nazmKuch Alfaaz

बर्फ़ की आँधियाँ चीख़ती दहाड़ती एक हैजान में शहर-ए-जाँ की फ़सीलों पे यूँँ हमला-आवर हुईं इक धमाका हुआ सब शजर गिर गए हर मकाँ ढे गया दर दरीचों के टुकड़े हुए जा-ब-जा आब-ए-जू मुंजमिद हो गई हर गली यख़ सफ़ेदी में यूँँ छुप गई बर्फ़ की रेत का ढेर सारा नगर हो गया और उस से तराशी गई इक चमकती हुई बर्फ़ की मूर्ती काम आती है बच्चों के हर खेल में!!

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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!

Raghav Ramkaran

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जब वो मुझ को कहती थी एक शे'र सुनाओ उस के उपरी लब को चूम के हट जाता था उस के ज़ेहन में क्या आता था? तैश में आ कर कहती थी - “शे'र मुकम्मल कौन करेगा? सानी मिसरा कौन पढ़ेगा?”

Zubair Ali Tabish

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"उस की ख़ुशियाँ" सारी झीलें सूख गई हैं उस की आँखें सूख गई हैं पेड़ों पर पंछी भी चुप हैं उस को कोई दुख है शायद रस्ते सूने सूने हैं सब उस ने टहलना छोड़ दिया है सारी ग़ज़लें बेमानी हैं उस ने पढ़ना छोड़ दिया है वो भी हँसना भूल चुकी है गुलों ने खिलना छोड़ दिया है सावन का मौसम जारी है या'नी उस का ग़म जारी है बाक़ी मौसम टाल दिए हैं सुख कूएँ में डाल दिए हैं चाँद को छुट्टी दे दी गई है तारों को मद्धम रक्खा है आतिश-दान में फेंक दी ख़ुशियाँ दिल में बस इक ग़म रक्खा है खाना पीना छोड़ दिया है सब सेे रिश्ता तोड़ दिया है हाए क़यामत आने को है उस ने जीना छोड़ दिया है हर दिल ख़ुश हर चेहरा ख़ुश हो वो हो ख़ुश तो दुनिया ख़ुश हो वो अच्छी तो सब अच्छा है और दुनिया में क्या रक्खा है ये सब सुन कर ख़ुदा ने बोला बोल तेरी अब ख़्वाहिश क्या है मैं ने बोला मेरी ख़्वाहिश मेरी ख़्वाहिश उस की ख़ुशियाँ ख़ुदा ने बोला तेरी ख़्वाहिश मैं फिर बोला उस की ख़ुशियाँ इस के अलावा पूछ रहा हूँ मैं ने बोला उस की ख़ुशियाँ अपने लिए कुछ माँग ले पगले माँग लिया ना उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ

Varun Anand

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"ख़त" तुम को ये बताना था या फिर ये समझाना था दिल की बस ये चाहत थी बस तुम पर प्यार लुटाना था तुम को ये बताना था था छेड़ना तुम को थोड़ा थोड़ा तुम्हें सताना था जो रूठ जाते तुम मुझ सेे हाँ मुझ को तुम्हें मनाना था फिर तुम को गले लगाना था तुम को ये बताना था लड़ के भी तुम सोते तो तुम्हारा सिर सहलाना था मक़्सद सिर्फ़ एक था तुम्हारा प्यार कमाना था सारी दुनिया मिट्टी है तुम्हारा साथ ख़ज़ाना था तुम को ये बताना था मिलने तुम सेे आना था या फिर तुम्हें बुलाना था माँग तुम्हारी भरनी थी अपना तुम्हें बनाना था तुम्हारा ही कहलाना था तुम को ये बताना था इस जीवन का हर मंज़र तुम्हारे साथ बिताना था हर फेरे का हर वा'दा तुम्हारे साथ निभाना था मंगलसूत्र इन हाथों से तुम को ही पहनाना था तुम को ये बताना था फ़ासले जितने भी थे उन को मुझे मिटाना था उस ख़ुदा से हर जन्म में तुम्हारा साथ लिखाना था फिर बारात तुम्हारी चौखट पर तुम सेे ही ब्याह रचाना था तुम को ये बताना था बिन बोले बस चुपके से गजरा तुम्हें दिलाना था बनाता मैं एक दिन खाना फिर खाना तुम्हें खिलाना था तुम्हारे हाथों से खाना मुझ को भी तो खाना था तुम को ये बताना था खो दिया तुम को मैं ने ये दुख अब मुझे मनाना था डूब जाता आसमान बस आँसू मुझे बहाना था फिर लिख दिया मैं ने आँसू बस इतना मेरा फ़साना था तुम को ये बताना था बस तुम को ये बताना था

Divya 'Kumar Sahab'

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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइ‌नात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है

Divya 'Kumar Sahab'

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वो सालमिय्यत थी एक वहदत वो कामिलिय्यत किसी तरह एक ग़ैर-मज़बूत सानिए में बिखर गई तो अलग हुआ उस का एक हिस्सा! वो एक उंसुर का एक हिस्सा झटक के दामन ख़ला के गहरे अमीक़ ला-वक़्त फ़ासलों को उबूर करता हज़ारों सदियों की दूरियों पर चला गया है.......! कोई नहीं जानता के कैसे वो ना-मुकम्मल शिकस्ता उंसुर अधूरे-पन की अज़िय्यतों से गुज़र रहा है मगर वो इतना तो जानता है कि जान से भी अज़ीज़-तर वो अधूरा उंसुर अटूट बंधन की एक डोरी से बे-लचक सा बँधा हुआ है! हवा की डोरी का इक सिरा उस के हाथ में है तो दूसरा उस के हाथ में है अगर ये रंजूर हो गया तो हवा के तारों पे दुख की लहरें वहाँ पहुँच कर उसे भी दुख में लपेट लेंगी!!

Parvin Sheer

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मेहरबाँ नाज़ुक रिदाओं की तहों में नर्म बाहोँ की पनाहों में है रक़्साँ ये ज़मीं वो इक सिपर बन कर झुलसने से बचा लेती हैं उस को नग़्मा-गर सैक़ल फ़ज़ाएँ सब्ज़ रेशम की क़बा पहने ज़मीं हाथों में था में नस्तरन नर्गिस समन नाज़ुक तहों में ज़िंदगी है किस क़दर महफ़ूज़ लेकिन....... लहजा लहजा हर परत मादूम होती जा रही है! एक दिन जब आख़िरी तह की सिपर होगी शिकस्ता मेहरबाँ ओज़ोन(Ozone) की चादर में लिपटी ये ज़मीं जब बे-क़बा हो जाएगी तो अर्ग़वानी आग मोहलिक उँगलियों से उस की शादाबी को अपनी आँच में झुल्साएगी और ये धुआँ बन कर ख़लाओं में उड़ेगी......!

Parvin Sheer

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जब भी दिल भर आया आँखें छल्कीं तन्हाई के इक गोशे में उस के काँधे पे सर रख कर उस से दिल की बातें कह कर जी कुछ तो हल्का होता था उस की दिल-जूई की उँगली मेरी पलकों से रख़्शाँ गौहर चुन चुन कर अपनी पलकों के धागे में पिरो के रख लेती थी इक दिन शाम के गहरे साए शजर के ज़र्दी माइल आँसू क़तरा क़तरा बहते बहते मेरी आँखों में दर आए! बोझल क़दमों से चल कर उस की बाँहों में जाना चाहा हर गोशे में उस को ढूँड के हार चुकी हूँ सब आईने तोड़ चुकी हूँ!

Parvin Sheer

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