"क़ौमी यक-जेहती" वो तवाइफ़ कई मर्दों को पहचानती है शायद इसी लिए दुनिया को ज़ियादा जानती है उस के कमरे में हर मज़हब के भगवान की एक एक तस्वीर लटकी है ये तस्वीरें लीडरों की तक़रीरों की तरह नुमाइशी नहीं उस का दरवाज़ा रात गए तक हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई हर मज़हब के आदमी के लिए खुला रहता है ख़ुदा जाने उस के कमरे की सी कुशादगी मस्जिद और मंदिर के आँगनों में कब पैदा होगी
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"सुनो शादी मुबारक हो" सुनो शादी मुबारक हो दुल्हन तो बन चुकी हो अब बता भी दो कि सुनने को वो ख़ुश-ख़बरी मैं आऊँ अब किसी दिन छोड़ जाएगी तेरे बेटे को कोई जब किसी आशिक़ की माँ का दुख समझ पाए तू शायद तब इसे इंसाफ़ कहते हैं इसी से भागते हैं सब इसी को पूजता हूँ मैं इसी से काँपते हैं रब मगर तब तक मुनासिब है तड़प को बोलना करतब सुनो शादी मुबारक हो दुल्हन तो बन चुकी हो अब
Anant Gupta
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मर्द-ए-मोहब्बत उस की डिक्शनरी में मर्द का मतलब "ना-मर्द" लिखा हुआ है ख़ुश-क़िस्मत मर्द और औरतें एक दूसरे के दिल की पसंद होते हैं उस की बद-क़िस्मती की पोशाक पर सब से बड़ा दाग़ यही है के वो कुछ ना-मर्दों के निचले हिस्से को पसंद है! सिवाए एक मर्द के सिवाए एक शख़्स के उसे किसी मर्द के दिल ने नहीं चाहा जिस ने उसे उस लम्हें भी सिर्फ़ देखा जो लम्हा मर्द और ना-मर्द होने का फ़ैसला कर दिया करता है मर्द अपनी मोहब्बत के लिए बे-शुमार नज़्में लिख सकता है मगर एक बार भी अपनी मोहब्बत को गाली नहीं दे सकता भले उस की महबूबा जिस्म-फ़रोश ही क्यूँ ना हो मर्द के लिए देवी होती है अज़ीम लड़कियों और इज़्ज़त मंद मर्दों के दिल सलामत रहें जो धोके की तलवारों से काट दिए गए मगर अपनी मोहब्बत की बे-हुर्मती पर तैयार न हुआ एक मर्द का लहू-लुहान दिल जिसे बद-दुआ की पूरी इजाज़त है वो फिर भी दुआ में यही कहता है मौला उसे उस के नाम का साया नसीब कर वो समझ सके कि मोहब्बत और मर्द की "मीम" एक ही मिट्टी से बनी है मोहब्बत और मर्द के सात हुरूफ़ मिल कर "साथ" बनाते हैं लेकिन उसे ये रम्ज़ कोई मर्द ही बता सकता है उस की डिक्शनरी और ज़िन्दगी में कोई मर्द नहीं है
Ali Zaryoun
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"मुझ सेे पहले" मुझ सेे पहले तुझे जिस शख़्स ने चाहा उस ने शायद अब भी तिरा ग़म दिल से लगा रक्खा हो एक बे-नाम सी उम्मीद पे अब भी शायद अपने ख़्वाबों के जज़ीरों को सजा रक्खा हो मैं ने माना कि वो बेगाना-ए-पैमान-ए-वफ़ा खो चुका है जो किसी और की रा'नाई में शायद अब लौट के आए न तिरी महफ़िल में और कोई दुख न रुलाये तुझे तन्हाई में मैं ने माना कि शब-ओ-रोज़ के हंगामों में वक़्त हर ग़म को भुला देता है रफ़्ता रफ़्ता चाहे उम्मीद की शमएँ हों कि यादों के चराग़ मुस्तक़िल बोद बुझा देता है रफ़्ता रफ़्ता फिर भी माज़ी का ख़याल आता है गाहे-गाहे मुद्दतें दर्द की लौ कम तो नहीं कर सकतीं ज़ख़्म भर जाएँ मगर दाग़ तो रह जाता है दूरियों से कभी यादें तो नहीं मर सकतीं ये भी मुमकिन है कि इक दिन वो पशीमाँ हो कर तेरे पास आए ज़माने से किनारा कर ले तू कि मासूम भी है ज़ूद-फ़रामोश भी है उस की पैमाँ-शिकनी को भी गवारा कर ले और मैं जिस ने तुझे अपना मसीहा समझा एक ज़ख़्म और भी पहले की तरह सह जाऊँ जिस पे पहले भी कई अहद-ए-वफ़ा टूटे हैं इसी दो-राहे पे चुप-चाप खड़ा रह जाऊँ
Ahmad Faraz
