क्या कहूँ ज़ख़्म कितना गहरा है दूर तक सिर्फ़ महज़ सहरा है हर क़दम पर बगूले रक़्साँ हैं राह में हर-सू शो'ले रक़्साँ हैं न शजर है न कोई साया है कोई चश्मा न कोई दरिया है धूप सर पर बरसती रहती है प्यास लब पर लरज़ती रहती है तीरगी चश्म-ए-तर पे तारी है और सफ़र है कि फिर भी जारी है
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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!
Raghav Ramkaran
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जब वो मुझ को कहती थी एक शे'र सुनाओ उस के उपरी लब को चूम के हट जाता था उस के ज़ेहन में क्या आता था? तैश में आ कर कहती थी - “शे'र मुकम्मल कौन करेगा? सानी मिसरा कौन पढ़ेगा?”
Zubair Ali Tabish
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हम घूम चुके बस्ती बन में इक आस की फाँस लिए मन में कोई साजन हो कोई प्यारा हो कोई दीपक हो, कोई तारा हो जब जीवन रात अँधेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो जब सावन बादल छाए हों जब फागुन फूल खिलाए हों जब चंदा रूप लुटाता हो जब सूरज धूप नहाता हो या शाम ने बस्ती घेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो हाँ दिल का दामन फैला है क्यूँँंगोरी का दिल मैला है हम कब तक पीत के धोके में तुम कब तक दूर झरोके में कब दीद से दिल को सेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो क्या झगड़ा सूद ख़सारे का ये काज नहीं बंजारे का सब सोना रूपा ले जाए सब दुनिया, दुनिया ले जाए तुम एक मुझे बहुतेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो
Ibn E Insha
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"मेरा रंग उड़ रहा है मेरे बाल झड़ रहे हैं" मेरा रंग उड़ रहा है मेरे बाल झड़ रहे हैं मेरे पेच खुल चुके हैं मेरे ख़म बिगड़ रहे हैं कहीं चुपके चुपके चुपके मेरी बात चल रही है कहीं कुछ अज़ीज़ मेरे, मेरे पावँ पड़ रहे हैं मेरा काम कर चुका है, मेरा ख़्वाब मर चुका है मेरी ख़ुश्क ख़ुश्क आँखों में सराब गड़ रहे हैं मेरी पसलियाँ चटक कर मेरे मुँह को आ गई हैं ग़म-ए-तिश्नगी के मारे मेरे दाँत झड़ रहे हैं मेरी आस्तीं फटी है मुझे चोट लग रही है मेरी धज्जियाँ उड़ी हैं, मेरे तार उधड़ रहे हैं मेरे ख़ून की सफ़ेदी तुम्हें क्या बता रही है ये मुझे जता रही है, मेरे ज़ख़्म सड़ रहे हैें मेरे सर पे चढ़ के अब तक वही ख़ौफ़ नाचता है कि तू कब का जा चुका है कि तू कब का जा चुका है
Ammar Iqbal
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"उस की ख़ुशियाँ" सारी झीलें सूख गई हैं उस की आँखें सूख गई हैं पेड़ों पर पंछी भी चुप हैं उस को कोई दुख है शायद रस्ते सूने सूने हैं सब उस ने टहलना छोड़ दिया है सारी ग़ज़लें बेमानी हैं उस ने पढ़ना छोड़ दिया है वो भी हँसना भूल चुकी है गुलों ने खिलना छोड़ दिया है सावन का मौसम जारी है या'नी उस का ग़म जारी है बाक़ी मौसम टाल दिए हैं सुख कूएँ में डाल दिए हैं चाँद को छुट्टी दे दी गई है तारों को मद्धम रक्खा है आतिश-दान में फेंक दी ख़ुशियाँ दिल में बस इक ग़म रक्खा है खाना पीना छोड़ दिया है सब सेे रिश्ता तोड़ दिया है