बुलंद-आहंगियों ने फाड़ डाले कान के पर्दे हूँ वो मुतरिब जो ख़ुद अपनी सदा ही सुन नहीं सकता हवाएँ ले उड़ी हैं सिलसिले को मेरे नग़्मों के मैं इन बिखरी हुई कड़ियों को अपनी चुन नहीं सकता ग़ुरूर-ए-ख़ुश-नवाई बोझ सा है मेरी गर्दन पर ज़माना वज्द में है और मैं सर धुन नहीं सकता
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इक ख़त मुझे लिखना है दिल्ली में बसे दिल को इक दिन मुझे चखना है खाजा तेरी नगरी का खुसरो तेरी चौखट से इक शब मुझे पीनी है शीरीनी सुख़नवाली ख़ुशबू ए वतन वाली ग़ालिब तेरे मरकद को इक शे'र सुनाना है इक सांवली रंगत को चुपके से बताना है मैं दिल भी हूँ दिल्ली भी उर्दू भी हूँ हिन्दी भी इक ख़त मुझे लिखना है मुमकिन है कभी लिक्खूँ मुमकिन है अभी लिक्खूँ
Ali Zaryoun
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने
"Nadeem khan' Kaavish"
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई
Kaifi Azmi
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कितने असनाम ना-तराशीदा पत्थरों ही में कसमसाते हैं कितने ही ना-शगुफ़्ता लाला-ओ-गुल ज़ेहन-ए-बुलबुल को गुदगुदाते हैं कितने ही जल्वा-हा-ए-नादीदा अभी पर्दे में मुस्कुराते हैं ना-सराईदा कितने ही नग़्में दिल के तारों से लिपटे जाते हैं किस ने छेड़ा है साज़-ए-मुस्तक़बिल आज लम्हात गुनगुनाते हैं किस ने छेड़ा है साज़-ए-मुस्तक़बिल आज लम्हात गुनगुनाते हैं
Parvez Shahidi
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आह! गंगा ये हसीं पैकर-ए-बिल्लोर तिरा तेरी हर मौज-ए-रवाँ जलवा-ए-मग़रूर तिरा जौर-ए-मग़रिब से मगर दिल है बहुत चूर तिरा झाँकता है तिरे गिर्दाब से नासूर तिरा ज़ुल्म ढाए हैं सफ़ीनों ने सितमगारों के ज़ख़्म अब तक तिरे सीने पे हैं पतवारों के महव रहते थे सितारे तिरी मय पीने में चाँद मुँह देखता था तेरे ही आईने में ख़ल्वत-ए-महर दरख़्शाँ थी तिरे सीने में तेरी ताबानियाँ आती न थीं तख़मीने में आज रोती है मगर तेरी जवानी तुझ को खा गया आ के यहाँ 'टेम्स' का पानी तुझ को आह ऐ कोह-ए-हिमाला के ग़ुरूर-ए-सय्याल तेरे दामन पे कभी बैठी न थी गर्द-ए-मलाल मुँह तिरा पोंछता था चाँद का सीमीं रूमाल ज़ख़्म सीने पे लिए आज हैं धारे तेरे उफ़ कहाँ डूब गए चाँद सितारे तेरे रेग-ए-दोज़ख़ को छुपाए है क़बा के अंदर हौल-नाक आज है कितना ये दहकता मंज़र शाम ही शाम नज़र आती है क्यूँँ साहिल पर? क्यूँँ तिरी मौजों से छन्ते नहीं अनवार-ए-सहर? रौशनी क्यूँँ हुई जाती है गुरेज़ाँ तुझ से क्यूँँ अँधेरों के हैं लिपटे हुए तूफ़ाँ तुझ से आज साहिल पे नज़र आती है जलती हुई आग आदमिय्यत का सुलगता है हवाओं में सुहाग आज है साज़-ए-सियासत का भयानक सा राग फन उठाए हुए बल खाते हैं शोलों के नाग आज इंसान को डसती हैं हवाएँ तेरी ज़हरस कितनी हैं लबरेज़ फ़ज़ाएँ तेरी आई है टेम्स से इक मौज-ए-रवाँ गाती हुई तुझ को आज़ादी के पैग़ाम से बहलाती हुई रूह मय-ख़ाना लिए शौक़ को बहकाती हुई नाज़ करती हुई हँसती हुई इठलाती हुई लाख उलझा करें ज़ुल्फ़ों में उलझने वाले इस के इश्वों को समझते हैं समझने वाले लेकिन ऐ बिन्त-ए-हिमाला तिरी अज़्मत की क़सम सैल के साँचे में ढाली हुई रिफ़अत की क़सम तेरे जल्वों की क़सम, तेरी लताफ़त की क़सम तेरी मौजों से उभरती हुई हिम्मत की क़सम अब तिरी आँखों को नमनाक न होने देंगे दामन-ए-नाज़ तिरा चाक न होने देंगे
Parvez Shahidi
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दोस्ती कहाँ जाए? उस की आस्तीनों से बिफरे साँप निकले हैं गुथ गए हैं मुँह खोले बीन वज्द करती है और सपेरा हँसता है
Parvez Shahidi
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