फ़िक्र-ओ-आलाम के बादल में हैं अनवार-ए-हयात रौशनी क्या किसी तनवीर का परतव भी नहीं नौ-ए-इंसाँ की फ़ज़ाओं पे है ज़ुल्मत का जमाव शम-ए-महताब का क्या ज़िक्र कोई लौ भी नहीं ज़ेहन तारीक हैं अज्साम की दुनिया है सियाह है अनासिर की फ़ज़ाओं में तलातुम बरपा अम्न की मौज का मिलता नहीं हल्का सा निशाँ ज़िंदगी में है मक़ासिद का तसादुम बरपा बरतरी पैकर-ओ-अजसाम की है जो कुछ है रूह को क़ाबिल-ए-तज़हीक कहा जाता है क्या ज़माना है कि ज़ुल्मत को समझते हैं नूर नूर को जादा-ए-तारीक कहा जाता है आओ ऐ अहल-ए-ख़िरद अहल-ए-जुनूँ अहल-ए-ज़मीं बज़्म-ए-हस्ती में मोहब्बत से चराग़ाँ कर दें रूह-ए-इरफ़ाँ का अनासिर को सुना कर पैग़ाम आज इंसान को फिर महरम-ए-इंसाँ कर दें
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
Muneer Niyazi
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रह-ए-इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ जुनूँ सा कोई रहनुमा चाहता हूँ जो इरफ़ान की ज़िंदगी को बढ़ा दे मैं वो बादा-ए-जाँ-फ़ज़ा चाहता हूँ मिटा कर मुझे आई मैं जज़्ब कर ले बक़ा के लिए मैं फ़ना चाहता हूँ बयाँ हाल-ए-दिल मैं करूँँ क्यूँँ ज़बाँ से कोई जानता है मैं क्या चाहता हूँ मुझे क्या ज़रूरत है क्या तुम से माँगूँ मगर मैं तुम्हारा भला चाहता हूँ मिरे चारा-गर मैं हूँ बीमार तेरा तिरे हाथ ही शिफ़ा चाहता हूँ
Darshan Singh
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तिरे जमाल से ऐ आफ़्ताब-ए-नन्काना निखर निखर गया हुस्न-ए-शुऊ'र-ए-रिंदाना कुछ ऐसे रंग से छेड़ा रबाब-ए-मस्ताना कि झूमने लगा रूहानियत का मय-ख़ाना तिरी शराब से मदहोश हो गए मय-ख़्वार दुई मिटा के हम आग़ोश हो गए मय-ख़्वार तिरा पयाम था डूबा हुआ तबस्सुम में भरी थी रूह-ए-लताफ़त तिरे तकल्लुम में नवा-ए-हक़ की कशिश थी तिरे तरन्नुम में यक़ीं की शम्अ'' जलाई शब-ए-तवहहुम में दिलों को हक़ से हम-आहंग कर दिया तू ने गुलों को गूँध के यक-रंग कर दिया तू ने तिरी नवा ने दिया नूर आदमियत को मिटा के रख दिया हिर्स-ओ-हवा की ज़ुल्मत को दिलों से दूर किया सीम-ओ-ज़र की रग़बत को कि पा लिया था तिरे दिल ने हक़ की दौलत को हुजूम-ए-ज़ुल्मत-ए-बातिल में हक़-पनाही की फ़क़ीर हो के भी दुनिया में बादशाही की तिरी निगाह में क़ुरआन-ओ-दीद का आलम तिरा ख़याल था राज़-ए-हयात का महरम हर एक गुल पे टपकती थी प्यार की शबनम कि बस गया था नज़र में बहिश्त का मौसम नफ़स नफ़स में कली रंग-ओ-बू की ढलती थी नसीम थी कि फ़रिश्तों की साँस चलती थी तिरी शराब से बाबा फ़रीद थे सरशार तिरे ख़ुलूस से बे-ख़ुद थे सूफ़ियान-ए-किबार कहाँ कहाँ नहीं पहुँची तिरे क़दम की बहार तिरे अमल ने सँवारे जहान के किरदार तिरी निगाह ने सहबा-ए-आगही दे दी बशर के हाथ में