nazmKuch Alfaaz

दिल है रंजूर यहाँ है ये दस्तूर यहाँ रहरव आते हैं यहाँ लौटे जाते हैं यहाँ न कोई पास-ए-वफ़ा और न एहसास-ए-वफ़ा करते हैं जौर-ओ-जफ़ा ज़ुल्म है इन को रवा कुछ भरोसा ही नहीं कोई अपना ही नहीं अजनबी बन के रहें हर जफ़ा दिल पे सहें रोज़ बेदाद नई रोज़ उफ़्ताद नई क्या करें हाल बयाँ बेकसी का है समाँ हाल-ए-दिल कुछ न कहें रोज़ बेदाद सहें हर तरफ़ आह-ओ-बुका इक क़यामत है बपा तंग है तेरी ज़मीं कोई किस जा हो मकीं तू सहारा है ख़ुदा बस भरोसा है तिरा हाल है उन का बुरा सुन यतीमों की सदा बेवा माँओं की क़सम सख़्त जानों की क़सम ये शहीदान-ए-वफ़ा जिन का घर-बार जला कभी मुख़्तार ये थे आज मजबूर हुए पाए अब जा के कहाँ दिल-ए-'नाशाद' अमाँ

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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"नज़्म" इक बरस और कट गया 'शारिक़' रोज़ साँसों की जंग लड़ते हुए सब को अपने ख़िलाफ़ करते हुए यार को भूलने से डरते हुए और सब से बड़ा कमाल है ये साँसें लेने से दिल नहीं भरता अब भी मरने को जी नहीं करता

Shariq Kaifi

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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!

Raghav Ramkaran

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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"सज़ा" हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम हर बार तुम से मिल के बिछड़ता रहा हूँ मैं तुम कौन हो ये ख़ुद भी नहीं जानती हो तुम मैं कौन हूँ मैं ख़ुद भी नहीं जानता हूँ मैं तुम मुझ को जान कर ही पड़ी हो अज़ाब में और इस तरह ख़ुद अपनी सज़ा बन गया हूँ मैं तुम जिस ज़मीन पर हो मैं उस का ख़ुदा नहीं पस सर-बसर अजी़य्यत व आजा़र ही रहो बेजा़र हो गई हो बहुत ज़िन्दगी से तुम जब बस में कुछ नहीं है तो बेज़ार ही रहो तुम को यहाँ के साया व परतौ से क्या ग़र्ज़ तुम अपने हक़ में बीच की दीवार ही रहो मैं इब्तिदा-ए-इश्क़ से बेमहर ही रहा तुम इन्तिहा-ए-इश्क़ का मेआ'र ही रहो तुम ख़ून थूकती हो ये सुन कर ख़ुशी हुई इस रंग इस अदा में भी पुरकार ही रहो मैं ने ये कब कहा था मोहब्बत में है नजात मैं ने ये कब कहा था वफ़ादार ही रहो अपनी मता-ए-नाज़ लुटा कर मेरे लिए बाज़ार-ए-इल्तिफ़ात में नादार ही रहो जब मैं तुम्हें निशात-ए-मोहब्बत न दे सका ग़म में कभी सुकून रफा़क़त न दे सका जब मेरे सब चराग़-ए-तमन्ना हवा के हैं जब मेरे सारे ख़्वाब किसी बे-वफ़ा के हैं फिर मुझ को चाहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं तन्हा कराहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं

Jaun Elia

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फ़साना-ए-ग़म-ए-दिल अब नहीं सुने जाते शब-ए-फ़िराक़ में तारे नहीं गिने जाते दिल-ओ-जिगर में है इक दर्द कहकशाँ की तरह ग़लत जगह कभी अफ़्शाँ नहीं चुने जाते लगी है चोट मुसलसल कुछ इस तरह दिल में कि हम से दाग़-ए-जिगर भी नहीं गिने जाते असर हो जिस का वही शे'र शे'र है 'नाशाद' हर एक शे'र पे सर भी नहीं धुने जाते

