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फ़साना-ए-ग़म-ए-दिल अब नहीं सुने जाते शब-ए-फ़िराक़ में तारे नहीं गिने जाते दिल-ओ-जिगर में है इक दर्द कहकशाँ की तरह ग़लत जगह कभी अफ़्शाँ नहीं चुने जाते लगी है चोट मुसलसल कुछ इस तरह दिल में कि हम से दाग़-ए-जिगर भी नहीं गिने जाते असर हो जिस का वही शे'र शे'र है 'नाशाद' हर एक शे'र पे सर भी नहीं धुने जाते

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.

Gulzar

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है

Sahir Ludhianvi

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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फ़ुटपाथ पे इक बेकस इंसाँ तकलीफ़ में तड़पा करता है दुनिया में कोई ग़म-ख़्वार नहीं मजबूर है आहें भरता है बरसात हो या जाड़ा गर्मी हर मौसम एक गुज़रता है एहसास न कपड़ों का तन पर बस भूक के मारे मरता है अम्बार पे कूड़े के जा कर वो पेट का दोज़ख़ भरता है फिर भी तुझ पे जाँ देता है फिर भी तेरा दम भरता है है वक़्फ़-ए-सितम दुनिया में जो जाँ तुझ पे निछावर करता है कुछ बोल मिरे महबूब ख़ुदा क्यूँ उस पे जफ़ाएँ करता है क्या तेरे ख़ज़ाने ख़ाली हैं या तू भी किसी से डरता है जब तेरा कोई क़ानून नहीं करने दे जो इंसाँ करता है जिस वक़्त से देखा है यारब उस वक़्त से ये दिल डरता है जो तुझ पे मरे जो तुझ से डरे तू ज़ुल्म उसी पर करता है आ अर्श से तू भी देख ज़रा क्यूँँकर तिरा बंदा मरता है 'नाशाद' की आँखों से अक्सर तूफ़ाँ अश्कों का बहता है

Raabia Sultana Nashad

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मिरी तस्वीर ले कर क्या करोगे मिरी तस्वीर इक ख़्वाब-ए-परेशाँ छुपे हैं इस में लाखों ग़म के तूफ़ाँ मिरी तस्वीर ले कर क्या करोगे मिरी तस्वीर है मायूस-ओ-मुज़्तर मेरी तस्वीर रंज-ओ-ग़म का पैकर ये इक दिन बार हो जाएगी तुम पर मिरी तस्वीर ले कर क्या करोगे मिरी तस्वीर में कब ज़िंदगी है सरापा ग़म सरापा बेकसी है जबीं रौशन न होंटों पर हँसी है मिरी तस्वीर ले कर क्या करोगे मिरी तस्वीर है कुछ धुँदली धुँदली मिरी तस्वीर है अश्कों से भीगी मिरी तस्वीर है खोई हुई सी मिरी तस्वीर ले कर क्या करोगे न फिर हाथों में यूँँ लोगे तुम उस को न अपने पास रक्खोगे तुम उस को उठा कर फेंक ही दोगे तुम उस को मिरी तस्वीर ले कर क्या करोगे

Raabia Sultana Nashad

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गोशा-ए-दिल में तेरा दर्द छुपाया मैं ने चश्म-ए-तर को भी न ये राज़ बताया मैं ने कौन वो शब है जो बे-अश्क बहाए गुज़री कौन वो ग़म है जो दिल पर न उठाया मैं ने की ज़माने से कभी कोई शिकायत न गिला अपने रिसते हुए ज़ख़्मों को छुपाया मैं ने अब तो दम ज़ब्त की शिद्दत से घटा जाता है इस क़दर दर्द को सीने में दबाया मैं ने हैफ़ बर हाल दिल-ए-ज़ार कि आईना हुआ लाख पर्दे में हर इक राज़ छुपाया मैं ने ज़िंदगी गुज़री है बे-कैफ़ सी यारब फिर भी गरचे हँस हँस के हर इक ग़म को मिटाया मैं ने किस ने ये कश्मकश-ए-शाम-ए-अलम देखी है जब कोई दर्द उठा दिल में दबाया मैं ने कब तक इस तौर से 'नाशाद' गुज़ारूँगी हयात जब ख़ुशी कोई मिली अश्क बहाएा में ने

Raabia Sultana Nashad

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सब ने मुझ से किया है किनारा सिर्फ़ तेरा है यारब सहारा अश्क-ए-ग़म यूँँही बहते रहेंगे या रुकेगा कभी ग़म का धारा मेरी कश्ती है तूफ़ाँ की ज़द में मिल गया बहर-ए-ग़म का किनारा ज़ब्त की भी कोई इंतिहा है मैं कहाँ तक करूँँ ग़म गवारा सू-ए-मंज़िल बढ़ी हूँ मैं यारब तेरी रहमत का ले कर सहारा किस तरह हाल दिल का छुपाऊँ जो हो चेहरे से ग़म आश्कारा हम ज़माने में सब के हैं 'नाशाद' और कोई नहीं है हमारा

Raabia Sultana Nashad

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क्यूँ टीस सी दिल में उठती है क्यूँ दर्द से जी घबराता है पहले तो न था ऐसा आलम अब दिल क्यूँ डूबा जाता है चाहत से किसी की सीखा था ग़म सहना और आँसू पीना लेकिन अब तो हर अश्क-ए-अलम आँखों से टपक ही जाता है आदाब-ए-मोहब्बत की ख़ातिर राहत ग़म को समझे हैं तो फिर क्यूँ दिल से आह निकलती है क्यूँ चक्कर सा आ जाता है दुनिया हम से आ कर सीखे पाबंदी-ए-रस्म-ओ-राह-ए-वफ़ा रूदाद-ए-ख़िज़ाँ दोहराते हैं जब ज़िक्र-ए-बहार आ जाता है ऐ शर्म-ए-मोहब्बत जाग कि अब कुछ देर नहीं रुस्वाई में पिन्हाँ था जो दिल के पर्दे में वो दर्द ज़बाँ तक आता है ऐ काश कोई उस से जा कर ये हाल दिल-ए-बर्बाद कहे बीमार-ए-ग़म-ए-उल्फ़त तेरा है नज़्अ' में दम घबराता है इस तरह तड़पने लगता है रह रह के दिल 'नाशाद' अक्सर जैसे कि बगूला उठता है जैसे कोई तूफ़ाँ आता है

Raabia Sultana Nashad

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