तिरे जमाल से ऐ आफ़्ताब-ए-नन्काना निखर निखर गया हुस्न-ए-शुऊ'र-ए-रिंदाना कुछ ऐसे रंग से छेड़ा रबाब-ए-मस्ताना कि झूमने लगा रूहानियत का मय-ख़ाना तिरी शराब से मदहोश हो गए मय-ख़्वार दुई मिटा के हम आग़ोश हो गए मय-ख़्वार तिरा पयाम था डूबा हुआ तबस्सुम में भरी थी रूह-ए-लताफ़त तिरे तकल्लुम में नवा-ए-हक़ की कशिश थी तिरे तरन्नुम में यक़ीं की शम्अ'' जलाई शब-ए-तवहहुम में दिलों को हक़ से हम-आहंग कर दिया तू ने गुलों को गूँध के यक-रंग कर दिया तू ने तिरी नवा ने दिया नूर आदमियत को मिटा के रख दिया हिर्स-ओ-हवा की ज़ुल्मत को दिलों से दूर किया सीम-ओ-ज़र की रग़बत को कि पा लिया था तिरे दिल ने हक़ की दौलत को हुजूम-ए-ज़ुल्मत-ए-बातिल में हक़-पनाही की फ़क़ीर हो के भी दुनिया में बादशाही की तिरी निगाह में क़ुरआन-ओ-दीद का आलम तिरा ख़याल था राज़-ए-हयात का महरम हर एक गुल पे टपकती थी प्यार की शबनम कि बस गया था नज़र में बहिश्त का मौसम नफ़स नफ़स में कली रंग-ओ-बू की ढलती थी नसीम थी कि फ़रिश्तों की साँस चलती थी तिरी शराब से बाबा फ़रीद थे सरशार तिरे ख़ुलूस से बे-ख़ुद थे सूफ़ियान-ए-किबार कहाँ कहाँ नहीं पहुँची तिरे क़दम की बहार तिरे अमल ने सँवारे जहान के किरदार तिरी निगाह ने सहबा-ए-आगही दे दी बशर के हाथ में क़िंदील-ए-ज़िंदगी दे दी तिरे पयाम से ऐसी की थी मसीहाई तिरे सुख़न में हबीब-ए-ख़ुदा की रा'नाई तिरे कलाम में गौतम का नूर-ए-दानाई तिरे तराने में मुरली का लहन-ए-यकताई हर एक नूर नज़र आया तेरे पैकर में तमाम निकहतें सिमटी हैं इक गुल-ए-तर में जहाँ जहाँ भी गया तू ने आगही बाँटी अँधेरी रात में चाहत की रौशनी बाँटी अता किया दिल-ए-बेदार ज़िंदगी बाँटी फ़साद-ओ-जंग की दुनिया में शांति बाँटी बहार आई खिली प्यार की कली हर सू तिरे नफ़स से नसीम-ए-सहर चली हर सू रज़ा-ए-हक़ को नजात-ए-बशर कहा तू ने तअ'ईनात-ए-ख़ुदी को ज़रर कहा तू ने वफ़ा-निगर को हक़ीक़त-निगर कहा तू ने ज़ुहूर-ए-इश्क़ को सच्ची सहर कहा तू ने जहान-ए-इश्क़ में कुछ बेश-ओ-कम का फ़र्क़ न था तिरी निगाह में दैर-ओ-हरम का फ़र्क़ न था बताया तू ने कि इरफ़ाँ से आश्ना होना कभी न आशिक़-ए-दुनिया-ए-बे-वफ़ा होना बदी से शाम-ओ-सहर जंग-आज़मा होना ख़ुदा से दूर न ऐ बंदा-ए-ख़ुदा होना नशे में दौलत-ओ-ज़र के न चूर हो जाना क़रीब आए जो दुनिया तो दूर हो जाना जो रूह बन के समा जाए हर रग-ओ-पै में तो फिर न शहद में लज़्ज़त न साग़र-ए-मय में वही है साज़ के पर्दे में लहन में लय में उसी की ज़ात की परछाइयाँ हर इक शय में न मौज है न सितारों की आब है कोई तजल्लियों के इधर आफ़्ताब है कोई अबद का नूर फ़राहम किया सहर के लिए दिया पयाम बहारों का दश्त-ओ-दर के लिए दिए जला दिए तारीक रहगुज़र के लिए जिया बशर के लिए जान दी बशर के लिए दुआ ये है कि रहे इश्क़ हश्र तक तेरा ज़मीं पे आम हो ये दर्द-ए-मुश्तरक तेरा ख़ुदा करे कि ज़माना सुने तिरी आवाज़ हर इक जबीं को मुयस्सर हो तेरा अक्स-ए-नियाज़ जहाँ में आम हो तेरे ही प्यार का अंदाज़ ख़ुलूस-ए-दिल से हो पूजा ख़ुलूस-ए-दिल से नमाज़ तिरे पयाम की बरकत से नेक हो जाएँ ये इम्तियाज़ मिटें लोग एक हो जाएँ
