'मुसलसल मौत' मौत कब आती है? मौत आती है जब एक माँ अपनी बिटिया को किसी अजनबी के दर पर छोड़ आती है क्योंकि समाज को लड़कियाँ क़ुबूल नहीं और महिला के हिस्से का प्यार, पालन-पोषण उस घर के लिए श्राप है मौत आती है जब एक बच्चा अपने ही हाथों से अपना बचपन सडक पर बेच रहा दिखाई दे क्योंकि जीवन ने उसे मजबूरियों ख़ातिर पहले ही बड़ा कर दिया अपने निवालों की तिजारत करने मौत आती है जब एक किसान अपने ही फ़ल और सब्ज़ीयों का हक़दार नहीं हो पाता उस की मेहनत, उस की निष्ठा उस का सम्पूर्ण जीवन जैसे औरों के सेवा में व्यर्थ होने लिख़ा गया हो मौत आती है जब एक प्रेमी अपने प्रेमिका से कहता है कि वो उस के लाइक़ नहीं क्योंकि हलकी जेबों ने उस के प्यार को भी हल्का कर दिया के जात-पात एवं भरी तिजोरियां सर्वप्रथम स्थल पर अनिवार्य है मौत आती है जब एक मनुष्य अपनी लाचारी पर अब रो भी नहीं सकता क्योंकि वो बहते अश्कों सा है जो कड़कती परेशानियों के धूप में अब पत्थर हो चला है और पत्थर किसी को उम्मीद नहीं देता स्वयं को भी नहीं मौत आती है जब एक लेखक सम्पूर्ण विश्व की घटनाएं कविताओं में व्यक्त कर देता है परंतु अपनी परेशानियाँ लिख़ते वक़्त उस की क़लम मौन धारण कर लेती है भीतर भिकरी स्याही किताबों पर एक छोटा निशान तक नहीं छोड़ पाती बेशक मौत साँसों के पश्चात आती हो मगर मनुष्य साँस लेते समय मुसलसल ही मौत के अनेक रूप देख ख़ौफ़ से ही मरता रहता है तो आप कितनी बार मर चुके हैं इस जीवन में?
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"बन्दा और ख़ुदा" एक मुख़्तसर सी कहानी है जो ज़फ़र कि मुँह-ज़बानी है ये हुकूमत आसमानी है हर मख़्लूक़ रूहानी है ये ख़ुदा की मेहरबानी है की सज्दों में झुकती पेशानी है ये सारी दुनिया फ़ानी है हर शख़्स को मौत आनी है ये इंसानियत अय्याशी की दीवानी है हर शख़्स की ढलती जवानी है क़ुदरत की पकड़ से कोई नहीं बचा ये आ रहे अज़ाब क़यामत की निशानी है ये लोगों की गुमराही और बड़ी नादानी है की कहाँ ऊपर ख़ुदा को शक्ल हमें दिखानी है
ZafarAli Memon
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने
"Nadeem khan' Kaavish"
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भारत के ऐ सपूतो हिम्मत दिखाए जाओ दुनिया के दिल पे अपना सिक्का बिठाए जाओ मुर्दा-दिली का झंडा फेंको ज़मीन पर तुम ज़िंदा-दिली का हर-सू परचम उड़ाए जाओ लाओ न भूल कर भी दिल में ख़याल-ए-पस्ती ख़ुश-हाली-ए-वतन का बेड़ा उठाए जाओ तन-मन मिटाए जाओ तुम नाम-ए-क़ौमीयत पर राह-ए-वतन में अपनी जानें लड़ाए जाओ कम-हिम्मती का दिल से नाम-ओ-निशाँ मिटा दो जुरअत का लौह-ए-दिल पर नक़्शा जमाए जाओ ऐ हिंदूओ मुसलमाँ आपस में इन दिनों तुम नफ़रत घटाए जाओ उल्फ़त बढ़ाए जाओ 'बिक्रम' की राज-नीती 'अकबर' की पॉलीसी की सारे जहाँ के दिल पर अज़्मत बिठाए जाओ जिस कश्मकश ने तुम को है इस क़दर मिटाया तुम से हो जिस क़दर तुम उस को मिटाए जाओ जिन ख़ाना-जंगियों ने ये दिन तुम्हें दिखाए अब उन की याद अपने दिल में भुलाए जाओ बे-ख़ौफ़ गाए जाओ ''हिन्दोस्ताँ हमारा'' और ''वंदे-मातरम'' के नारे लगाए जाओ जिन देश सेवकों से हासिल है फ़ैज़ तुम को इन देश सेवकों की जय जय मनाए जाओ जिस मुल्क का हो खाते दिन रात आब-ओ-दाना उस मलक पर सरों की भेटें चढ़ाए जाओ फाँसी का जेल का डर दिल से 'फ़लक' मिटा कर ग़ैरों के मुँह पे सच्ची बातें सुनाते जाओ
Lal Chand Falak
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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
Muneer Niyazi
