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मिरी तस्वीर ले कर क्या करोगे मिरी तस्वीर इक ख़्वाब-ए-परेशाँ छुपे हैं इस में लाखों ग़म के तूफ़ाँ मिरी तस्वीर ले कर क्या करोगे मिरी तस्वीर है मायूस-ओ-मुज़्तर मेरी तस्वीर रंज-ओ-ग़म का पैकर ये इक दिन बार हो जाएगी तुम पर मिरी तस्वीर ले कर क्या करोगे मिरी तस्वीर में कब ज़िंदगी है सरापा ग़म सरापा बेकसी है जबीं रौशन न होंटों पर हँसी है मिरी तस्वीर ले कर क्या करोगे मिरी तस्वीर है कुछ धुँदली धुँदली मिरी तस्वीर है अश्कों से भीगी मिरी तस्वीर है खोई हुई सी मिरी तस्वीर ले कर क्या करोगे न फिर हाथों में यूँँ लोगे तुम उस को न अपने पास रक्खोगे तुम उस को उठा कर फेंक ही दोगे तुम उस को मिरी तस्वीर ले कर क्या करोगे

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जब वो मुझ को कहती थी एक शे'र सुनाओ उस के उपरी लब को चूम के हट जाता था उस के ज़ेहन में क्या आता था? तैश में आ कर कहती थी - “शे'र मुकम्मल कौन करेगा? सानी मिसरा कौन पढ़ेगा?”

Zubair Ali Tabish

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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!

Raghav Ramkaran

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ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो कि जैसे सच-मुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही हो ये जिस्म-ए-नाज़ुक, ये नर्म बाहें, हसीन गर्दन, सिडौल बाज़ू शगुफ़्ता चेहरा, सलोनी रंगत, घनेरा जूड़ा, सियाह गेसू नशीली आँखें, रसीली चितवन, दराज़ पलकें, महीन अबरू तमाम शोख़ी, तमाम बिजली, तमाम मस्ती, तमाम जादू हज़ारों जादू जगा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो गुलाबी लब, मुस्कुराते आरिज़, जबीं कुशादा, बुलंद क़ामत निगाह में बिजलियों की झिल-मिल, अदाओं में शबनमी लताफ़त धड़कता सीना, महकती साँसें, नवा में रस, अँखड़ियों में अमृत हमा हलावत, हमा मलाहत, हमा तरन्नुम, हमा नज़ाकत लचक लचक गुनगुना रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो तो क्या मुझे तुम जला ही लोगी गले से अपने लगा ही लोगी जो फूल जूड़े से गिर पड़ा है तड़प के उस को उठा ही लोगी भड़कते शोलों, कड़कती बिजली से मेरा ख़िर्मन बचा ही लोगी घनेरी ज़ुल्फ़ों की छाँव में मुस्कुरा के मुझ को छुपा ही लोगी कि आज तक आज़मा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो नहीं मोहब्बत की कोई क़ीमत जो कोई क़ीमत अदा करोगी वफ़ा की फ़ुर्सत न देगी दुनिया हज़ार अज़्म-ए-वफ़ा करोगी मुझे बहलने दो रंज-ओ-ग़म से सहारे कब तक दिया करोगी जुनूँ को इतना न गुदगुदाओ, पकड़ लूँ दामन तो क्या करोगी क़रीब बढ़ती ही आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो

Kaifi Azmi

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"रायगानी-2" जो बात गिनती के कुछ दिनों से शुरू थी वो साल-हा-साल तक चली है कई ज़मानों में बँट गई है मैं इन ज़मानों में लम्हा लम्हा तुम्हारी नज़रों के बिन रहा हूँ मैं अब तलक भी तुम्हारे जाने का बाक़ी नुक़सान गिन रहा हूँ मुझे ज़माना ये कह रहा था कि राइगानी मुबालगा है भला तुम्हारी जुदाई का दुख ज़माँ मकाँ को हिला रहा है भला रिलेटिविटी की साइंस किसी के मुड़ने से मुंसलिक है इन्हें बताओ तुम्हारे जाने का दुख उठा कर फ़क़त अकेला वो मैं नहीं था जो ज़र्रा ज़र्रा बिखर गया था तुम्हारे जाने के कुछ दिनों में हमारा हॉकिंग भी मर गया था और उस की थ्योरी के काले गड्ढे जिन्हें हमेशा तुम्हारी आँखों में देखना था वो मेरे चेहरे पे पड़ गए हैं, वो मेरी आँखों में गड़ गए हैं तुम्हारे जाने के बा'द सब कुछ ही एक अस्सी के ज़ाविए पर पलट गया है कि मेरा होना तुम्हारे होने से मुंसलिक था तुम्हारी आँखों की रौशनी थी तो मैं भी दुनिया में हो रहा था तुम्हारे लहजे के सुर मिले थे तो मैं बना था तुम्हारे हाथों का लम्स हाथों को मिल रहा था तो देखता था हमारे हाथों में एटमों की दफ़ा की कुव्वत कशिश में कैसे बदल रही है पर अब तुम्हारी नज़र कहीं है तुम्हारा लहजा भी अब नहीं है तो तुम बताओ मैं किस तरीक़े से अपनी हस्ती को नैस्ती से जुदा करूँँगा मैं दंग आँखों से सारी दुनिया को देखता हूँ और अपने होने की कोई इल्लत तलाशता हूँ अजीब तरह का बे-निशान बे-मक़ाम दुख है समझने वाले समझ गए थे ये राइगानी है राइगानी तमाम सदियों का ख़ाम दुख है मैं अब हक़ीक़त समझ रहा हूँ तमाम दुख था तमाम दुख है तुम्हें बताऊँ किसी के होने का कोई मक़सद कोई मआ'नी कहीं नहीं है अगर तो नीत्शे नहीं मरा है तो उस से पूछा क्या करेंगे ज़मीं पे रह के पले बढ़ेंगे बका की ख़ातिर लड़े मरेंगे फिर अपने जैसे कई जनेंगे और इस जहाँ से निकल पड़ेंगे जिन्हे जनेंगे वो सब के सब भी यही करेंगे पले बढ़ेंगे लड़े मरेंगे फिर उन के बच्चे और उन के बच्चे ये क्या तमाशा-ए-हा-ओ-हू है ये ज़िंदगी है तो आख थू है

Sohaib Mugheera Siddiqi

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उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली मैं 'मीर' की हमराज़ हूँ 'ग़ालिब' की सहेली दक्कन के 'वली' ने मुझे गोदी में खेलाया 'सौदा' के क़सीदों ने मिरा हुस्न बढ़ाया है 'मीर' की अज़्मत कि मुझे चलना सिखाया मैं दाग़ के आंगन में खिली बन के चमेली उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली 'ग़ालिब' ने बुलंदी का सफ़र मुझ को सिखाया 'हाली' ने मुरव्वत का सबक़ याद दिलाया 'इक़बाल' ने आईना-ए-हक़ मुझ को दिखाया 'मोमिन' ने सजाई मिरे ख़्वाबों की हवेली उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली है 'ज़ौक़' की अज़्मत कि दिए मुझ को सहारे 'चकबस्त' की उल्फ़त ने मिरे ख़्वाब सँवारे 'फ़ानी' ने सजाए मिरी पलकों पे सितारे 'अकबर' ने रचाई मिरी बे-रंग हथेली उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली क्यूँ मुझ को बनाते हो तअस्सुब का निशाना मैं ने तो कभी ख़ुद को मुसलमां नहीं माना देखा था कभी मैं ने भी ख़ुशियों का ज़माना अपने ही वतन में हूँ मगर आज अकेली उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली

Iqbal Ashhar

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सब ने मुझ से किया है किनारा सिर्फ़ तेरा है यारब सहारा अश्क-ए-ग़म यूँँही बहते रहेंगे या रुकेगा कभी ग़म का धारा मेरी कश्ती है तूफ़ाँ की ज़द में मिल गया बहर-ए-ग़म का किनारा ज़ब्त की भी कोई इंतिहा है मैं कहाँ तक करूँँ ग़म गवारा सू-ए-मंज़िल बढ़ी हूँ मैं यारब तेरी रहमत का ले कर सहारा किस तरह हाल दिल का छुपाऊँ जो हो चेहरे से ग़म आश्कारा हम ज़माने में सब के हैं 'नाशाद' और कोई नहीं है हमारा

