कामिल ज़िन्दगी फिर एक दिन होगा यूँँ जंग जीत लेगी ये रूह निकल बदन के क़फ़स से बाहर और दिखाई देगा वो जो न देखा और सुना था मुफ़लिस को मिला सुकून का महल पीड़ित ने किया अपराधियों का विनाश दंगों के स्थल पर एकता की ख़ुशबू किसानों को मिली भूख़ से नजात सियासत ने मज़हब को छोड़ इंसानियत स्वीकार ली यतीमों के हिस्से वालिदैन माँ के होंठों पे बच्चों की दी मुस्कान पिता के पैरों में मख़मली जूते बहनों को उन के सपनों से रूबरू सैनिक के बहते ख़ून से खिलते सरहदी गुलिस्ताँ अँधेरों में खेलते बेबाक़ बच्चे लेखक के क़लम में अनंत स्याही तसव्वुर का हक़ीक़त बनना रोते चहरों को हसी की लत सपीद-ओ-सियाह दोनों ही रंग ख़ुश-रंग और यकसाँ नज़र आए हीर-रांझा को मुहब्बत मिले, मौत नहीं शहर आख़री साँस लेने गाँव चला आए दरख़्त अर्श छू ले और फ़ल सारे आसमानी हो बुराई का अच्छाई के सामने घुटने टेकना जानवरों में इंसानी ज़बान मरहलों की आसानी में तब्दीली मशक़्क़त में टपका पसीना सहरा को समुन्दर कर दे जलते चराग़ और चलती सबा दुश्मनी भुला दे अज़ीयत की गिरफ़्त से ख़ुशियों की रिहाई इन्साफ़ का परचम बुलंद ख़ुदाओं का फ़लक से उतरना नफ़रत को मोहब्बत से मोहब्बत सब होगा उस दिन मुमकिन जिस दिन नामुमकिन कुछ नहीं होगा और दुनिया को बधाई देने शायद बुत रहेंगे यक़ीनन इंसान नहीं रहेगा
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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"अज़िय्यत" इन आँखों के बादलों से ऐसी बरसात लगी जब से दिल को तेरे रुख़्सती की बात लगी किताब ख़ोल के मायूस मैं बैठा हूँ, लफ़्ज़ कोई ना के क़लम को भी इज़तिरार अपनी ज़ात लगी ग़ज़लों में जब ज़िक्रे-जानाँ था, तो लोगों को पसंदीदा थी तहरीरों में जो तुम मिट गए, वही ग़ज़लें दिल-फ़िगार वारदात लगी आख़री बार मिलने की हसरत अधूरी रह गई झलक तेरी इन आँखों में भी जैसे मुश्किल से मिली ख़ैरात लगी तलबगार हर शख़्स रहता जो तुझ को देख लेता क्या ही था वो मंज़र जो सुकून भरी तेरी मुलाक़ात लगी हमारी क़ुर्बत में साँसों का चलना अजब था ख़ामोशी में भी दिलकश जैसे चलती नग़मात लगी ख़ुशनुमा गुलिस्ताँ में शगुफ़्ता होती थी ख़ल्क़त कुल्फ़ते-बेदार के मलबे में फ़सी पूरी काइनात लगी काश तू कुछ पल ठहरता मेरी बातें सुनने अब तो तारों को सुनाने भी कम हर रात लगी
Zain Aalamgir
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बे-ईमान आज़ादी जब देखता मैं आसमाँ में, तो लगे मुझ को कभी मैं तिश्नगी हूँ और हूँ शायद किसी की अज़्म मैं मेरे तरह के लोग हो ना-शाद लेते जानकर दिन-रात ये सब कुछ ग़लत ही सोचने आज़ाद हूँ उड़ते दिखाई दे कई सारे परिंदे देखु जब ये ज़िंदगी कोई हिरासत में गुज़ारा ना करे चाहे मगर उड़ना परी-गुड़िया फ़लक में जा कहीं मौका न दे कहने, हवाओं सी चलूँ, आज़ाद हूँ है बादलों