nazmKuch Alfaaz

ख़्वाबों से तही बे-नूर आँखें हर शाम नए मंज़र चाहें बेचैन बदन प्यासी रूहें हर आन नए पैकर चाहें बेबाक लहू अन-देखे सपनों की ख़ातिर जाने अनजाने रस्तों पर कुछ नक़्श बनाना चाहता है बंजर पामाल ज़मीनों में कुछ फूल खिलाना चाहता है यूँँ नक़्श कहाँ बन पाते हैं यूँँ फूल कहाँ खिलने वाले इन बदन-दरीदा रूहों के यूँँ चाक कहाँ सिलने वाले बेबाक लहू को हुर्मत के आदाब सिखाने पड़ते हैं तब मिट्टी मौज में आती है तब ख़्वाब के मअ'नी बनते हैं तब ख़ुशबू रंग दिखाती है

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"ख़ुदा का सवाल" मेरे रब की मुझ पर इनायत हुई कहूँ भी तो कैसे इबादत हुई हक़ीक़त हुई जैसे मुझ पर अयाँ क़लम बन गई है ख़ुदा की ज़बाँ मुख़ातिब है बंदे से परवरदिगार तू हुस्न-ए-चमन तू ही रंग-ए-बहार तू में'राज-ए-फ़न तू ही फन का सिंगार मुसव्विर हूँ मैं तू मेरा शाहकार ये सुब्हें ये शा में ये दिन और रात ये रंगीन दिलकश हसीं क़ायनात कि हूर-ओ-मलाइक व जिन्नात ने किया है तुझे अशरफ़ उल मख़लुक़ात मेरी अज़मतों का हवाला है तू तू ही रौशनी है उजाला है तू ये दुनिया जहाँ बज़्म-आराइयाँ ये महफ़िल ये मेले ये तन्हाइयाँ फ़लक का तुझे शामियाना दिया ज़मीं पर तुझे आब-ओ-दाना दिया मिले आबशारों से भी हौसले पहाड़ों मैं तुझ को दिए रास्ते ये पानी हवा और ये शम्स-ओ-क़मर ये मौज-ए-रवाँ ये किनारा भँवर ये शाख़ों पे ग़ुंचे चटकते हुए फ़लक पे सितारे चमकते हुए ये सब्ज़े ये फूलों भरी क्यारियाँ ये पंछी ये उड़ती हुई तितलियाँ ये शो'ला ये शबनम ये मिट्टी ये संग ये झरनों के बजते हुए जलतरंग ये झीलों में हँसते हुए से कँवल ये धरती पे मौसम की लिक्खी ग़ज़ल ये सर्दी ये गर्मी ये बारिश ये धूप ये चेहरा ये क़द और ये रंग-ओ-रूप दरिंदों चरिंदों पे क़ाबू दिया तुझे भाई देकर के बाज़ू दिया बहन दी तुझे और शरीक-ए-सफ़र ये रिश्ता ये नाते घराना ये घर कि औलाद भी दी दिए वालिदैन अलिफ़ लाम मिम क़ाफ़ और ऐन ग़ैन ये अक़्ल-ओ-ज़हानत शु'ऊर-ओ-नज़र ये बस्ती ये सहरा ये ख़ुश्की ये तर और उसपर किताब-ए-हिदायत भी दी नबी भी उतारे शरी'अत भी दी कि ख़बरें सभी कुछ हैं तेरे लिए बता क्या किया तू ने मेरे लिए

Abrar Kashif

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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रात दिन ख़्वाब बुनती हुई ज़िंदगी दिल में नक़्द-ए-इज़ाफ़ी की लौ आँख बार-ए-अमानत से चूर मौज-ए-ख़ूँ बे-नियाज़-ए-मआल दश्त-ए-बे-रंग से दर्द के फूल चुनती हुई ज़िंदगी ख़ौफ़-ए-वामांदगी से ख़जिल आरज़ूओं के आशोब से मुज़्महिल मुँह के बल ख़ाक पर आ पड़ी हर तरफ़ इक भयानक सुकूत कोई नौहा न आँसू न फूल हासिल-ए-जिस्म-ओ-जाँ बे-निशाँ रहगुज़ारों की धूल अजनबी शहर में ख़ाक-बर-सर हुई ज़िंदगी कैसी बे-घर हुई ज़िंदगी

Iftikhar Arif

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पतंगें लूटने वालों को क्या मालूम किस के हाथ का माँझा खरा था और किस की डोर हल्की थी उन्हें इस से ग़रज़ क्या पेँच पड़ते वक़्त किन हाथों में लर्ज़ा आ गया था और किस की खेंच अच्छी थी? हवा किस की तरफ़ थी, कौन सी पाली की बैरी थी? पतंगें लूटने वालों को क्या मालूम? उन्हें तो बस बसंत आते ही अपनी अपनी डाँगेँ ले के मैदानों में आना है गली-कूचों में काँटी मारना है पतंगें लूटना है लूट के जौहर दिखाना है पतंगें लूटने वालों को क्या मालूम किस के हाथ का माँझा खरा था और किस की डोर हल्की थी?