क़िंदील-ए-ज़िंदगी दे दी तिरे पयाम से ऐसी की थी मसीहाई तिरे सुख़न में हबीब-ए-ख़ुदा की रा'नाई तिरे कलाम में गौतम का नूर-ए-दानाई तिरे तराने में मुरली का लहन-ए-यकताई हर एक नूर नज़र आया तेरे पैकर में तमाम निकहतें सिमटी हैं इक गुल-ए-तर में जहाँ जहाँ भी गया तू ने आगही बाँटी अँधेरी रात में चाहत की रौशनी बाँटी अता किया दिल-ए-बेदार ज़िंदगी बाँटी फ़साद-ओ-जंग की दुनिया में शांति बाँटी बहार आई खिली प्यार की कली हर सू तिरे नफ़स से नसीम-ए-सहर चली हर सू रज़ा-ए-हक़ को नजात-ए-बशर कहा तू ने तअ'ईनात-ए-ख़ुदी को ज़रर कहा तू ने वफ़ा-निगर को हक़ीक़त-निगर कहा तू ने ज़ुहूर-ए-इश्क़ को सच्ची सहर कहा तू ने जहान-ए-इश्क़ में कुछ बेश-ओ-कम का फ़र्क़ न था तिरी निगाह में दैर-ओ-हरम का फ़र्क़ न था बताया तू ने कि इरफ़ाँ से आश्ना होना कभी न आशिक़-ए-दुनिया-ए-बे-वफ़ा होना बदी से शाम-ओ-सहर जंग-आज़मा होना ख़ुदा से दूर न ऐ बंदा-ए-ख़ुदा होना नशे में दौलत-ओ-ज़र के न चूर हो जाना क़रीब आए जो दुनिया तो दूर हो जाना जो रूह बन के समा जाए हर रग-ओ-पै में तो फिर न शहद में लज़्ज़त न साग़र-ए-मय में वही है साज़ के पर्दे में लहन में लय में उसी की ज़ात की परछाइयाँ हर इक शय में न मौज है न सितारों की आब है कोई तजल्लियों के इधर आफ़्ताब है कोई अबद का नूर फ़राहम किया सहर के लिए दिया पयाम बहारों का दश्त-ओ-दर के लिए दिए जला दिए तारीक रहगुज़र के लिए जिया बशर के लिए जान दी बशर के लिए दुआ ये है कि रहे इश्क़ हश्र तक तेरा ज़मीं पे आम हो ये दर्द-ए-मुश्तरक तेरा ख़ुदा करे कि ज़माना सुने तिरी आवाज़ हर इक जबीं को मुयस्सर हो तेरा अक्स-ए-नियाज़ जहाँ में आम हो तेरे ही प्यार का अंदाज़ ख़ुलूस-ए-दिल से हो पूजा ख़ुलूस-ए-दिल से नमाज़ तिरे पयाम की बरकत से नेक हो जाएँ ये इम्तियाज़ मिटें लोग एक हो जाएँ
Darshan Singh
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रह गया राह में जब कुछ भी न काँटों के सिवा तीरगी झूट की जब छा गई सच्चाई पर उफ़ुक़-ए-ज़िंदा-ओ-पाइंदा-ए-ननकाना से हँस पड़ी एक किरन वक़्त की तन्हाई पर दिल के सुनसान खंडर में कोई नग़्मा जागा आँख मलती हुई इक सुब्ह बयाबाँ से उठी फ़िक्र आज़ाद हुई ज़ेहन के जाले टूटे और ईक़ान की लौ सीना-ए-इंसाँ से उठी ज़हर में डूब गई थीं जो ज़बानें यकसर उन पे शीरीनी-ए-वहदत के तराने आए जिस्म मरता है मगर रूह कहाँ मरती है रूह इक नूर है और जिस्म थिरकते साए जिस्म काँटों से गुज़रता है गुज़र जाने दो रूह वो फूल है जिस पर न ख़िज़ाँ आएगी रूह पी लेगी जो इर्फ़ान-ओ-मुहब्बत की शराब मस्ती-ओ-कैफ़ हमेशा के लिए पाएगी पीर-ए-नंगाना तिरी रूह-ए-सदाक़त को सलाम जावेदाँ परचम-ए-उल्फ़त तिरा लहराता है
Darshan Singh
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