ने चाँद को पीछे छुपा रक्खा कहीं दिलकश नज़ारे जो छुपे, आँखों क' पीछे रह रहे मैं एक लम्हा माँग लू दीदार का उस हुस्न से तो भूल जाऊँ बस उसे मैं सोचने आज़ाद हूँ आगे निकल जो आब टकरा पत्थरों से हर समय जुर्रत कहाँ है पत्थरों में आब को क़ाबू करे है ज़र्ब देती क्यूँँ परेशानी मुझे जब मैं चलू ख़ा चोट कैसे मान लू चलने यहाँ आज़ाद हूँ खिलते गुलिस्ताँ में कई सारे शजर प्यारे सभी उस अर्श को मिलते कई अंजुम चमकते दिख हसीं पर संग रहने ख़ल्क़ के अपने नहीं हो पास जब कहते दिखे आँसू लिए माँ-बाप बिन आज़ाद हूँ यकसाँ फ़लक इस सम्त से उस सम्त तक, चारो तरफ़ तक़्सीम जब होती ज़मीनो की, बने नक़्शे कई इंसान के हो आँख दो, है हाथ दो, है पैर दो पर साँवले हर रंग को धुत्कारने आज़ाद हूँ है गर मुसाफ़िर के लिए दिल में जगह, ख़ुशक़िस्मती पर है कहीं वो घर जहाँ रहना रहे बद-क़िस्मती ख़ंजर बनी है वो ज़ुबाने कर ख़फ़ा हर एक को वो क़त्ल कर आज़ाद, मैं मरने इधर आज़ाद हूँ शायद रहा है तीरगी में ख़ूफ़िया इक रास्ता करते मसाफ़त वो दिखाई दे दिए बेबाक बन तो 'ज़ैन' तुम इन बेड़ियों में क़ैद रह लो आज फिर कल तुम ख़ुदा की आशनाई में कहो आज़ाद हूँ
Zain Aalamgir
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'मुसलसल मौत' मौत कब आती है? मौत आती है जब एक माँ अपनी बिटिया को किसी अजनबी के दर पर छोड़ आती है क्योंकि समाज को लड़कियाँ क़ुबूल नहीं और महिला के हिस्से का प्यार, पालन-पोषण उस घर के लिए श्राप है मौत आती है जब एक बच्चा अपने ही हाथों से अपना बचपन सडक पर बेच रहा दिखाई दे क्योंकि जीवन ने उसे मजबूरियों ख़ातिर पहले ही बड़ा कर दिया अपने निवालों की तिजारत करने मौत आती है जब एक किसान अपने ही फ़ल और सब्ज़ीयों का हक़दार नहीं हो पाता उस की मेहनत, उस की निष्ठा उस का सम्पूर्ण जीवन जैसे औरों के सेवा में व्यर्थ होने लिख़ा गया हो मौत आती है जब एक प्रेमी अपने प्रेमिका से कहता है कि वो उस के लाइक़ नहीं क्योंकि हलकी जेबों ने उस के प्यार को भी हल्का कर दिया के जात-पात एवं भरी तिजोरियां सर्वप्रथम स्थल पर अनिवार्य है मौत आती है जब एक मनुष्य अपनी लाचारी पर अब रो भी नहीं सकता क्योंकि वो बहते अश्कों सा है जो कड़कती परेशानियों के धूप में अब पत्थर हो चला है और पत्थर किसी को उम्मीद नहीं देता स्वयं को भी नहीं मौत आती है जब एक लेखक सम्पूर्ण विश्व की घटनाएं कविताओं में व्यक्त कर देता है परंतु अपनी परेशानियाँ लिख़ते वक़्त उस की क़लम मौन धारण कर लेती है भीतर भिकरी स्याही किताबों पर एक छोटा निशान तक नहीं छोड़ पाती बेशक मौत साँसों के पश्चात आती हो मगर मनुष्य साँस लेते समय मुसलसल ही मौत के अनेक रूप देख ख़ौफ़ से ही मरता रहता है तो आप कितनी बार मर चुके हैं इस जीवन में?
Zain Aalamgir
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