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कामिल ज़िन्दगी फिर एक दिन होगा यूँँ जंग जीत लेगी ये रूह निकल बदन के क़फ़स से बाहर और दिखाई देगा वो जो न देखा और सुना था मुफ़लिस को मिला सुकून का महल पीड़ित ने किया अपराधियों का विनाश दंगों के स्थल पर एकता की ख़ुशबू किसानों को मिली भूख़ से नजात सियासत ने मज़हब को छोड़ इंसानियत स्वीकार ली यतीमों के हिस्से वालिदैन माँ के होंठों पे बच्चों की दी मुस्कान पिता के पैरों में मख़मली जूते बहनों को उन के सपनों से रूबरू सैनिक के बहते ख़ून से खिलते सरहदी गुलिस्ताँ अँधेरों में खेलते बेबाक़ बच्चे लेखक के क़लम में अनंत स्याही तसव्वुर का हक़ीक़त बनना रोते चहरों को हसी की लत सपीद-ओ-सियाह दोनों ही रंग ख़ुश-रंग और यकसाँ नज़र आए हीर-रांझा को मुहब्बत मिले, मौत नहीं शहर आख़री साँस लेने गाँव चला आए दरख़्त अर्श छू ले और फ़ल सारे आसमानी हो बुराई का अच्छाई के सामने घुटने टेकना जानवरों में इंसानी ज़बान मरहलों की आसानी में तब्दीली मशक़्क़त में टपका पसीना सहरा को समुन्दर कर दे जलते चराग़ और चलती सबा दुश्मनी भुला दे अज़ीयत की गिरफ़्त से ख़ुशियों की रिहाई इन्साफ़ का परचम बुलंद ख़ुदाओं का फ़लक से उतरना नफ़रत को मोहब्बत से मोहब्बत सब होगा उस दिन मुमकिन जिस दिन नामुमकिन कुछ नहीं होगा और दुनिया को बधाई देने शायद बुत रहेंगे यक़ीनन इंसान नहीं रहेगा
Zain Aalamgir
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"अज़िय्यत" इन आँखों के बादलों से ऐसी बरसात लगी जब से दिल को तेरे रुख़्सती की बात लगी किताब ख़ोल के मायूस मैं बैठा हूँ, लफ़्ज़ कोई ना के क़लम को भी इज़तिरार अपनी ज़ात लगी ग़ज़लों में जब ज़िक्रे-जानाँ था, तो लोगों को पसंदीदा थी तहरीरों में जो तुम मिट गए, वही ग़ज़लें दिल-फ़िगार वारदात लगी आख़री बार मिलने की हसरत अधूरी रह गई झलक तेरी इन आँखों में भी जैसे मुश्किल से मिली ख़ैरात लगी तलबगार हर शख़्स रहता जो तुझ को देख लेता क्या ही था वो मंज़र जो सुकून भरी तेरी मुलाक़ात लगी हमारी क़ुर्बत में साँसों का चलना अजब था ख़ामोशी में भी दिलकश जैसे चलती नग़मात लगी ख़ुशनुमा गुलिस्ताँ में शगुफ़्ता होती थी ख़ल्क़त कुल्फ़ते-बेदार के मलबे में फ़सी पूरी काइनात लगी काश तू कुछ पल ठहरता मेरी बातें सुनने अब तो तारों को सुनाने भी कम हर रात लगी
Zain Aalamgir
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बे-ईमान आज़ादी जब देखता मैं आसमाँ में, तो लगे मुझ को कभी मैं तिश्नगी हूँ और हूँ शायद किसी की अज़्म मैं मेरे तरह के लोग हो ना-शाद लेते जानकर दिन-रात ये सब कुछ ग़लत ही सोचने आज़ाद हूँ उड़ते दिखाई दे कई सारे परिंदे देखु जब ये ज़िंदगी कोई हिरासत में गुज़ारा ना करे चाहे मगर उड़ना परी-गुड़िया फ़लक में जा कहीं मौका न दे कहने, हवाओं सी चलूँ, आज़ाद हूँ है बादलों ने चाँद को पीछे छुपा रक्खा कहीं दिलकश नज़ारे जो छुपे, आँखों क' पीछे रह रहे मैं एक लम्हा माँग लू दीदार का उस हुस्न से तो भूल जाऊँ बस उसे मैं सोचने आज़ाद हूँ आगे निकल जो आब टकरा पत्थरों से हर समय जुर्रत कहाँ है पत्थरों में आब को क़ाबू करे है ज़र्ब देती क्यूँँ परेशानी मुझे जब मैं चलू ख़ा चोट कैसे मान लू चलने यहाँ आज़ाद हूँ खिलते गुलिस्ताँ में कई सारे शजर प्यारे सभी उस अर्श को मिलते कई अंजुम चमकते दिख हसीं पर संग रहने ख़ल्क़ के अपने नहीं हो पास जब कहते दिखे आँसू लिए माँ-बाप बिन आज़ाद हूँ यकसाँ फ़लक इस सम्त से उस सम्त तक, चारो तरफ़ तक़्सीम जब होती ज़मीनो की, बने नक़्शे कई इंसान के हो आँख दो, है हाथ दो, है पैर दो पर साँवले हर रंग को धुत्कारने आज़ाद हूँ है गर मुसाफ़िर के लिए दिल में जगह, ख़ुशक़िस्मती पर है कहीं वो घर जहाँ रहना रहे बद-क़िस्मती ख़ंजर बनी है वो ज़ुबाने कर ख़फ़ा हर एक को वो क़त्ल कर आज़ाद, मैं मरने इधर आज़ाद हूँ शायद रहा है तीरगी में ख़ूफ़िया इक रास्ता करते मसाफ़त वो दिखाई दे दिए बेबाक बन तो 'ज़ैन' तुम इन बेड़ियों में क़ैद रह लो आज फिर कल तुम ख़ुदा की आशनाई में कहो आज़ाद हूँ
Zain Aalamgir
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