nazmKuch Alfaaz

फ़ुटपाथ पे इक बेकस इंसाँ तकलीफ़ में तड़पा करता है दुनिया में कोई ग़म-ख़्वार नहीं मजबूर है आहें भरता है बरसात हो या जाड़ा गर्मी हर मौसम एक गुज़रता है एहसास न कपड़ों का तन पर बस भूक के मारे मरता है अम्बार पे कूड़े के जा कर वो पेट का दोज़ख़ भरता है फिर भी तुझ पे जाँ देता है फिर भी तेरा दम भरता है है वक़्फ़-ए-सितम दुनिया में जो जाँ तुझ पे निछावर करता है कुछ बोल मिरे महबूब ख़ुदा क्यूँ उस पे जफ़ाएँ करता है क्या तेरे ख़ज़ाने ख़ाली हैं या तू भी किसी से डरता है जब तेरा कोई क़ानून नहीं करने दे जो इंसाँ करता है जिस वक़्त से देखा है यारब उस वक़्त से ये दिल डरता है जो तुझ पे मरे जो तुझ से डरे तू ज़ुल्म उसी पर करता है आ अर्श से तू भी देख ज़रा क्यूँँकर तिरा बंदा मरता है 'नाशाद' की आँखों से अक्सर तूफ़ाँ अश्कों का बहता है

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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फ़साना-ए-ग़म-ए-दिल अब नहीं सुने जाते शब-ए-फ़िराक़ में तारे नहीं गिने जाते दिल-ओ-जिगर में है इक दर्द कहकशाँ की तरह ग़लत जगह कभी अफ़्शाँ नहीं चुने जाते लगी है चोट मुसलसल कुछ इस तरह दिल में कि हम से दाग़-ए-जिगर भी नहीं गिने जाते असर हो जिस का वही शे'र शे'र है 'नाशाद' हर एक शे'र पे सर भी नहीं धुने जाते

Raabia Sultana Nashad

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सब ने मुझ से किया है किनारा सिर्फ़ तेरा है यारब सहारा अश्क-ए-ग़म यूँँही बहते रहेंगे या रुकेगा कभी ग़म का धारा मेरी कश्ती है तूफ़ाँ की ज़द में मिल गया बहर-ए-ग़म का किनारा ज़ब्त की भी कोई इंतिहा है मैं कहाँ तक करूँँ ग़म गवारा सू-ए-मंज़िल बढ़ी हूँ मैं यारब तेरी रहमत का ले कर सहारा किस तरह हाल दिल का छुपाऊँ जो हो चेहरे से ग़म आश्कारा हम ज़माने में सब के हैं 'नाशाद' और कोई नहीं है हमारा

Raabia Sultana Nashad

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मिरी तस्वीर ले कर क्या करोगे मिरी तस्वीर इक ख़्वाब-ए-परेशाँ छुपे हैं इस में लाखों ग़म के तूफ़ाँ मिरी तस्वीर ले कर क्या करोगे मिरी तस्वीर है मायूस-ओ-मुज़्तर मेरी तस्वीर रंज-ओ-ग़म का पैकर ये इक दिन बार हो जाएगी तुम पर मिरी तस्वीर ले कर क्या करोगे मिरी तस्वीर में कब ज़िंदगी है सरापा ग़म सरापा बेकसी है जबीं रौशन न होंटों पर हँसी है मिरी तस्वीर ले कर क्या करोगे मिरी तस्वीर है कुछ धुँदली धुँदली मिरी तस्वीर है अश्कों से भीगी मिरी तस्वीर है खोई हुई सी मिरी तस्वीर ले कर क्या करोगे न फिर हाथों में यूँँ लोगे तुम उस को न अपने पास रक्खोगे तुम उस को उठा कर फेंक ही दोगे तुम उस को मिरी तस्वीर ले कर क्या करोगे

Raabia Sultana Nashad

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दिल-ए-मायूस बता ऐ दिल-ए-नाकाम बता मुब्तला-ए-सितम-ए-गर्दिश-ए-अय्याम बता जी के मैं क्या करूँँ दुनिया में मिरा काम है क्या ख़ून उम्मीद का होता है सर-ए-बज़्म-ए-तरब बन गया हौसला ग़म ही मुसीबत का सबब जी के मैं क्या करूँँ दुनिया में मिरा काम है क्या दर्द बढ़ जाए अगर चारागरी कौन करे है कठिन राह-ए-वफ़ा राहबरी कौन करे जी के मैं क्या करूँँ दुनिया में मिरा काम है क्या गुलशन-ए-शौक़ में काँटों के सिवा कुछ न मिला हाए दुनिया में वफ़ाओं का सिला कुछ न मिला जी के मैं क्या करूँँ दुनिया में मिरा काम है क्या जुस्तुजू किस की है 'नाशाद' कोई क्या जाने क्यूँ दिल-ए-ज़ार है बर्बाद कोई क्या जाने जी के मैं क्या करूँँ दुनिया में मिरा काम है क्या

Raabia Sultana Nashad

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गोशा-ए-दिल में तेरा दर्द छुपाया मैं ने चश्म-ए-तर को भी न ये राज़ बताया मैं ने कौन वो शब है जो बे-अश्क बहाए गुज़री कौन वो ग़म है जो दिल पर न उठाया मैं ने की ज़माने से कभी कोई शिकायत न गिला अपने रिसते हुए ज़ख़्मों को छुपाया मैं ने अब तो दम ज़ब्त की शिद्दत से घटा जाता है इस क़दर दर्द को सीने में दबाया मैं ने हैफ़ बर हाल दिल-ए-ज़ार कि आईना हुआ लाख पर्दे में हर इक राज़ छुपाया मैं ने ज़िंदगी गुज़री है बे-कैफ़ सी यारब फिर भी गरचे हँस हँस के हर इक ग़म को मिटाया मैं ने किस ने ये कश्मकश-ए-शाम-ए-अलम देखी है जब कोई दर्द उठा दिल में दबाया मैं ने कब तक इस तौर से 'नाशाद' गुज़ारूँगी हयात जब ख़ुशी कोई मिली अश्क बहाएा में ने

Raabia Sultana Nashad

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