nazmKuch Alfaaz

मैं उस को तकता रहता हूँ जो फ़र्रुख़-ज़ाद की ग़ज़लों की सूरत ख़ूब-सूरत है कि जिस के फूल से तन को किसी रंगीन तितली के रसीले मो'तबर होंटों के बोसों की ज़रूरत है वो इक शहकार है शायद ख़ुदा-ए-पाक के फ़न का कि जिस की सादगी में भी है रक़्साँ हुस्न का जादू कमर सीना हो गर्दन हो कि उस के दस्त और बाज़ू तराशें सब की ऐसी हैं कि जैसे ला'ल के चाक़ू जबीं पर माह का जल्वा और उस पर अब्र के गेसू सुलगते गोरे गालों पर शफ़क़ के ग़ाज़े की ख़ुश्बू गुलाबों से फड़कते लब और उस पर प्यास बे-क़ाबू हैं नर्गिस की तरह उस की चमकती झील सी आँखें मगर बे-नूर हैं ऐसी कि जैसे तंग ग़ारों की सियह पलकों पे ठहरे हों अँधेरी रात के आँसू ये मंज़र रूह पर मेरी पिघलते शीशों की सूरत मुक़त्तर होता रहता है कि जिस की सोज़िशों में मैं तड़पता चीख़ता रहता हूँ सुब्ह-ओ-शाम हर इक पल कि मेरी धड़कनों साँसों को चाहे मुंजमिद कर दो मगर इस ख़ूब-रू दुनिया के तारीक आसमानों को मिरी आँखों के तारों से जहाँ तक हो सके भर दो ये सुन कर क़स्र के सारे दर-ओ-दीवार पर तूफ़ाँ सा बरपा होने लगता है कि ऐ नादान शहज़ादे तू ऐसा कर नहीं सकता जुनूँ की उजड़ी मांगों में तू अफ़्शाँ भर नहीं सकता तिरी धड़कन तिरी साँसें तिरी ख़्वाबों से पुर आँखें तिरे अज्दाद के सूरज की किरनों की अमानत हैं जो शाही तख़्त पर रौशन चराग़ों की ज़मानत हैं

Related Nazm

''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

295 likes

"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

191 likes

"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो

Rakesh Mahadiuree

25 likes

"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

180 likes

मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं

Tehzeeb Hafi

161 likes

More from Qaisar Ziya Qaisar

क्या कहूँ ज़ख़्म कितना गहरा है दूर तक सिर्फ़ महज़ सहरा है हर क़दम पर बगूले रक़्साँ हैं राह में हर-सू शो'ले रक़्साँ हैं न शजर है न कोई साया है कोई चश्मा न कोई दरिया है धूप सर पर बरसती रहती है प्यास लब पर लरज़ती रहती है तीरगी चश्म-ए-तर पे तारी है और सफ़र है कि फिर भी जारी है

Qaisar Ziya Qaisar

0 likes

ये तेरे हिज्र की आँधी कहाँ ले आई है मुझ को यहाँ हर सम्त इक सूरज सवा नेज़े पे जलता है न सर से धूप उतरती है न साया कोई ढलता है हवा-ए-शाम चलती है न कोई शम्अ'' जलती है फ़लक पर नज्म आते हैं न तो महताब आता है किसी की आँख सोती है न कोई ख़्वाब आता है

Qaisar Ziya Qaisar

0 likes

मिरी ज़ुल्फ़ें नहीं काली घटा हैं मिरी पेशानी है महताब जैसी मिरी आँखें कँवल की पंखुड़ी हैं मिरे लब हैं गुलाबों से मुशाबह मिरे गालों में है लाली शफ़क़ की मिरी गर्दन सुराही-दार देखो मिरी बाहें हैं मिस्ल-ए-शाख़-ए-संदल बदन मेरा है लाला-ज़ार देखो अदाओं में मिरी जादूगरी है मिरी हस्ती मुकम्मल शाइ'री है हवस के मारो में बाज़ार में हूँ गुल-ए-तर हूँ प नोक-ए-ख़ार में हूँ मिरे हुस्न-ओ-जवानी के मुनासिब लगाव दाम और मुझ को ख़रीदो कि हर सूरत अदा करना है मुझ को किसी बीवी की लाचारी का क़र्ज़ा किसी शौहर की बीमारी का क़र्ज़ा

Qaisar Ziya Qaisar

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Qaisar Ziya Qaisar.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Qaisar Ziya Qaisar's nazm.