nazmKuch Alfaaz

दौर-ए-हाज़िर के तुम एक शर्मिंदा इंसान हो मैं जो चीख़ा तो मेरी अना टूट कर जंगलों की तपिश बन गई दास्ताँ की ख़लिश बन गई क़हक़हे बे-सदा क़हक़हे मकड़ियों की फ़ज़ा में उड़ाते रहे तेज़ मज़बूत क़ौमों के नाराज़ क़िस्से सुनाते रहे मैं परेशान नींदों के बादल हटा कर बुझी रात के सादा पर्दे उठा कर जो ख़े में से निकला तो आवाज़ आई अभी तुम ने दुनिया भी देखी नहीं है

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है

Sahir Ludhianvi

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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं

Tehzeeb Hafi

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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रात गहरी मुहीब ख़ामोशी दिल भी चुप-चाप यूँँ धड़कता है जैसे दरवेश अपने हुजरे में आसमानों को खटकाता है

Javed Nasir

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ख़मोश रहना, कभी सर हिला के सुन लेना हवा में चाँद बनाना, बना के चुन लेना अजीब दौर था चारों तरफ़ उदासी थी ज़मीन अपनी ही तन्हाइयों की प्यासी थी कभी शराब कभी शा'इरी कभी महफ़िल फिर इस के बा'द धड़कता हुआ अकेला दिल ख़ुद अपने घर में ही घर से अलग-थलग रहना किताब-ए-जाँ के लिए रात भर ग़ज़ल कहना ये और बात बड़े हौसले का शाइ'र था मैं अपनी नींद का रूठा हुआ मुसाफ़िर था

Javed Nasir

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चराग़ है, किताब है सवाल है, जवाब है कि आसमाँ मुंडेर है कि ये ज़मीं भी ढेर है किसी का कोई नाम है न ज़िंदगी मुदाम है मगर वो एक शख़्स है जो धूप की कगार है जहाँ का उस पे बार है चले चलो कि वक़्त है, अज़ाब कितना सख़्त है मगर वो कब ज़वाल है, वो मौसमों की शाल है पहन रही है शाम भी बदल रही है रात भी कि उग रहा है आसमाँ की धुल रही है फिर सहर चराग़ है, किताब है, सवाल है, जवाब है मगर हैं लोग आज कल न इस तरफ़ न उस तरफ़ न इस तरफ़ न उस तरफ़

Javed Nasir

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अख़्तरुज़्जमाँ नासिर वक़्त जैसे रोया हो धूप नर्म लहजे में जैसे आज गोया हो दूर कोई मस्जिद में बीच अस्र ओ मग़रिब के जैसे खोया खोया हो अख़्तरुज़्जमाँ नासिर मैं तुम्हारी आँखों से देखता था दुनिया को मैं तुम्हारे हाथों से ज़िंदगी को छूता था मैं तुम्हारे क़दमों से नापता था रस्तों को मैं तुम्हारी साँसों से सूँघता था ख़ुशबू को मैं तुम्हारा मंज़र था बे-सदा समुंदर था सर पे आसमाँ तुम थे हाँ मिरा बयाँ तुम थे और मेरी धरती में चाहतें तुम्हारी थीं आदतें तुम्हारी थीं दिन तुम्हारे लहजे की छाँव में गुज़रते थे ज़िंदगी से लड़ते थे ज़िंदगी से डरते थे अख़तरुज़्जमाँ नासिर जाने क्यूँँ हुआ बदली चर्ख़ ने भी रुख़ बदला दूर मस्जिद-ए-जाँ से क्यूँँ अज़ान-ए-दिल उभरी सज्दा-ए-तलब चमका हर्फ़-ए-कुंज-ए-लब चमका दिन ग़ुरूब होते ही ज़ौक़-ए-मुंतख़ब चमका काश ये नहीं होता काश मैं वहीं होता अख़्तरुज़्ज़माँ नासिर मैं किसी तमद्दुन का आख़िरी मुसाफ़िर हूँ मैं हज़ार ख़्वाबों की दौड़-धूप में शामिल मैं हज़ार जज़्बों की रेल-पेल का आदी मैं हज़ार हाथों से ज़िंदगी बनाता हूँ मैं हज़ार क़दमों से रास्तों पे चलता हूँ मैं हज़ार शानों पे करवटें बदलता हूँ मैं हज़ार आँखों से मंज़रों में ढलता हूँ मैं असीर दुनिया का मैं बसीर फ़र्दा का मैं वरक़ हूँ माज़ी का वक़्त है मुनादी का डरते डरते कहता हूँ मैं भी एक शाएर हूँ अख़तरुज़्ज़माँ नासिर ये सफ़र जो जारी है कौन इस का जादा है कौन इस की मंज़िल है लौटना भी मुश्किल है मैं तो जैसे भर पाया और एक दर पाया रोज़-ओ-शब का हल्क़ा है मैं भी एक क़ैदी हूँ सुब्ह का अँधेरा हूँ शाम की सफ़ेदी हूँ अख़तरुज़्ज़माँ नासिर नौकरी है सरकारी बदतरीन समझौता, बदतरीन दुश्वारी आज मेरे हाथों में तीर हैं न पत्थर हैं आज मेरी आँखों में ख़्वाब हैं न मंज़र हैं मैं सग-ए-मलामत की सुन रहा हूँ आवाज़ें रोज़-ओ-शब के नर्ग़े से भागना भी मुश्किल है और ऐसे आलम में फ़र्ज़-ए-ऐन वाजिब है शुग़्ल-ए-मय भी जाएज़ है अख़तरुज़्जमाँ नासिर हुक्म मुझ को अज़बर है तीन नन्ही धूपें हैं वो नफ़ीस पैकर है जिन के साथ जीना है धूप है तो सहनी है बस यही गुज़ारिश है एक छोटी तब्दीली सिर्फ़ इतनी ख़्वाहिश है अख़तरुज़्ज़माँ नासिर ए'तिदाल लाज़िम है ये ख़लफ़ का वा'दा है दूर है ख़ुदा लेकिन तोशा-ए-सआदत है रौशनी का जादा है

Javed Nasir

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