Iftikhar Arif

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शाख़-ए-ज़ैतून पर कम-सुख़न फ़ाख़्ताओं के इतने बसेरे उजाड़े गए और हवा चुप रही बे-कराँ आसमानों की पिहनाइयाँ बे-नशेमन शिकस्ता परों की तग-ओ-ताज़ पर बैन करती रहीं और हवा चुप रही ज़र्द परचम उड़ाता हुआ लश्कर-ए-बे-अमाँ गुल-ज़मीनों को पामाल करता रहा और हवा चुप रही आरज़ूमंद आँखें बशारत-तलब दिल दु'आओं को उट्ठे हुए हाथ सब बे-समर रह गए और हवा चुप रही और तब हब्स के क़हरमाँ मौसमों के अज़ाब इन ज़मीनों पे भेजे गए और मुनादी करा दी गई जब कभी रंग की ख़ुशबुओं की उड़ानों की आवाज़ की और ख़्वाबों की तौहीन की जाएगी ये अज़ाब इन ज़मीनों पे आते रहेंगे

Iftikhar Arif

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कभी कभी दिल ये सोचता है न जाने हम बे-यक़ीन लोगों को नाम-ए-हैदर से रब्त क्यूँँ है हकीम जाने वो कैसी हिकमत से आश्ना था शजीअ जाने कि बदर ओ ख़ैबर की फ़त्ह-मंदी का राज़ क्या था अलीम जाने वो इल्म के कौन से सफ़ीनों का ना-ख़ुदा था मुझे तो बस सिर्फ़ ये ख़बर है वो मेरे मौला की ख़ुशबुओं में रचा-बसा था वो उन के दामान-ए-आतिफ़त में पला बढ़ा था और उस के दिन रात मेरे आक़ा के चश्म ओ अबरू ओ जुम्बिश-ए-लब के मुंतज़िर थे वो रात को दुश्मनों के नर्ग़े में सो रहा था तो उन की ख़ातिर जिदाल में सर से पाँव तक सुर्ख़ हो रहा था तो उन की ख़ातिर सो उस को महबूब जानता हूँ सो उस को मक़्सूद मानता हूँ सआदतें उस के नाम से हैं मोहब्बतें उस के नाम से हैं मोहब्बतों के सभी घरानों की निस्बतें उस के नाम से हैं

Iftikhar Arif

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अजब दिन थे अजब ना-मेहरबाँ दिन थे बहुत ना-मेहरबाँ दिन थे ज़माने मुझ से कहते थे ज़मीनें मुझ से कहती थीं मैं इक बे-बस क़बीले का बहुत तन्हा मुसाफ़िर हूँ वो बे-मंज़िल मुसाफ़िर हूँ जिसे इक घर नहीं मिलता मैं उस रस्ते का राही हूँ जिसे रहबर नहीं मिलता मगर कोई मुसलसल दिल पे इक दस्तक दिए जाता था कहता था मुसाफ़िर! इस क़दर ना-मुतमइन रहने से क्या होगा मलाल ऐसा भी क्या जो ज़ेहन को हर ख़्वाब से महरूम कर दे जमाल-ए-बाग़-ए-आइंदा के हर इम्कान को मादूम कर दे गुल-ए-फ़र्दा को फ़स्ल-ए-रंग में मस्मूम कर दे दिलासे की इसी आवाज़ से सारी थकन कम हो गई थी और दिल को फिर क़रार आने लगा था सफ़र ज़ाद-ए-सफ़र शौक़-ए-सफ़र पर ए'तिबार आने लगा था मैं ख़ुश-क़िस्मत था कैसी साअत-ए-ख़ुश-रंग ओ ख़ुश-आसार में मुझ को मिरे बे-बस बहुत तन्हा क़बीले को नया घर मिल गया था एक रहबर मिल गया था एक मंज़िल मिल गई थी और इमकानों भरा ख़्वाबों से उम्मीदों से रौशन एक मंज़र मिल गया था

Iftikhar Arif

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