"काग़ज़" क्या लिखते हो काग़ज़ पर काग़ज़ पर एहसास लिखता हूँ काग़ज़ पर जज़्बात लिखता हूँ काग़ज़ पर राज़ लिखता हूँ नज़्म लिखता हूँ काग़ज़ पर अच्छा लिखने वालों ने क्या नहीं लिखा काग़ज़ पर इश्क़ से नफ़रत तक सब लिखा है काग़ज़ पर किसी ने ख़्वाब लिखे हैं काग़ज़ पर किसी ने मुआहिदे लिखे हैं काग़ज़ पर मुल्क बँटे हैं काग़ज़ पर कुछ चित्र बने हैं काग़ज़ पर कहीं मुकद में लिखे हैं काग़ज़ पर किसी के अँगूठे लगे हैं काग़ज़ पर आँसू पड़े हैं काग़ज़ पर शायद कुछ दर्द लिखे काग़ज़ पर किसी ने तक़रीर लिखी है काग़ज़ पर किसी का शे'र लिखा है काग़ज़ पर मैं ने नाम तुम्हारा लिखा है काग़ज़ पर
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
Muneer Niyazi
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"इंक़लाब" वो सोचता है मैं उस की वहशत लिखूँगा लोगों के दिलों की दहशत लिखूँगा वो झूठे ख़्वाब लिखूँगा लेकिन अब मैं इंक़लाब लिखूँगा अब मैं सैलाब लिखूँगा उबलते ख़ूनों से तक़दीर लिखूँगा उन की असली तस्वीर लिखूँगा उस का हम पर हर एक ज़ुल्म लिखूँगा दिए गए सारे ग़लत हुक्म लिखूँगा रोते बच्चों की चीख लिखूँगा हमें दी गई ग़लत सीख लिखूँगा वो जो हमें दिखाए गए डरावने ख़्वाब लिखूँगा गिरती लाशों का हिसाब लिखूँगा घर में बंद लोगों का डर लिखूँगा बाहर फिरते लोगों का ख़ौफ़ लिखूँगा उन की हर एक चाल लिखूँगा दिलों का अब मैं हाल लिखूँगा लोगों का साथ लिखूँगा वो अँधेरी गहरी रात लिखूँगा ख़ून से रंगे हाथ लिखूँगा मैं सारी बात लिखूँगा वो ख़ून से भरा वो कुआँ लिखूँगा उस यतीम की बद-दुआ लिखूँगा वो ज़वाल लिखूँगा दबते हुए सवाल लिखूँगा हर रोज़ खुदती नई क़ब्र लिखूँगा झूठी फैलती ख़बर लिखूँगा लोगों का टूटा सब्र लिखूँगा लूटते घर लिखूँगा बेवजह कटते सर लिखूँगा ग़ैर होते अपने लिखूँगा उन बच्चों के सपने लिखूँगा ज़ालिम का ज़ोर लिखूँगा हर तरफ़ मचता शोर लिखूँगा ख़ाली मैदान लिखूँगा भरे क़ब्रिस्तान लिखूँगा
Hamza ali
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“मेहँदी” जब उस की मेहँदी का रंग सुर्ख़ नहीं हुआ तो उस ने सोचा मैं ने उसे प्रेम नहीं किया ये भी तो हो सकता है मेहँदी मिलावटी हो या फिर उस ने जल्दी ही मेहँदी धो दी हो परंतु मेरे प्रेम का पैमाना उस मेहँदी ने तय किया और देखा जाए तो सही किया यदि मेरा प्रेम सच्चा है तो मेहँदी को हर हाल में रच जाना चाहिए था मिलावटी होना या जल्दी धो देना तो केवल समाज के वे रीति रिवाज हैं जिन्हें तोड़कर ही प्रेम किया जाता है और मेरा प्रेम इन्हें नहीं लाँघ पाया या'नी मेरा प्रेम सच्चा नहीं था मेहँदी को रच जाना चाहिए था
Hamza ali
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