nazmKuch Alfaaz

रह-ए-इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ जुनूँ सा कोई रहनुमा चाहता हूँ जो इरफ़ान की ज़िंदगी को बढ़ा दे मैं वो बादा-ए-जाँ-फ़ज़ा चाहता हूँ मिटा कर मुझे आई मैं जज़्ब कर ले बक़ा के लिए मैं फ़ना चाहता हूँ बयाँ हाल-ए-दिल मैं करूँँ क्यूँँ ज़बाँ से कोई जानता है मैं क्या चाहता हूँ मुझे क्या ज़रूरत है क्या तुम से माँगूँ मगर मैं तुम्हारा भला चाहता हूँ मिरे चारा-गर मैं हूँ बीमार तेरा तिरे हाथ ही शिफ़ा चाहता हूँ

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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.

Gulzar

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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दौलत ना अता करना मौला, शोहरत ना अता करना मौला बस इतना अता करना चाहे जन्नत ना अता करना मौला शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब कुर्बान पतंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो बस एक सदा ही सुनें सदा बर्फ़ीली मस्त हवाओं में बस एक दुआ ही उठे सदा जलते-तपते सेहराओं में जीते-जी इस का मान रखें मर कर मर्यादा याद रहे हम रहें कभी ना रहें मगर इस की सज-धज आबाद रहे जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो गीता का ज्ञान सुने ना सुनें, इस धरती का यशगान सुनें हम सबद-कीर्तन सुन ना सकें भारत मां का जयगान सुनें परवरदिगार,मैं तेरे द्वार पर ले पुकार ये आया हूँ चाहे अज़ान ना सुनें कान पर जय-जय हिन्दुस्तान सुनें जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो

Kumar Vishwas

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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

Tahir Faraz

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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती

Abrar Kashif

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तिरे जमाल से ऐ आफ़्ताब-ए-नन्काना निखर निखर गया हुस्न-ए-शुऊ'र-ए-रिंदाना कुछ ऐसे रंग से छेड़ा रबाब-ए-मस्ताना कि झूमने लगा रूहानियत का मय-ख़ाना तिरी शराब से मदहोश हो गए मय-ख़्वार दुई मिटा के हम आग़ोश हो गए मय-ख़्वार तिरा पयाम था डूबा हुआ तबस्सुम में भरी थी रूह-ए-लताफ़त तिरे तकल्लुम में नवा-ए-हक़ की कशिश थी तिरे तरन्नुम में यक़ीं की शम्अ'' जलाई शब-ए-तवहहुम में दिलों को हक़ से हम-आहंग कर दिया तू ने गुलों को गूँध के यक-रंग कर दिया तू ने तिरी नवा ने दिया नूर आदमियत को मिटा के रख दिया हिर्स-ओ-हवा की ज़ुल्मत को दिलों से दूर किया सीम-ओ-ज़र की रग़बत को कि पा लिया था तिरे दिल ने हक़ की दौलत को हुजूम-ए-ज़ुल्मत-ए-बातिल में हक़-पनाही की फ़क़ीर हो के भी दुनिया में बादशाही की तिरी निगाह में क़ुरआन-ओ-दीद का आलम तिरा ख़याल था राज़-ए-हयात का महरम हर एक गुल पे टपकती थी प्यार की शबनम कि बस गया था नज़र में बहिश्त का मौसम नफ़स नफ़स में कली रंग-ओ-बू की ढलती थी नसीम थी कि फ़रिश्तों की साँस चलती थी तिरी शराब से बाबा फ़रीद थे सरशार तिरे ख़ुलूस से बे-ख़ुद थे सूफ़ियान-ए-किबार कहाँ कहाँ नहीं पहुँची तिरे क़दम की बहार तिरे अमल ने सँवारे जहान के किरदार तिरी निगाह ने सहबा-ए-आगही दे दी बशर के हाथ में क़िंदील-ए-ज़िंदगी दे दी तिरे पयाम से ऐसी की थी मसीहाई तिरे सुख़न में हबीब-ए-ख़ुदा की रा'नाई तिरे कलाम में गौतम का नूर-ए-दानाई तिरे तराने में मुरली का लहन-ए-यकताई हर एक नूर नज़र आया तेरे पैकर में तमाम निकहतें सिमटी हैं इक गुल-ए-तर में जहाँ जहाँ भी गया तू ने आगही बाँटी अँधेरी रात में चाहत की रौशनी बाँटी अता किया दिल-ए-बेदार ज़िंदगी बाँटी फ़साद-ओ-जंग की दुनिया में शांति बाँटी बहार आई खिली प्यार की कली हर सू तिरे नफ़स से नसीम-ए-सहर चली हर सू रज़ा-ए-हक़ को नजात-ए-बशर कहा तू ने तअ'ईनात-ए-ख़ुदी को ज़रर कहा तू ने वफ़ा-निगर को हक़ीक़त-निगर कहा तू ने ज़ुहूर-ए-इश्क़ को सच्ची सहर कहा तू ने जहान-ए-इश्क़ में कुछ बेश-ओ-कम का फ़र्क़ न था तिरी निगाह में दैर-ओ-हरम का फ़र्क़ न था बताया तू ने कि इरफ़ाँ से आश्ना होना कभी न आशिक़-ए-दुनिया-ए-बे-वफ़ा होना बदी से शाम-ओ-सहर जंग-आज़मा होना ख़ुदा से दूर न ऐ बंदा-ए-ख़ुदा होना नशे में दौलत-ओ-ज़र के न चूर हो जाना क़रीब आए जो दुनिया तो दूर हो जाना जो रूह बन के समा जाए हर रग-ओ-पै में तो फिर न शहद में लज़्ज़त न साग़र-ए-मय में वही है साज़ के पर्दे में लहन में लय में उसी की ज़ात की परछाइयाँ हर इक शय में न मौज है न सितारों की आब है कोई तजल्लियों के इधर आफ़्ताब है कोई अबद का नूर फ़राहम किया सहर के लिए दिया पयाम बहारों का दश्त-ओ-दर के लिए दिए जला दिए तारीक रहगुज़र के लिए जिया बशर के लिए जान दी बशर के लिए दुआ ये है कि रहे इश्क़ हश्र तक तेरा ज़मीं पे आम हो ये दर्द-ए-मुश्तरक तेरा ख़ुदा करे कि ज़माना सुने तिरी आवाज़ हर इक जबीं को मुयस्सर हो तेरा अक्स-ए-नियाज़ जहाँ में आम हो तेरे ही प्यार का अंदाज़ ख़ुलूस-ए-दिल से हो पूजा ख़ुलूस-ए-दिल से नमाज़ तिरे पयाम की बरकत से नेक हो जाएँ ये इम्तियाज़ मिटें लोग एक हो जाएँ