हाए क़यामत आने को है उस ने जीना छोड़ दिया है हर दिल ख़ुश हर चेहरा ख़ुश हो वो हो ख़ुश तो दुनिया ख़ुश हो वो अच्छी तो सब अच्छा है और दुनिया में क्या रक्खा है ये सब सुन कर ख़ुदा ने बोला बोल तेरी अब ख़्वाहिश क्या है मैं ने बोला मेरी ख़्वाहिश मेरी ख़्वाहिश उस की ख़ुशियाँ ख़ुदा ने बोला तेरी ख़्वाहिश मैं फिर बोला उस की ख़ुशियाँ इस के अलावा पूछ रहा हूँ मैं ने बोला उस की ख़ुशियाँ अपने लिए कुछ माँग ले पगले माँग लिया ना उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ
Varun Anand
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ये तेरे हिज्र की आँधी कहाँ ले आई है मुझ को यहाँ हर सम्त इक सूरज सवा नेज़े पे जलता है न सर से धूप उतरती है न साया कोई ढलता है हवा-ए-शाम चलती है न कोई शम्अ'' जलती है फ़लक पर नज्म आते हैं न तो महताब आता है किसी की आँख सोती है न कोई ख़्वाब आता है
Qaisar Ziya Qaisar
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मैं उस को तकता रहता हूँ जो फ़र्रुख़-ज़ाद की ग़ज़लों की सूरत ख़ूब-सूरत है कि जिस के फूल से तन को किसी रंगीन तितली के रसीले मो'तबर होंटों के बोसों की ज़रूरत है वो इक शहकार है शायद ख़ुदा-ए-पाक के फ़न का कि जिस की सादगी में भी है रक़्साँ हुस्न का जादू कमर सीना हो गर्दन हो कि उस के दस्त और बाज़ू तराशें सब की ऐसी हैं कि जैसे ला'ल के चाक़ू जबीं पर माह का जल्वा और उस पर अब्र के गेसू सुलगते गोरे गालों पर शफ़क़ के ग़ाज़े की ख़ुश्बू गुलाबों से फड़कते लब और उस पर प्यास बे-क़ाबू हैं नर्गिस की तरह उस की चमकती झील सी आँखें मगर बे-नूर हैं ऐसी कि जैसे तंग ग़ारों की सियह पलकों पे ठहरे हों अँधेरी रात के आँसू ये मंज़र रूह पर मेरी पिघलते शीशों की सूरत मुक़त्तर होता रहता है कि जिस की सोज़िशों में मैं तड़पता चीख़ता रहता हूँ सुब्ह-ओ-शाम हर इक पल कि मेरी धड़कनों साँसों को चाहे मुंजमिद कर दो मगर इस ख़ूब-रू दुनिया के तारीक आसमानों को मिरी आँखों के तारों से जहाँ तक हो सके भर दो ये सुन कर क़स्र के सारे दर-ओ-दीवार पर तूफ़ाँ सा बरपा होने लगता है कि ऐ नादान शहज़ादे तू ऐसा कर नहीं सकता जुनूँ की उजड़ी मांगों में तू अफ़्शाँ भर नहीं सकता तिरी धड़कन तिरी साँसें तिरी ख़्वाबों से पुर आँखें तिरे अज्दाद के सूरज की किरनों की अमानत हैं जो शाही तख़्त पर रौशन चराग़ों की ज़मानत हैं
Qaisar Ziya Qaisar
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मिरी ज़ुल्फ़ें नहीं काली घटा हैं मिरी पेशानी है महताब जैसी मिरी आँखें कँवल की पंखुड़ी हैं मिरे लब हैं गुलाबों से मुशाबह मिरे गालों में है लाली शफ़क़ की मिरी गर्दन सुराही-दार देखो मिरी बाहें हैं मिस्ल-ए-शाख़-ए-संदल बदन मेरा है लाला-ज़ार देखो अदाओं में मिरी जादूगरी है मिरी हस्ती मुकम्मल शाइ'री है हवस के मारो में बाज़ार में हूँ गुल-ए-तर हूँ प नोक-ए-ख़ार में हूँ मिरे हुस्न-ओ-जवानी के मुनासिब लगाव दाम और मुझ को ख़रीदो कि हर सूरत अदा करना है मुझ को किसी बीवी की लाचारी का क़र्ज़ा किसी शौहर की बीमारी का क़र्ज़ा
Qaisar Ziya Qaisar
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