nazmKuch Alfaaz

"अज़िय्यत" इन आँखों के बादलों से ऐसी बरसात लगी जब से दिल को तेरे रुख़्सती की बात लगी किताब ख़ोल के मायूस मैं बैठा हूँ, लफ़्ज़ कोई ना के क़लम को भी इज़तिरार अपनी ज़ात लगी ग़ज़लों में जब ज़िक्रे-जानाँ था, तो लोगों को पसंदीदा थी तहरीरों में जो तुम मिट गए, वही ग़ज़लें दिल-फ़िगार वारदात लगी आख़री बार मिलने की हसरत अधूरी रह गई झलक तेरी इन आँखों में भी जैसे मुश्किल से मिली ख़ैरात लगी तलबगार हर शख़्स रहता जो तुझ को देख लेता क्या ही था वो मंज़र जो सुकून भरी तेरी मुलाक़ात लगी हमारी क़ुर्बत में साँसों का चलना अजब था ख़ामोशी में भी दिलकश जैसे चलती नग़मात लगी ख़ुशनुमा गुलिस्ताँ में शगुफ़्ता होती थी ख़ल्क़त कुल्फ़ते-बेदार के मलबे में फ़सी पूरी काइनात लगी काश तू कुछ पल ठहरता मेरी बातें सुनने अब तो तारों को सुनाने भी कम हर रात लगी

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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उस दिन हमें अलग होना था उस दिन उस के सारे आँसू गंगा जल में बदल रहे थे उस दिन उस के होंठ गुलाबी नीलकमल में बदल रहे थे उस दिन आँखों के सपने काले बादल में बदल रहे थे उस दिन हम दोनों के निर्णय अंतिम पल में बदल रहे थे उस दिन कुछ पाने की आशा नहीं मगर सब कुछ खोना था उस दिन हमें अलग होना था उस दिन उस की दो आँखों में अनबोये बबूल उग आए उस दिन आँखें पछतातीं थीं क्यूँ सपने फिजूल उग आए उस दिन दोनों के चेहरों पर चारों तरफ़ शूल उग आए उस दिन जहाँ गिरे थे आँसू फौरन वहाँ फूल उग आए उस दिन पता चला था हम को फूल नहीं आँसू बोना था उस दिन हमें अलग होना था उस दिन दोनों हर दुविधा को कर स्वीकार लिपट कर रोए उस दिन दोनों जग से छुप कर नदिया पार लिपट कर रोए उस दिन हर-पल ख़ुश रहने वाले त्योहार लिपट कर रोए उस दिन दोनों पहले पहले अंतिम बार लिपट कर रोए उस दिन की यादों को सारे जीवन दोनों को ढोना था उस दिन हमें अलग होना था

Gyan Prakash Akul

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काश मैं तेरे हसीं हाथ का कंगन होता तू बड़े प्यार से चाव से बड़े मान के साथ अपनी नाज़ुक सी कलाई में चढ़ाती मुझ को और बे-ताबी से फ़ुर्क़त के ख़िज़ाँ लम्हों में तू किसी सोच में डूबी जो घुमाती मुझ को मैं तिरे हाथ की ख़ुश्बू से महक सा जाता जब कभी मूड में आ कर मुझे चूमा करती तेरे होंटों की में हिद्दत से दहक सा जाता रात को जब भी तू नींदों के सफ़र पर जाती मरमरीं हाथ का इक तकिया बनाया करती मैं तिरे कान से लग कर कई बातें करता तेरी ज़ुल्फ़ों को तिरे गाल को चूमा करता जब भी तू बंद-ए-क़बा खोलने लगती जानाँ अपनी आँखों को तिरे हुस्न से ख़ीरा करता मुझ को बेताब सा रखता तिरी चाहत का नशा मैं तिरी रूह के गुलशन में महकता रहता मैं तिरे जिस्म के आँगन में खनकता होता कुछ नहीं तो यही बे-नाम सा बंधन होता काश मैं तेरे हसीं हाथ का कंगन होता