Darshan Singh

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फ़िक्र-ओ-आलाम के बादल में हैं अनवार-ए-हयात रौशनी क्या किसी तनवीर का परतव भी नहीं नौ-ए-इंसाँ की फ़ज़ाओं पे है ज़ुल्मत का जमाव शम-ए-महताब का क्या ज़िक्र कोई लौ भी नहीं ज़ेहन तारीक हैं अज्साम की दुनिया है सियाह है अनासिर की फ़ज़ाओं में तलातुम बरपा अम्न की मौज का मिलता नहीं हल्का सा निशाँ ज़िंदगी में है मक़ासिद का तसादुम बरपा बरतरी पैकर-ओ-अजसाम की है जो कुछ है रूह को क़ाबिल-ए-तज़हीक कहा जाता है क्या ज़माना है कि ज़ुल्मत को समझते हैं नूर नूर को जादा-ए-तारीक कहा जाता है आओ ऐ अहल-ए-ख़िरद अहल-ए-जुनूँ अहल-ए-ज़मीं बज़्म-ए-हस्ती में मोहब्बत से चराग़ाँ कर दें रूह-ए-इरफ़ाँ का अनासिर को सुना कर पैग़ाम आज इंसान को फिर महरम-ए-इंसाँ कर दें

Darshan Singh

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रह गया राह में जब कुछ भी न काँटों के सिवा तीरगी झूट की जब छा गई सच्चाई पर उफ़ुक़-ए-ज़िंदा-ओ-पाइंदा-ए-ननकाना से हँस पड़ी एक किरन वक़्त की तन्हाई पर दिल के सुनसान खंडर में कोई नग़्मा जागा आँख मलती हुई इक सुब्ह बयाबाँ से उठी फ़िक्र आज़ाद हुई ज़ेहन के जाले टूटे और ईक़ान की लौ सीना-ए-इंसाँ से उठी ज़हर में डूब गई थीं जो ज़बानें यकसर उन पे शीरीनी-ए-वहदत के तराने आए जिस्म मरता है मगर रूह कहाँ मरती है रूह इक नूर है और जिस्म थिरकते साए जिस्म काँटों से गुज़रता है गुज़र जाने दो रूह वो फूल है जिस पर न ख़िज़ाँ आएगी रूह पी लेगी जो इर्फ़ान-ओ-मुहब्बत की शराब मस्ती-ओ-कैफ़ हमेशा के लिए पाएगी पीर-ए-नंगाना तिरी रूह-ए-सदाक़त को सलाम जावेदाँ परचम-ए-उल्फ़त तिरा लहराता है

Darshan Singh

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