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"काग़ज़" क्या लिखते हो काग़ज़ पर काग़ज़ पर एहसास लिखता हूँ काग़ज़ पर जज़्बात लिखता हूँ काग़ज़ पर राज़ लिखता हूँ नज़्म लिखता हूँ काग़ज़ पर अच्छा लिखने वालों ने क्या नहीं लिखा काग़ज़ पर इश्क़ से नफ़रत तक सब लिखा है काग़ज़ पर किसी ने ख़्वाब लिखे हैं काग़ज़ पर किसी ने मुआहिदे लिखे हैं काग़ज़ पर मुल्क बँटे हैं काग़ज़ पर कुछ चित्र बने हैं काग़ज़ पर कहीं मुकद में लिखे हैं काग़ज़ पर किसी के अँगूठे लगे हैं काग़ज़ पर आँसू पड़े हैं काग़ज़ पर शायद कुछ दर्द लिखे काग़ज़ पर किसी ने तक़रीर लिखी है काग़ज़ पर किसी का शे'र लिखा है काग़ज़ पर मैं ने नाम तुम्हारा लिखा है काग़ज़ पर
Hamza ali
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"ताबीरों की लाश" हम ने भी कुछ ख़्वाब बुने थे ख़्वाब हमारे गिने चुने थे ख़्वाबों में कब मैं होता था तुम होते थे ख़्वाबों में जब भी होते थे हम होते थे ख़्वाबों में आँगन देखा था प्यारा सा सावन देखा था ताबीरों पर बात हुई थी देखो किचन की बाईं जानिब शिव जी का मंदिर रखना है मैं ने शायद मना किया था रूठ गई थी झगड़ पड़ी थी ख़ूब लड़ी थी तुम्हें पता है जिस कमरे में मैं रहता हूँ वो कमरा अब भरा पड़ा है ख़्वाब तो ज़ाया' हो जाते हैं ताबीरों की लाश पड़ी है
Anand Raj Singh
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"बुझ गए नील-गगन" अब कहीं कोई नहीं जल गए सारे फ़रिश्तों के बदन बुझ गए नील-गगन टूटता चाँद बिखरता सूरज कोई नेकी न बदी अब कहीं कोई नहीं आग के शो'ले बढ़े आसमानों का ख़ुदा डर के ज़मीं पर उतरा चार छे गाम चला टूट गया आदमी अपनी ही दीवारों से पत्थर ले कर फिर गुफाओं की तरफ़ लौट गया अब कहीं कोई नहीं
Nida Fazli
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"फ़ासला" ये फ़ासला जो तुम्हारे और मेरे दरमियाँ है हर इक ज़माने की दास्ताँ है न इब्तिदा है न इंतिहा है मसाफ़तों का अज़ाब साँसों का दाएरा है न तुम कहीं हो न मैं कहीं हूँ तलाश रंगीन वाहिमा है सफ़र में लम्हों का कारवाँ है ये फ़ासला! जो तुम्हारे और मेरे दरमियाँ है यही तलब है यही जज़ा है यही ख़ुदा है
Nida Fazli
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"कच्ची दीवारें" मेरी माँ हर दिन अपने बूढे हाथों से इधर उधर से मिट्टी ला कर घर की कच्ची दीवारों के ज़ख़्मों को भरती रहती है तेज़ हवाओं के झोंकों से बेचारी कितना डरती है मेरी माँ कितनी भोली है बरसों की सीली दीवारें छोटे-मोटे पैवंदों से आख़िर कब तक रुक पाएँगी जब कोई बादल गरजेगा हर हर करती ढह जाएँगी
Nida Fazli
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"एक कहानी" तुम ने शायद किसी रिसाले में कोई अफ़्साना पढ़ लिया होगा खो गई होगी रूप की रानी इश्क़ ने ज़हर खा लिया होगा तुम अकेली खड़ी हुई होगी सर से आँचल ढलक रहा होगा या पड़ोसन के फूल से रुख़ पर कोई धब्बा चमक रहा होगा काम में होंगे सारे घर वाले रेडियो गुनगुना रहा होगा तुम पे नश्शा सा छा गया होगा मुझ को विश्वाश है कि अब तुम भी शाम को खिड़की खोल देने पर अपनी लड़की को टोकती होगी गीत गाने से रोकती होगी
Nida Fazli
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"पिघलता धुआँ" दूर शादाब पहाड़ी पे बना इक बंगला लाल खपरैलों पे फैली हुई अँगूर की बेलसहन में बिखरे हुए मिट्टी के राजा-रानी मुँह चिढ़ाती हुई बच्चों को कोई दीवानीसब के उजले दरख़्तों की घनी छाँव में पाँव डाले हुए तालाब में कोई लड़की गोरे हाथों में सँभाले हुए तकिए का ग़िलाफ़ अन-कही बातों को धागों में सिए जाती है दिल के जज़्बात का इज़हार किए जाती है गर्म चूल्हे के क़रीं बैठी हुई इक औरत एक पैवंद लगी साड़ी से तन को ढाँपे धुँदली आँखों से मिरी सम्त तके जाती है मुझ को आवाज़ पे आवाज़ दिए जाती है इक सुलगती हुई सिगरेट का बल खाता धुआँ फैलता जाता है हर सम्त मिरे कमरे में
Nida Fazli
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