Raabia Sultana Nashad

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फ़ुटपाथ पे इक बेकस इंसाँ तकलीफ़ में तड़पा करता है दुनिया में कोई ग़म-ख़्वार नहीं मजबूर है आहें भरता है बरसात हो या जाड़ा गर्मी हर मौसम एक गुज़रता है एहसास न कपड़ों का तन पर बस भूक के मारे मरता है अम्बार पे कूड़े के जा कर वो पेट का दोज़ख़ भरता है फिर भी तुझ पे जाँ देता है फिर भी तेरा दम भरता है है वक़्फ़-ए-सितम दुनिया में जो जाँ तुझ पे निछावर करता है कुछ बोल मिरे महबूब ख़ुदा क्यूँ उस पे जफ़ाएँ करता है क्या तेरे ख़ज़ाने ख़ाली हैं या तू भी किसी से डरता है जब तेरा कोई क़ानून नहीं करने दे जो इंसाँ करता है जिस वक़्त से देखा है यारब उस वक़्त से ये दिल डरता है जो तुझ पे मरे जो तुझ से डरे तू ज़ुल्म उसी पर करता है आ अर्श से तू भी देख ज़रा क्यूँँकर तिरा बंदा मरता है 'नाशाद' की आँखों से अक्सर तूफ़ाँ अश्कों का बहता है

Raabia Sultana Nashad

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मिरी तस्वीर ले कर क्या करोगे मिरी तस्वीर इक ख़्वाब-ए-परेशाँ छुपे हैं इस में लाखों ग़म के तूफ़ाँ मिरी तस्वीर ले कर क्या करोगे मिरी तस्वीर है मायूस-ओ-मुज़्तर मेरी तस्वीर रंज-ओ-ग़म का पैकर ये इक दिन बार हो जाएगी तुम पर मिरी तस्वीर ले कर क्या करोगे मिरी तस्वीर में कब ज़िंदगी है सरापा ग़म सरापा बेकसी है जबीं रौशन न होंटों पर हँसी है मिरी तस्वीर ले कर क्या करोगे मिरी तस्वीर है कुछ धुँदली धुँदली मिरी तस्वीर है अश्कों से भीगी मिरी तस्वीर है खोई हुई सी मिरी तस्वीर ले कर क्या करोगे न फिर हाथों में यूँँ लोगे तुम उस को न अपने पास रक्खोगे तुम उस को उठा कर फेंक ही दोगे तुम उस को मिरी तस्वीर ले कर क्या करोगे

Raabia Sultana Nashad

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गोशा-ए-दिल में तेरा दर्द छुपाया मैं ने चश्म-ए-तर को भी न ये राज़ बताया मैं ने कौन वो शब है जो बे-अश्क बहाए गुज़री कौन वो ग़म है जो दिल पर न उठाया मैं ने की ज़माने से कभी कोई शिकायत न गिला अपने रिसते हुए ज़ख़्मों को छुपाया मैं ने अब तो दम ज़ब्त की शिद्दत से घटा जाता है इस क़दर दर्द को सीने में दबाया मैं ने हैफ़ बर हाल दिल-ए-ज़ार कि आईना हुआ लाख पर्दे में हर इक राज़ छुपाया मैं ने ज़िंदगी गुज़री है बे-कैफ़ सी यारब फिर भी गरचे हँस हँस के हर इक ग़म को मिटाया मैं ने किस ने ये कश्मकश-ए-शाम-ए-अलम देखी है जब कोई दर्द उठा दिल में दबाया मैं ने कब तक इस तौर से 'नाशाद' गुज़ारूँगी हयात जब ख़ुशी कोई मिली अश्क बहाएा में ने

Raabia Sultana Nashad

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सब ने मुझ से किया है किनारा सिर्फ़ तेरा है यारब सहारा अश्क-ए-ग़म यूँँही बहते रहेंगे या रुकेगा कभी ग़म का धारा मेरी कश्ती है तूफ़ाँ की ज़द में मिल गया बहर-ए-ग़म का किनारा ज़ब्त की भी कोई इंतिहा है मैं कहाँ तक करूँँ ग़म गवारा सू-ए-मंज़िल बढ़ी हूँ मैं यारब तेरी रहमत का ले कर सहारा किस तरह हाल दिल का छुपाऊँ जो हो चेहरे से ग़म आश्कारा हम ज़माने में सब के हैं 'नाशाद' और कोई नहीं है हमारा

Raabia Sultana Nashad

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