nazmKuch Alfaaz

दोस्ती कहाँ जाए? उस की आस्तीनों से बिफरे साँप निकले हैं गुथ गए हैं मुँह खोले बीन वज्द करती है और सपेरा हँसता है

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"बन्दा और ख़ुदा" एक मुख़्तसर सी कहानी है जो ज़फ़र कि मुँह-ज़बानी है ये हुकूमत आसमानी है हर मख़्लूक़ रूहानी है ये ख़ुदा की मेहरबानी है की सज्दों में झुकती पेशानी है ये सारी दुनिया फ़ानी है हर शख़्स को मौत आनी है ये इंसानियत अय्याशी की दीवानी है हर शख़्स की ढलती जवानी है क़ुदरत की पकड़ से कोई नहीं बचा ये आ रहे अज़ाब क़यामत की निशानी है ये लोगों की गुमराही और बड़ी नादानी है की कहाँ ऊपर ख़ुदा को शक्ल हमें दिखानी है

ZafarAli Memon

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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क्या लिख दूँ? क्या लिख दूँ इस काग़ज़ पर? कि जब तुम तक ये पहुँचे तो महसूस कर सको सिर्फ़ पढ़ो नहीं क्या लिख दूँ कि ये ख़त सिर्फ़ ख़त ना रह जाए तुम सेे झगड़े और जिरह कर पाए उन बातों के लिए जो तुम्हारे लिए शायद सिर्फ़ बातें होंगीं वो सारे लम्हात जो तुम्हारे लिए महज़ कुछ दिन और कुछ रातें होंगीं क्या लिख दूँ? वो शिकायती तंज़? जो मैं जानता हूँ नज़रअंदाज़ कर दोगे तुम या अपनी सारी यादें सियाही में बाँध कर एक पुड़िया सी बना दूँ? कि जब तुम उसे खोलो तो तुम्हारा ज़ेहन भी महकने लगे उन सेे मेरी तरह

Saurabh Mehta 'Alfaaz'

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बुलंद-आहंगियों ने फाड़ डाले कान के पर्दे हूँ वो मुतरिब जो ख़ुद अपनी सदा ही सुन नहीं सकता हवाएँ ले उड़ी हैं सिलसिले को मेरे नग़्मों के मैं इन बिखरी हुई कड़ियों को अपनी चुन नहीं सकता ग़ुरूर-ए-ख़ुश-नवाई बोझ सा है मेरी गर्दन पर ज़माना वज्द में है और मैं सर धुन नहीं सकता

Parvez Shahidi

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कितने असनाम ना-तराशीदा पत्थरों ही में कसमसाते हैं कितने ही ना-शगुफ़्ता लाला-ओ-गुल ज़ेहन-ए-बुलबुल को गुदगुदाते हैं कितने ही जल्वा-हा-ए-नादीदा अभी पर्दे में मुस्कुराते हैं ना-सराईदा कितने ही नग़्में दिल के तारों से लिपटे जाते हैं किस ने छेड़ा है साज़-ए-मुस्तक़बिल आज लम्हात गुनगुनाते हैं किस ने छेड़ा है साज़-ए-मुस्तक़बिल आज लम्हात गुनगुनाते हैं

Parvez Shahidi

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आह! गंगा ये हसीं पैकर-ए-बिल्लोर तिरा तेरी हर मौज-ए-रवाँ जलवा-ए-मग़रूर तिरा जौर-ए-मग़रिब से मगर दिल है बहुत चूर तिरा झाँकता है तिरे गिर्दाब से नासूर तिरा ज़ुल्म ढाए हैं सफ़ीनों ने सितमगारों के ज़ख़्म अब तक तिरे सीने पे हैं पतवारों के महव रहते थे सितारे तिरी मय पीने में चाँद मुँह देखता था तेरे ही आईने में ख़ल्वत-ए-महर दरख़्शाँ थी तिरे सीने में तेरी ताबानियाँ आती न थीं तख़मीने में आज रोती है मगर तेरी जवानी तुझ को खा गया आ के यहाँ 'टेम्स' का पानी तुझ को आह ऐ कोह-ए-हिमाला के ग़ुरूर-ए-सय्याल तेरे दामन पे कभी बैठी न थी गर्द-ए-मलाल मुँह तिरा पोंछता था चाँद का सीमीं रूमाल ज़ख़्म सीने पे लिए आज हैं धारे तेरे उफ़ कहाँ डूब गए चाँद सितारे तेरे रेग-ए-दोज़ख़ को छुपाए है क़बा के अंदर हौल-नाक आज है कितना ये दहकता मंज़र शाम ही शाम नज़र आती है क्यूँँ साहिल पर? क्यूँँ तिरी मौजों से छन्ते नहीं अनवार-ए-सहर? रौशनी क्यूँँ हुई जाती है गुरेज़ाँ तुझ से क्यूँँ अँधेरों के हैं लिपटे हुए तूफ़ाँ तुझ से आज साहिल पे नज़र आती है जलती हुई आग आदमिय्यत का सुलगता है हवाओं में सुहाग आज है साज़-ए-सियासत का भयानक सा राग फन उठाए हुए बल खाते हैं शोलों के नाग आज इंसान को डसती हैं हवाएँ तेरी ज़हरस कितनी हैं लबरेज़ फ़ज़ाएँ तेरी आई है टेम्स से इक मौज-ए-रवाँ गाती हुई तुझ को आज़ादी के पैग़ाम से बहलाती हुई रूह मय-ख़ाना लिए शौक़ को बहकाती हुई नाज़ करती हुई हँसती हुई इठलाती हुई लाख उलझा करें ज़ुल्फ़ों में उलझने वाले इस के इश्वों को समझते हैं समझने वाले लेकिन ऐ बिन्त-ए-हिमाला तिरी अज़्मत की क़सम सैल के साँचे में ढाली हुई रिफ़अत की क़सम तेरे जल्वों की क़सम, तेरी लताफ़त की क़सम तेरी मौजों से उभरती हुई हिम्मत की क़सम अब तिरी आँखों को नमनाक न होने देंगे दामन-ए-नाज़ तिरा चाक न होने देंगे

Parvez Shahidi

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