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"सौदाई" अजब दिल है न जीता है न मरता है न सीने में ठहरता है न बाहर ही निकलता है अजब जाँ है तरसती है कि तू आए झिझकती है कि तू आए तो ना-मालूम क्या होगा परेशाँ है कि दुनिया क्या कहेगी पशेमाँ है कि अपने बा-हमी रिश्ते में वो दम है न वो ख़म है मगर फिर भी बिलखती है कि तन्हाई ने ऐसा मार रक्खा है न तू आई तो मेरा क्या बनेगा अजब तू है न अपनों में न ग़ैरों में न ग़म-अंदोज़ ख़ल्वत में न जाँ-अफ़रोज़ जल्वत में मुझे डर है कि तुझ सेे मेल होगा तो कहाँ होगा किसी सर-सब्ज़ वादी में के इस वीरान कुटिया में इसी दुनिया में या फिर सरहदों के पार उक़्बा में अजब मैं हूँ मुफ़क्किर भी मुहक़्क़िक़ भी मुसन्निफ़ भी मगर अफ़सोस आशिक़ भी गया-गुज़रा सा शाइ'र भी बईद-अज़-अक़्ल भी और रस्म-ए-दुनिया से भी बे-गाना जो अनजाने में तुझ सेे ढेर सारा प्यार कर बैठा ब-हर-सूरत अगर कुछ वाक़िया है तो फ़क़त ये है मिरा दिल तुझ पे शैदा है मिरी जाँ तुझ पे वारी है मगर फिर भी ये हसरत है कि कोई मरहम-ए-दिल दिल को समझाए कोई गिरवीदा-ए-जाँ जाँ को बतलाए कि तू इक पैकर-ए-दिलकश नहीं है एक नागन है जो अपनों ही को डसने के लिए बेताब रहती है ये सब कुछ जान कर भी मैं तिरे इन गेसुओं के पेच-ओ-ख़म का सिर-फिरा क़ैदी तड़पता रहता हूँ मैं इस लिए शायद के तू आए तू आ कर मुझ को पहले की तरह दोबारा डस जाए
Dharmesh bashar
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ऐ उदास लड़की जहाॅं से रूठी हुई ऐ उदास लड़की तुझे ख़बर नहीं तिरा हुस्न ओ जमाल ढल रहा है कई बरस से बदन पे वही दरीदा लिबास तेरा ये चेहरा मगर पैरहन बदल रहा है निगाह से नज़र आता है मुंतज़िर है तू लबों पे वज़्न-ए-गोहर गर्द-ए-राह ख़्यालों पर अगर कभी कोई जो गुफ़्तगू करे तुम सेे तो होगी इब्तिदा और इंतिहा सवालों पर तेरे मिज़ाज में ये ख़ामोशी न थी पहले मैं जानता हूँ कि इस का तवील सिलसिला है तमाशबीन कोई भी क़यास कर लेगा ये कम सुख़न किसी ग़म में ज़रूर मुब्तिला है उमीद-ए-यार में बुझती हुई ये चश्म-ए-तर इसी गुमान में तू कब तलक जलाएगी भुला के दहर तू जिन साअ'तों में खोई है न कट सकेंगी मगर उम्र बीत जाएगी सराब-ए-नक़्श इस उम्मीद के मिटा दो तुम मैं शहर-ए-ख़्वाब के ख़ाकों में रंग भर दूँगा मैं जानता हूँ कि मुश्किल है पर तू मेरी तरफ़ क़दम बढ़ा मैं तुम्हें फिर हसीन कर दूँगा
Naaz ishq
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“आदत” कभी जब सोचता हूँ क्या करूँँगा बिन तिरे मुझे अफ़्सुर्दगी महसूस होती है बहुत कि तुझ से पेश्तर तो बस सियह थी ज़िंदगी तिरी आमद ने मानो रंग इस में भर दिए कि अब हर बात को जज़्बात को हालात को मिरी हर फ़िक्र को हर दर्द को हर रंज को मिरी इस बे-बसी या बे-कली या तैश को मिरे हर ग़म को और उन से मिली हर आह को मिरे हर ज़ख़्म और उन से मिले हर दाग़ को मिरी इस ज़िंदगी में पड़ रही उफ़ताद को समझने के लिए तू है मुयस्सर आज तो मगर कल का नहीं मालूम मुझ को क्या करूँँ अगर तू कल नहीं होगा ख़ुदा-ना-ख़्वास्ता ये सब फिर कौन समझेगा मुझे बतला ज़रा ख़याल आता है ये जब भी मुझे तो यूँँ लगे कि गोया चीर ही देगा ये अब सीना मिरा भला कैसे जि यूँँगा बिन तिरे ये ज़िंदगी तू वो आदत है जो मैं छोड़ सकता ही नहीं
Zaan Farzaan
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"तुम्हारा ख़याल" भोर में सूरज की हल्की रौशनी से जब नदी का जल चमक जाता है तुम्हारा अक्स मुझे नज़र आता है निशा में; महताब की चाँदनी तले टिमटिमाते तारों को देखता हूँ तुम्हारा चेहरा निखर आता है हल्की बारिश के बा'द मिट्टी से आने वाली गंध सी हो तुम किसी पवित्र ग्रंथ सी हो तुम लापता हूँ मैं ख़ुद ही में मुझ में बसी हो तुम रूह की रूहानियत हो आँखों की नमी हो तुम तुम्हारी आवाज़ कोयल की मीठी बोली सी लगती हँ तुम हो तो मैं हूँ तुम्हीं से मेरी साँसे चलती हैं पंछियों की चहचहाहट से तुम्हारा मुस्कुराना याद आता है जब भी इबादत करे 'प्रीत' तुम्हारा ज़िक्र हो ही जाता है