Wasi Shah

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"हेलुसिनेशन" मैं अपने बंद कमरे में पड़ा हूँ और इक दीवार पर नज़रें जमाए मनाज़िर के अजूबे देखता हूँ उसी दीवार में कोई ख़ला है मुझे जो ग़ार जैसा लग रहा है वहाँ मकड़ी ने जाल बुन लिया है और अब अपने ही जाल में फँसी है वहीं पर एक मुर्दा छिपकिली है कई सदियों से जो साकित पड़ी है अब उस पर काई जमती जा रही है और उस में एक जंगल दिख रहा है दरख़्तों से परिंदे गिर रहे हैं कुल्हाड़ी शाख़ पर लटकी हुई है लक़ड़हारे पे गीदड़ हँस रहे मुसलसल तेज़ बारिश हो रही है किसी पत्ते से गिर कर एक क़तरा अचानक एक समुंदर बन गया है समुंदर नाव से लड़ने लगा है मछेरा मछलियों में घिर गया है और अब पतवार सीने से लगा कर वो नीले आसमाँ को देखता है जो यक-दम ज़र्द पड़ता जा रहा है वो कैसे रेत बनता जा रहा है मुझे अब सिर्फ़ सहरा दिख रहा है और उस में धूम की चादर बिछी है मगर वो एक जगह से फट रही है वहाँ पर एक साया नाचता है जहाँ भी पैर धरता है वहाँ पर सुनहरे फूल खिलते जा रहे है ये सहरा बाग़ बनता जा रहा है और उस में तितलियाँ दिखती हैं परों में जिन के नीली रौशनी है वो हर पल तेज़ होती जा रही है सो मेरी आँख में चुभने लगी है सो मैं ने हाथ आँखों पर रखे हैं और अब उँगली हटा कर देखता हूँ कि अपने बंद कमरे में पड़ा हूँ और इक दीवार के आगे खड़ा हूँ

Ammar Iqbal

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कामिल ज़िन्दगी फिर एक दिन होगा यूँँ जंग जीत लेगी ये रूह निकल बदन के क़फ़स से बाहर और दिखाई देगा वो जो न देखा और सुना था मुफ़लिस को मिला सुकून का महल पीड़ित ने किया अपराधियों का विनाश दंगों के स्थल पर एकता की ख़ुशबू किसानों को मिली भूख़ से नजात सियासत ने मज़हब को छोड़ इंसानियत स्वीकार ली यतीमों के हिस्से वालिदैन माँ के होंठों पे बच्चों की दी मुस्कान पिता के पैरों में मख़मली जूते बहनों को उन के सपनों से रूबरू सैनिक के बहते ख़ून से खिलते सरहदी गुलिस्ताँ अँधेरों में खेलते बेबाक़ बच्चे लेखक के क़लम में अनंत स्याही तसव्वुर का हक़ीक़त बनना रोते चहरों को हसी की लत सपीद-ओ-सियाह दोनों ही रंग ख़ुश-रंग और यकसाँ नज़र आए हीर-रांझा को मुहब्बत मिले, मौत नहीं शहर आख़री साँस लेने गाँव चला आए दरख़्त अर्श छू ले और फ़ल सारे आसमानी हो बुराई का अच्छाई के सामने घुटने टेकना जानवरों में इंसानी ज़बान मरहलों की आसानी में तब्दीली मशक़्क़त में टपका पसीना सहरा को समुन्दर कर दे जलते चराग़ और चलती सबा दुश्मनी भुला दे अज़ीयत की गिरफ़्त से ख़ुशियों की रिहाई इन्साफ़ का परचम बुलंद ख़ुदाओं का फ़लक से उतरना नफ़रत को मोहब्बत से मोहब्बत सब होगा उस दिन मुमकिन जिस दिन नामुमकिन कुछ नहीं होगा और दुनिया को बधाई देने शायद बुत रहेंगे यक़ीनन इंसान नहीं रहेगा

