में माँद पड़ती जाती है रेश्मीन लहजे भी खुरदुरे से लगते हैं सोहबतों में पहली सी बे-ख़ुदी नहीं रहती चेहरा-ए-रिफ़ाक़त पर ज़र्दी छाने लगती है जज़्ब-ए-इश्क़ को थक कर नींद आने लगती है तजरबे की सरहद पर आ के भेद खुलता है कोई भी तअल्लुक़ हो, एक सा नहीं रहता

Mah Talat Zahidi

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रोज़-ओ-शब हल्क़ा-ए-आफ़ात हैं हर लहजा जवाँ सिलसिला वक़्त की गर्दिश का यहाँ सब हैं पाबंदी-ए-औक़ात-ए-ज़माना में मगन जान-आे-तन फ़हम-ओ-ख़िरद होश-ओ-गुमाँ तुम ही तन्हा नहीं इस सैल-ए-रवाँ में मजबूर मैं भी जीती हूँ यहाँ ख़ुद से गुरेज़ाँ हो कर फिर भी इक लम्हे की फ़ुर्सत जो मुयस्सर आए दिल वहीं चुपके से धड़कन को जगा देता है तार-रातों में बिखरती हैं रुपहली किरनें चाँदनी पिछली मुलाक़ातों के आईने में रोज़-ए-आइंदास मिलती है गले कहती है अन-कही बातों की ख़ुश्बू से मोअ'त्तर रखना अपनी आवाज़ अभी ज़िंदगी कितनी ही बे-मेहर सहमी फिर भी बहार आएगी आँखों में बसाए रखना मेरे अंदाज़ अभी

Mah Talat Zahidi

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