Prit
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"बाबा" तेरे कमरे से जो आती थी हमेशा बाबा वो आवाज़ पुकारती नहीं मुझ को बाबा तेरे काँधों पर बैठ कर जो देखे थे कभी वो मेले लगते हैं अब सूने विरान बाबा ये ज़माने की निगाहें सौदागर है वहशी है ये नोच खाएगी जिस्मों को हमारे बाबा तू घर में हमारे माली-ए-गुलशन था हम तो तेरे आँगन की कली थे बाबा तेरे काँधों पर आख़िरी वक़्त रोना था हमें तेरे साए में इस घर से विदा होना था बाबा तेरी ही निशानी है तुझ सा दिखता भी है भाई भी कब बेटियों सा समझता है बाबा तू जो गया माँ के चेहरे की रंगत भी ले गया वो भी उदास है बहुत कम बोलती है बाबा दिल से अब बस यही दुआ निकलती है हमें तुम मुस्कुराते मिलो जन्नत में बाबा
ALI ZUHRI
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फ़िक्र-ओ-आलाम के बादल में हैं अनवार-ए-हयात रौशनी क्या किसी तनवीर का परतव भी नहीं नौ-ए-इंसाँ की फ़ज़ाओं पे है ज़ुल्मत का जमाव शम-ए-महताब का क्या ज़िक्र कोई लौ भी नहीं ज़ेहन तारीक हैं अज्साम की दुनिया है सियाह है अनासिर की फ़ज़ाओं में तलातुम बरपा अम्न की मौज का मिलता नहीं हल्का सा निशाँ ज़िंदगी में है मक़ासिद का तसादुम बरपा बरतरी पैकर-ओ-अजसाम की है जो कुछ है रूह को क़ाबिल-ए-तज़हीक कहा जाता है क्या ज़माना है कि ज़ुल्मत को समझते हैं नूर नूर को जादा-ए-तारीक कहा जाता है आओ ऐ अहल-ए-ख़िरद अहल-ए-जुनूँ अहल-ए-ज़मीं बज़्म-ए-हस्ती में मोहब्बत से चराग़ाँ कर दें रूह-ए-इरफ़ाँ का अनासिर को सुना कर पैग़ाम आज इंसान को फिर महरम-ए-इंसाँ कर दें
Darshan Singh
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रह-ए-इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ जुनूँ सा कोई रहनुमा चाहता हूँ जो इरफ़ान की ज़िंदगी को बढ़ा दे मैं वो बादा-ए-जाँ-फ़ज़ा चाहता हूँ मिटा कर मुझे आई मैं जज़्ब कर ले बक़ा के लिए मैं फ़ना चाहता हूँ बयाँ हाल-ए-दिल मैं करूँँ क्यूँँ ज़बाँ से कोई जानता है मैं क्या चाहता हूँ मुझे क्या ज़रूरत है क्या तुम से माँगूँ मगर मैं तुम्हारा भला चाहता हूँ मिरे चारा-गर मैं हूँ बीमार तेरा तिरे हाथ ही शिफ़ा चाहता हूँ
Darshan Singh
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रह गया राह में जब कुछ भी न काँटों के सिवा तीरगी झूट की जब छा गई सच्चाई पर उफ़ुक़-ए-ज़िंदा-ओ-पाइंदा-ए-ननकाना से हँस पड़ी एक किरन वक़्त की तन्हाई पर दिल के सुनसान खंडर में कोई नग़्मा जागा आँख मलती हुई इक सुब्ह बयाबाँ से उठी फ़िक्र आज़ाद हुई ज़ेहन के जाले टूटे और ईक़ान की लौ सीना-ए-इंसाँ से उठी ज़हर में डूब गई थीं जो ज़बानें यकसर उन पे शीरीनी-ए-वहदत के तराने आए जिस्म मरता है मगर रूह कहाँ मरती है रूह इक नूर है और जिस्म थिरकते साए जिस्म काँटों से गुज़रता है गुज़र जाने दो रूह वो फूल है जिस पर न ख़िज़ाँ आएगी रूह पी लेगी जो इर्फ़ान-ओ-मुहब्बत की शराब मस्ती-ओ-कैफ़ हमेशा के लिए पाएगी पीर-ए-नंगाना तिरी रूह-ए-सदाक़त को सलाम जावेदाँ परचम-ए-उल्फ़त तिरा लहराता है
Darshan Singh
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