Zain Aalamgir

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बे-ईमान आज़ादी जब देखता मैं आसमाँ में, तो लगे मुझ को कभी मैं तिश्नगी हूँ और हूँ शायद किसी की अज़्म मैं मेरे तरह के लोग हो ना-शाद लेते जानकर दिन-रात ये सब कुछ ग़लत ही सोचने आज़ाद हूँ उड़ते दिखाई दे कई सारे परिंदे देखु जब ये ज़िंदगी कोई हिरासत में गुज़ारा ना करे चाहे मगर उड़ना परी-गुड़िया फ़लक में जा कहीं मौका न दे कहने, हवाओं सी चलूँ, आज़ाद हूँ है बादलों ने चाँद को पीछे छुपा रक्खा कहीं दिलकश नज़ारे जो छुपे, आँखों क' पीछे रह रहे मैं एक लम्हा माँग लू दीदार का उस हुस्न से तो भूल जाऊँ बस उसे मैं सोचने आज़ाद हूँ आगे निकल जो आब टकरा पत्थरों से हर समय जुर्रत कहाँ है पत्थरों में आब को क़ाबू करे है ज़र्ब देती क्यूँँ परेशानी मुझे जब मैं चलू ख़ा चोट कैसे मान लू चलने यहाँ आज़ाद हूँ खिलते गुलिस्ताँ में कई सारे शजर प्यारे सभी उस अर्श को मिलते कई अंजुम चमकते दिख हसीं पर संग रहने ख़ल्क़ के अपने नहीं हो पास जब कहते दिखे आँसू लिए माँ-बाप बिन आज़ाद हूँ यकसाँ फ़लक इस सम्त से उस सम्त तक, चारो तरफ़ तक़्सीम जब होती ज़मीनो की, बने नक़्शे कई इंसान के हो आँख दो, है हाथ दो, है पैर दो पर साँवले हर रंग को धुत्कारने आज़ाद हूँ है गर मुसाफ़िर के लिए दिल में जगह, ख़ुशक़िस्मती पर है कहीं वो घर जहाँ रहना रहे बद-क़िस्मती ख़ंजर बनी है वो ज़ुबाने कर ख़फ़ा हर एक को वो क़त्ल कर आज़ाद, मैं मरने इधर आज़ाद हूँ शायद रहा है तीरगी में ख़ूफ़िया इक रास्ता करते मसाफ़त वो दिखाई दे दिए बेबाक बन तो 'ज़ैन' तुम इन बेड़ियों में क़ैद रह लो आज फिर कल तुम ख़ुदा की आशनाई में कहो आज़ाद हूँ

Zain Aalamgir

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'मुसलसल मौत' मौत कब आती है? मौत आती है जब एक माँ अपनी बिटिया को किसी अजनबी के दर पर छोड़ आती है क्योंकि समाज को लड़कियाँ क़ुबूल नहीं और महिला के हिस्से का प्यार, पालन-पोषण उस घर के लिए श्राप है मौत आती है जब एक बच्चा अपने ही हाथों से अपना बचपन सडक पर बेच रहा दिखाई दे क्योंकि जीवन ने उसे मजबूरियों ख़ातिर पहले ही बड़ा कर दिया अपने निवालों की तिजारत करने मौत आती है जब एक किसान अपने ही फ़ल और सब्ज़ीयों का हक़दार नहीं हो पाता उस की मेहनत, उस की निष्ठा उस का सम्पूर्ण जीवन जैसे औरों के सेवा में व्यर्थ होने लिख़ा गया हो मौत आती है जब एक प्रेमी अपने प्रेमिका से कहता है कि वो उस के लाइक़ नहीं क्योंकि हलकी जेबों ने उस के प्यार को भी हल्का कर दिया के जात-पात एवं भरी तिजोरियां सर्वप्रथम स्थल पर अनिवार्य है मौत आती है जब एक मनुष्य अपनी लाचारी पर अब रो भी नहीं सकता क्योंकि वो बहते अश्कों सा है जो कड़कती परेशानियों के धूप में अब पत्थर हो चला है और पत्थर किसी को उम्मीद नहीं देता स्वयं को भी नहीं मौत आती है जब एक लेखक सम्पूर्ण विश्व की घटनाएं कविताओं में व्यक्त कर देता है परंतु अपनी परेशानियाँ लिख़ते वक़्त उस की क़लम मौन धारण कर लेती है भीतर भिकरी स्याही किताबों पर एक छोटा निशान तक नहीं छोड़ पाती बेशक मौत साँसों के पश्चात आती हो मगर मनुष्य साँस लेते समय मुसलसल ही मौत के अनेक रूप देख ख़ौफ़ से ही मरता रहता है तो आप कितनी बार मर चुके हैं इस जीवन में?

Zain Aalamgir

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