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"बुझ गए नील-गगन" अब कहीं कोई नहीं जल गए सारे फ़रिश्तों के बदन बुझ गए नील-गगन टूटता चाँद बिखरता सूरज कोई नेकी न बदी अब कहीं कोई नहीं आग के शो'ले बढ़े आसमानों का ख़ुदा डर के ज़मीं पर उतरा चार छे गाम चला टूट गया आदमी अपनी ही दीवारों से पत्थर ले कर फिर गुफाओं की तरफ़ लौट गया अब कहीं कोई नहीं

Nida Fazli0 Likes

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में

Muneer Niyazi

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"क़ौमी यक-जेहती" वो तवाइफ़ कई मर्दों को पहचानती है शायद इसी लिए दुनिया को ज़ियादा जानती है उस के कमरे में हर मज़हब के भगवान की एक एक तस्वीर लटकी है ये तस्वीरें लीडरों की तक़रीरों की तरह नुमाइशी नहीं उस का दरवाज़ा रात गए तक हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई हर मज़हब के आदमी के लिए खुला रहता है ख़ुदा जाने उस के कमरे की सी कुशादगी मस्जिद और मंदिर के आँगनों में कब पैदा होगी

Nida Fazli

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और रास्ता चल रहा है पोस्टर में वो जो लड़की हंस रही है नौज़वां तन्हाइयों को डस रही है आ समाँ सिर पर है, पैरों में ज़मीं है कोई लाठी है न बम है क्या ये कम है? दूर बस्ती के किसी कोने में काली दौलतों ने थोड़ी तोड़ा फोड़ी की है चलते फिरते शहर के बस एक ही रस्ते में ग़म है क्या ये कम है? बाअसर लड़कों ने इस नाज़ुक बदन से खेला फिर उस को तोड़ डाला टूटे-फूटे उस बदल का हाल थाने में रक़म है क्या ये कम है? खेल यूँ हर जगह होता है जो होता रहेगा.... जानवर हंसते रहेंगे आदमी रोता रहेगा ज़िंदा लाशें यूँ ही हर अख़बार में जलती रहेंगी सरहदों पर सरहदों की गोलियां चलती रहेंगी ज़िन्दगी में फिर भी सदियों से जिए जाने का दम है क्या ये कम है...?

Nida Fazli

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"पिघलता धुआँ" दूर शादाब पहाड़ी पे बना इक बंगला लाल खपरैलों पे फैली हुई अँगूर की बेलसहन में बिखरे हुए मिट्टी के राजा-रानी मुँह चिढ़ाती हुई बच्चों को कोई दीवानीसब के उजले दरख़्तों की घनी छाँव में पाँव डाले हुए तालाब में कोई लड़की गोरे हाथों में सँभाले हुए तकिए का ग़िलाफ़ अन-कही बातों को धागों में सिए जाती है दिल के जज़्बात का इज़हार किए जाती है गर्म चूल्हे के क़रीं बैठी हुई इक औरत एक पैवंद लगी साड़ी से तन को ढाँपे धुँदली आँखों से मिरी सम्त तके जाती है मुझ को आवाज़ पे आवाज़ दिए जाती है इक सुलगती हुई सिगरेट का बल खाता धुआँ फैलता जाता है हर सम्त मिरे कमरे में

Nida Fazli

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"इतनी पी जाओ" इतनी पी जाओ कि कमरे की सियह ख़ामोशी इस से पहले कि कोई बात करे तेज़ नोकीले सवालात करे इतनी पी जाओ कि दीवारों के बे-रंग निशान इस से पहले कि कोई रूप भरें माँ बहन भाई को तस्वीर करें मुल्क तक़्सीम करें इस से पहले कि उठें दीवारें ख़ून से माँग भरें तलवारें यूँँ गिरो टूट के बिस्तर पे अँधेरा हो जाए जब खुले आँख सवेरा हो जाए इतनी पी जाओ!

Nida Fazli

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"कच्ची दीवारें" मेरी माँ हर दिन अपने बूढे हाथों से इधर उधर से मिट्टी ला कर घर की कच्ची दीवारों के ज़ख़्मों को भरती रहती है तेज़ हवाओं के झोंकों से बेचारी कितना डरती है मेरी माँ कितनी भोली है बरसों की सीली दीवारें छोटे-मोटे पैवंदों से आख़िर कब तक रुक पाएँगी जब कोई बादल गरजेगा हर हर करती ढह जाएँगी

Nida Fazli

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