ऐ ख़ुदा तेरा लाचार बंदा तिश्ना-लब बे-सहारा बे-यक़ीनी के सहरा में तन्हा खड़ा है किताबों से लहजों से लफ़्ज़ों से मेरा यक़ीं उठ चुका है हर तरफ़ शोर है खोखले अल्फ़ाज़-ओ-इज़हार का सिर्फ़ प्रचार का सब अक़ीदे नज़रिये महज़ इश्तिहारात हैं ढोल पीटे चले जा रहे हैं इस क़दर शोर है कि समाअ'त भी पथरा गई है इस क़दर रौशनी के बसारत भी धुँदला गई ऐ ख़ुदा रौशनी के अँधेरे में इक नूर दे नूर ऐसा कि जिस से मुनव्वर हो दिल अब्र-ए-रहमत यक़ीं का बे-यक़ीनी के सहरा पे साया-फ़गन हो
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम
Tehzeeb Hafi
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"ख़त" तुम को ये बताना था या फिर ये समझाना था दिल की बस ये चाहत थी बस तुम पर प्यार लुटाना था तुम को ये बताना था था छेड़ना तुम को थोड़ा थोड़ा तुम्हें सताना था जो रूठ जाते तुम मुझ सेे हाँ मुझ को तुम्हें मनाना था फिर तुम को गले लगाना था तुम को ये बताना था लड़ के भी तुम सोते तो तुम्हारा सिर सहलाना था मक़्सद सिर्फ़ एक था तुम्हारा प्यार कमाना था सारी दुनिया मिट्टी है तुम्हारा साथ ख़ज़ाना था तुम को ये बताना था मिलने तुम सेे आना था या फिर तुम्हें बुलाना था माँग तुम्हारी भरनी थी अपना तुम्हें बनाना था तुम्हारा ही कहलाना था तुम को ये बताना था इस जीवन का हर मंज़र तुम्हारे साथ बिताना था हर फेरे का हर वा'दा तुम्हारे साथ निभाना था मंगलसूत्र इन हाथों से तुम को ही पहनाना था तुम को ये बताना था फ़ासले जितने भी थे उन को मुझे मिटाना था उस ख़ुदा से हर जन्म में तुम्हारा साथ लिखाना था फिर बारात तुम्हारी चौखट पर तुम सेे ही ब्याह रचाना था तुम को ये बताना था बिन बोले बस चुपके से गजरा तुम्हें दिलाना था बनाता मैं एक दिन खाना फिर खाना तुम्हें खिलाना था तुम्हारे हाथों से खाना मुझ को भी तो खाना था तुम को ये बताना था खो दिया तुम को मैं ने ये दुख अब मुझे मनाना था डूब जाता आसमान बस आँसू मुझे बहाना था फिर लिख दिया मैं ने आँसू बस इतना मेरा फ़साना था तुम को ये बताना था बस तुम को ये बताना था
Divya 'Kumar Sahab'
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तुम हमारे लिए तुम हमारे लिए अर्चना बन गई हम तुम्हारे लिए एक दर्पण प्रिये तुम मिलो तो सही हाल पूछो मेरा हम न रो दें तो कह देना पत्थर प्रिये प्यार मिलना नहीं था अगर भाग्य में देवताओं ने हम सेे ये छल क्यूँ किया मेरे दिल में भरी रेत ही रेत थी दे के अमृत ये हम को विकल क्यूँ किया अप्सरा हो तो हो पर हमारे लिए तुम ही सुंदर सुकोमल सुघर हो प्रिये देवताओं के गणितीय संसार में ऐसा भी है नहीं कोई अच्छा न था हम अगर इस जनम भी नहीं मिल सके सब कहेंगे यही प्यार सच्चा न था कायरों को कभी प्यार मिलता नहीं फ़ैसला कोई ले लो कि डटकर प्रिये मम्मी कहती थीं चंदा बहुत दूर है चाँद से आगे हम को सितारा लगा यूँँ तो चेहरे ही चेहरे थे दुनिया में पर एक तेरा ही चेहरा पियारा लगा पलकों पे मेरी रख कर क़दम तुम चलो पॉंव में चुभ न जाए कि कंकड़ प्रिये