Raabia Sultana Nashad

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फ़ुटपाथ पे इक बेकस इंसाँ तकलीफ़ में तड़पा करता है दुनिया में कोई ग़म-ख़्वार नहीं मजबूर है आहें भरता है बरसात हो या जाड़ा गर्मी हर मौसम एक गुज़रता है एहसास न कपड़ों का तन पर बस भूक के मारे मरता है अम्बार पे कूड़े के जा कर वो पेट का दोज़ख़ भरता है फिर भी तुझ पे जाँ देता है फिर भी तेरा दम भरता है है वक़्फ़-ए-सितम दुनिया में जो जाँ तुझ पे निछावर करता है कुछ बोल मिरे महबूब ख़ुदा क्यूँ उस पे जफ़ाएँ करता है क्या तेरे ख़ज़ाने ख़ाली हैं या तू भी किसी से डरता है जब तेरा कोई क़ानून नहीं करने दे जो इंसाँ करता है जिस वक़्त से देखा है यारब उस वक़्त से ये दिल डरता है जो तुझ पे मरे जो तुझ से डरे तू ज़ुल्म उसी पर करता है आ अर्श से तू भी देख ज़रा क्यूँँकर तिरा बंदा मरता है 'नाशाद' की आँखों से अक्सर तूफ़ाँ अश्कों का बहता है

Raabia Sultana Nashad

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फ़साना-ए-ग़म-ए-दिल अब नहीं सुने जाते शब-ए-फ़िराक़ में तारे नहीं गिने जाते दिल-ओ-जिगर में है इक दर्द कहकशाँ की तरह ग़लत जगह कभी अफ़्शाँ नहीं चुने जाते लगी है चोट मुसलसल कुछ इस तरह दिल में कि हम से दाग़-ए-जिगर भी नहीं गिने जाते असर हो जिस का वही शे'र शे'र है 'नाशाद' हर एक शे'र पे सर भी नहीं धुने जाते

Raabia Sultana Nashad

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सोज़िश-ए-ग़म का बयाँ लब पे न लाऊँ क्यूँँकर दर्द है हद से सिवा दिल में छुपाऊँ क्यूँँकर तू यहीं दोस्त मिरे ग़म का मुदावा कर दे चोट जो दिल पे लगी है वो दिखाऊँ क्यूँँकर कैसे दोहराऊँ ग़म-ए-ज़ीस्त के अफ़्साने को सुनने वाला न कोई हो तो सुनाऊँ क्यूँँकर रौशनी होती नहीं मेरे सियह-ख़ाने में शम-ए-दिल अब शब-ए-हिज्राँ में जलाऊँ क्यूँँकर सिल्क-ए-अंजुम हैं तिरी याद में आँसू अब तक तेरे दामन को सितारों से सजाऊँ क्यूँँकर जब के तिनके का सहारा भी नहीं है 'नाशाद' अपनी कश्ती को तलातुम से बचाऊँ क्यूँँकर

Raabia Sultana Nashad

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दिल है रंजूर यहाँ है ये दस्तूर यहाँ रहरव आते हैं यहाँ लौटे जाते हैं यहाँ न कोई पास-ए-वफ़ा और न एहसास-ए-वफ़ा करते हैं जौर-ओ-जफ़ा ज़ुल्म है इन को रवा कुछ भरोसा ही नहीं कोई अपना ही नहीं अजनबी बन के रहें हर जफ़ा दिल पे सहें रोज़ बेदाद नई रोज़ उफ़्ताद नई क्या करें हाल बयाँ बेकसी का है समाँ हाल-ए-दिल कुछ न कहें रोज़ बेदाद सहें हर तरफ़ आह-ओ-बुका इक क़यामत है बपा तंग है तेरी ज़मीं कोई किस जा हो मकीं तू सहारा है ख़ुदा बस भरोसा है तिरा हाल है उन का बुरा सुन यतीमों की सदा बेवा माँओं की क़सम सख़्त जानों की क़सम ये शहीदान-ए-वफ़ा जिन का घर-बार जला कभी मुख़्तार ये थे आज मजबूर हुए पाए अब जा के कहाँ दिल-ए-'नाशाद' अमाँ

Raabia Sultana Nashad

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