ख़मोश रहना, कभी सर हिला के सुन लेना हवा में चाँद बनाना, बना के चुन लेना अजीब दौर था चारों तरफ़ उदासी थी ज़मीन अपनी ही तन्हाइयों की प्यासी थी कभी शराब कभी शा'इरी कभी महफ़िल फिर इस के बा'द धड़कता हुआ अकेला दिल ख़ुद अपने घर में ही घर से अलग-थलग रहना किताब-ए-जाँ के लिए रात भर ग़ज़ल कहना ये और बात बड़े हौसले का शाइ'र था मैं अपनी नींद का रूठा हुआ मुसाफ़िर था
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है
Sohaib Mugheera Siddiqi
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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दौर-ए-हाज़िर के तुम एक शर्मिंदा इंसान हो मैं जो चीख़ा तो मेरी अना टूट कर जंगलों की तपिश बन गई दास्ताँ की ख़लिश बन गई क़हक़हे बे-सदा क़हक़हे मकड़ियों की फ़ज़ा में उड़ाते रहे तेज़ मज़बूत क़ौमों के नाराज़ क़िस्से सुनाते रहे मैं परेशान नींदों के बादल हटा कर बुझी रात के सादा पर्दे उठा कर जो ख़े में से निकला तो आवाज़ आई अभी तुम ने दुनिया भी देखी नहीं है
Javed Nasir
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रात गहरी मुहीब ख़ामोशी दिल भी चुप-चाप यूँँ धड़कता है जैसे दरवेश अपने हुजरे में आसमानों को खटकाता है
Javed Nasir
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चराग़ है, किताब है सवाल है, जवाब है कि आसमाँ मुंडेर है कि ये ज़मीं भी ढेर है किसी का कोई नाम है न ज़िंदगी मुदाम है मगर वो एक शख़्स है जो धूप की कगार है जहाँ का उस पे बार है चले चलो कि वक़्त है, अज़ाब कितना सख़्त है मगर वो कब ज़वाल है, वो मौसमों की शाल है पहन रही है शाम भी बदल रही है रात भी कि उग रहा है आसमाँ की धुल रही है फिर सहर चराग़ है, किताब है, सवाल है, जवाब है मगर हैं लोग आज कल न इस तरफ़ न उस तरफ़ न इस तरफ़ न उस तरफ़
Javed Nasir
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अख़्तरुज़्जमाँ नासिर वक़्त जैसे रोया हो धूप नर्म लहजे में जैसे आज गोया हो दूर कोई मस्जिद में बीच अस्र ओ मग़रिब के जैसे खोया खोया हो अख़्तरुज़्जमाँ नासिर मैं तुम्हारी आँखों से देखता था दुनिया को मैं तुम्हारे हाथों से ज़िंदगी को छूता था मैं तुम्हारे क़दमों से नापता था रस्तों को मैं तुम्हारी साँसों से सूँघता था ख़ुशबू को मैं तुम्हारा मंज़र था बे-सदा समुंदर था सर पे आसमाँ तुम थे हाँ मिरा बयाँ तुम थे और मेरी धरती में चाहतें तुम्हारी थीं आदतें तुम्हारी थीं दिन तुम्हारे लहजे की छाँव में गुज़रते थे ज़िंदगी से लड़ते थे ज़िंदगी से डरते थे अख़तरुज़्जमाँ नासिर जाने क्यूँँ हुआ बदली चर्ख़ ने भी रुख़ बदला दूर मस्जिद-ए-जाँ से क्यूँँ अज़ान-ए-दिल उभरी सज्दा-ए-तलब चमका हर्फ़-ए-कुंज-ए-लब चमका दिन ग़ुरूब होते ही ज़ौक़-ए-मुंतख़ब चमका काश ये नहीं होता काश मैं वहीं होता अख़्तरुज़्ज़माँ नासिर मैं किसी तमद्दुन का आख़िरी मुसाफ़िर हूँ मैं हज़ार ख़्वाबों की दौड़-धूप में शामिल मैं हज़ार जज़्बों की रेल-पेल का आदी मैं हज़ार हाथों से ज़िंदगी बनाता हूँ मैं हज़ार क़दमों से रास्तों पे चलता हूँ मैं हज़ार शानों पे करवटें बदलता हूँ मैं हज़ार आँखों से मंज़रों में ढलता हूँ मैं असीर दुनिया का मैं बसीर फ़र्दा का मैं वरक़ हूँ माज़ी का वक़्त है मुनादी का डरते डरते कहता हूँ मैं भी एक शाएर हूँ अख़तरुज़्ज़माँ नासिर ये सफ़र जो जारी है कौन इस का जादा है कौन इस की मंज़िल है लौटना भी मुश्किल है मैं तो जैसे भर पाया और एक दर पाया रोज़-ओ-शब का हल्क़ा है मैं भी एक क़ैदी हूँ सुब्ह का अँधेरा हूँ शाम की सफ़ेदी हूँ अख़तरुज़्ज़माँ नासिर नौकरी है सरकारी बदतरीन समझौता, बदतरीन दुश्वारी आज मेरे हाथों में तीर हैं न पत्थर हैं आज मेरी आँखों में ख़्वाब हैं न मंज़र हैं मैं सग-ए-मलामत की सुन रहा हूँ आवाज़ें रोज़-ओ-शब के नर्ग़े से भागना भी मुश्किल है और ऐसे आलम में फ़र्ज़-ए-ऐन वाजिब है शुग़्ल-ए-मय भी जाएज़ है अख़तरुज़्जमाँ नासिर हुक्म मुझ को अज़बर है तीन नन्ही धूपें हैं वो नफ़ीस पैकर है जिन के साथ जीना है धूप है तो सहनी है बस यही गुज़ारिश है एक छोटी तब्दीली सिर्फ़ इतनी ख़्वाहिश है अख़तरुज़्ज़माँ नासिर ए'तिदाल लाज़िम है ये ख़लफ़ का वा'दा है दूर है ख़ुदा लेकिन तोशा-ए-सआदत है रौशनी का जादा है
Javed Nasir
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