Rakesh Mahadiuree
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मेरी बस्ती में बहुत देर से सन्नाटा है न कहीं नाला-ओ-शेवन न कोई शोर-ए-बुका पर कहीं दूर बहुत दूर किसी कूचे से हौले हौले सिसकने की सदा आई है सुन के ये गिर्या-ए-उफ़्तादा तसल्ली सी हुई मेरी बस्ती में अभी कोई बशर ज़िंदा है ख़त्म हो जाएगी ये रात सहर ज़िंदा है क्या अजब कि यही मौहूम सी आवाज़ यही सिसकारी एक दिन शोर-ए-बुका बन जाए एक एलान-ए-वग़ा बन जाए
Aarif Akhtar Naqvi
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मैं शहर-ए-तमन्ना की ताराज नगरी के मलबे में लाचार-ओ-तन्हा कभी इस खंडर पर कभी उस खंडर तक भटकता हुआ ढूँडता फिर रहा हूँ अपने मासूम मिस्मार ख़्वाबों का मलबा तभी इक तरफ़ को नज़र जो गई तो दिखाई दिया टूटे फूटे जलाए गए कुछ मकाँ एक मीनार-ए-मस्जिद कलश एक मंदिर का औंधा पड़ा है कुरेदा तो मलबे के नीचे मेरा ख़्वाब साँझी विरासत का एक साज़ भी दफ़्न था मुझे याद आया मेरे अम्माँ अब्बा ने इस साज़ पर कितने उल्फ़त के नग़्में बजा कर सिखाए थे हम को जवानी में इस साज़ की नर्म दिलकश धुनों पर बड़े जोश और हौसले से तराने मोहब्बत के गाय थे हम ने मगर फिर रूह-परवर अज़ानों की आवाज़ और मंदिरों के भजन दिलकशी भूल कर अपने ग़लबे का एलान बनते गए शोर इतना बढ़ा साज़-ए-उल्फ़त की आवाज़ भी दब गई शोर से जोश बढ़ता गया होश जाता रहा और फिर ये हुआ आज शहर-ए-तमन्ना की हालत है जो जिस तरफ़ देखिए राख ही राख है और मैं अपनी मीरास को अपनी साँझी विरासत के टूटे हुए साज़ को अपने दिल से लगाए दिल-शिकस्ता-ओ-गिर्यां खड़ा हूँ क्या करूँँ इस को मलबे में ही दफ़्न कर दूँ मुझ से ये तो नहीं होगा ऐसा करता हूँ टूटे हुए साज़ को अपनी औलाद को सौंप दूँ बस इसी आस पर इसी उम्मीद में मेरे बच्चे फिर उस साज़ को जोड़ कर गीत उल्फ़त के फिर गुनगुनाने लगें नफ़रतों को मिटाने लगें काश ये हो सके
Aarif Akhtar Naqvi
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मुझे तुम से कोई मोहब्बत न उल्फ़त तअ'ल्लुक़ भी अब है बरा-ए-तअ'ल्लुक़ मगर तुम से जब भी मिला हूँ मुझे मेरा साया जिसे मैं वहीं छोड़ आया जहाँ वो ख़यालों की वादी में ख़्वाहिश की तितली के पीछे उड़ा जा रहा था तुम्हारी घनी ज़ुल्फ़ की बदलियों में ज़मीं से बहुत दूर लेकिन मेरे पैर में डोर ऐसी बंधी थी कि जिस ने मुझे बदलियों से उठा कर ज़मीं पर बिठा कर मेरे चारों जानिब कई दाएरे बुन दिए हैं है दुश्वार जिन से निकलना मगर तुम से जब भी मिला हूँ मुझे मेरा साया बहुत याद आया
Aarif Akhtar Naqvi
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