ये तेरे हिज्र की आँधी कहाँ ले आई है मुझ को यहाँ हर सम्त इक सूरज सवा नेज़े पे जलता है न सर से धूप उतरती है न साया कोई ढलता है हवा-ए-शाम चलती है न कोई शम्अ'' जलती है फ़लक पर नज्म आते हैं न तो महताब आता है किसी की आँख सोती है न कोई ख़्वाब आता है
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जब वो मुझ को कहती थी एक शे'र सुनाओ उस के उपरी लब को चूम के हट जाता था उस के ज़ेहन में क्या आता था? तैश में आ कर कहती थी - “शे'र मुकम्मल कौन करेगा? सानी मिसरा कौन पढ़ेगा?”
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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दौलत ना अता करना मौला, शोहरत ना अता करना मौला बस इतना अता करना चाहे जन्नत ना अता करना मौला शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब कुर्बान पतंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो बस एक सदा ही सुनें सदा बर्फ़ीली मस्त हवाओं में बस एक दुआ ही उठे सदा जलते-तपते सेहराओं में जीते-जी इस का मान रखें मर कर मर्यादा याद रहे हम रहें कभी ना रहें मगर इस की सज-धज आबाद रहे जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो गीता का ज्ञान सुने ना सुनें, इस धरती का यशगान सुनें हम सबद-कीर्तन सुन ना सकें भारत मां का जयगान सुनें परवरदिगार,मैं तेरे द्वार पर ले पुकार ये आया हूँ चाहे अज़ान ना सुनें कान पर जय-जय हिन्दुस्तान सुनें जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो
Kumar Vishwas
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'उदासी' इबारत जो उदासी ने लिखी है बदन उस का ग़ज़ल सा रेशमी है किसी की पास आती आहटों से उदासी और गहरी हो चली है उछल पड़ती हैं लहरें चाँद तक जब समुंदर की उदासी टूटती है उदासी के परिंदों तुम कहाँ हो मिरी तन्हाई तुम को ढूँढती है मिरे घर की घनी तारीकियों में उदासी बल्ब सी जलती रही है उदासी ओढ़े वो बूढ़ी हवेली न जाने किस का रस्ता देखती है उदासी सुब्ह का मासूम झरना उदासी शाम की बहती नदी है
Sandeep Thakur
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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क्या कहूँ ज़ख़्म कितना गहरा है दूर तक सिर्फ़ महज़ सहरा है हर क़दम पर बगूले रक़्साँ हैं राह में हर-सू शो'ले रक़्साँ हैं न शजर है न कोई साया है कोई चश्मा न कोई दरिया है धूप सर पर बरसती रहती है प्यास लब पर लरज़ती रहती है तीरगी चश्म-ए-तर पे तारी है और सफ़र है कि फिर भी जारी है
Qaisar Ziya Qaisar
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मैं उस को तकता रहता हूँ जो फ़र्रुख़-ज़ाद की ग़ज़लों की सूरत ख़ूब-सूरत है कि जिस के फूल से तन को किसी रंगीन तितली के रसीले मो'तबर होंटों के बोसों की ज़रूरत है वो इक शहकार है शायद ख़ुदा-ए-पाक के फ़न का कि जिस की सादगी में भी है रक़्साँ हुस्न का जादू कमर सीना हो गर्दन हो कि उस के दस्त और बाज़ू तराशें सब की ऐसी हैं कि जैसे ला'ल के चाक़ू जबीं पर माह का जल्वा और उस पर अब्र के गेसू सुलगते गोरे गालों पर शफ़क़ के ग़ाज़े की ख़ुश्बू गुलाबों से फड़कते लब और उस पर प्यास बे-क़ाबू हैं नर्गिस की तरह उस की चमकती झील सी आँखें मगर बे-नूर हैं ऐसी कि जैसे तंग ग़ारों की सियह पलकों पे ठहरे हों अँधेरी रात के आँसू ये मंज़र रूह पर मेरी पिघलते शीशों की सूरत मुक़त्तर होता रहता है कि जिस की सोज़िशों में मैं तड़पता चीख़ता रहता हूँ सुब्ह-ओ-शाम हर इक पल कि मेरी धड़कनों साँसों को चाहे मुंजमिद कर दो मगर इस ख़ूब-रू दुनिया के तारीक आसमानों को मिरी आँखों के तारों से जहाँ तक हो सके भर दो ये सुन कर क़स्र के सारे दर-ओ-दीवार पर तूफ़ाँ सा बरपा होने लगता है कि ऐ नादान शहज़ादे तू ऐसा कर नहीं सकता जुनूँ की उजड़ी मांगों में तू अफ़्शाँ भर नहीं सकता तिरी धड़कन तिरी साँसें तिरी ख़्वाबों से पुर आँखें तिरे अज्दाद के सूरज की किरनों की अमानत हैं जो शाही तख़्त पर रौशन चराग़ों की ज़मानत हैं
Qaisar Ziya Qaisar
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मिरी ज़ुल्फ़ें नहीं काली घटा हैं मिरी पेशानी है महताब जैसी मिरी आँखें कँवल की पंखुड़ी हैं मिरे लब हैं गुलाबों से मुशाबह मिरे गालों में है लाली शफ़क़ की मिरी गर्दन सुराही-दार देखो मिरी बाहें हैं मिस्ल-ए-शाख़-ए-संदल बदन मेरा है लाला-ज़ार देखो अदाओं में मिरी जादूगरी है मिरी हस्ती मुकम्मल शाइ'री है हवस के मारो में बाज़ार में हूँ गुल-ए-तर हूँ प नोक-ए-ख़ार में हूँ मिरे हुस्न-ओ-जवानी के मुनासिब लगाव दाम और मुझ को ख़रीदो कि हर सूरत अदा करना है मुझ को किसी बीवी की लाचारी का क़र्ज़ा किसी शौहर की बीमारी का क़र्ज़ा
Qaisar Ziya Qaisar
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