ऐ उदास लड़की जहाॅं से रूठी हुई ऐ उदास लड़की तुझे ख़बर नहीं तिरा हुस्न ओ जमाल ढल रहा है कई बरस से बदन पे वही दरीदा लिबास तेरा ये चेहरा मगर पैरहन बदल रहा है निगाह से नज़र आता है मुंतज़िर है तू लबों पे वज़्न-ए-गोहर गर्द-ए-राह ख़्यालों पर अगर कभी कोई जो गुफ़्तगू करे तुम सेे तो होगी इब्तिदा और इंतिहा सवालों पर तेरे मिज़ाज में ये ख़ामोशी न थी पहले मैं जानता हूँ कि इस का तवील सिलसिला है तमाशबीन कोई भी क़यास कर लेगा ये कम सुख़न किसी ग़म में ज़रूर मुब्तिला है उमीद-ए-यार में बुझती हुई ये चश्म-ए-तर इसी गुमान में तू कब तलक जलाएगी भुला के दहर तू जिन साअ'तों में खोई है न कट सकेंगी मगर उम्र बीत जाएगी सराब-ए-नक़्श इस उम्मीद के मिटा दो तुम मैं शहर-ए-ख़्वाब के ख़ाकों में रंग भर दूँगा मैं जानता हूँ कि मुश्किल है पर तू मेरी तरफ़ क़दम बढ़ा मैं तुम्हें फिर हसीन कर दूँगा
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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"इबहाम" ये कौन से नगर आया हूँ मैं कि ख़्वाब यहाँ क़फ़स में हैं कि समेटे हुए हैं इल्म नहीं तसव्वुरात किसी सानिहे की डोरी से उलझ गए कि लपेटे हुए हैं इल्म नहीं निगाह हो कि ज़बाँ हो कि शहर-ए-दिल कि यहाँ हर एक शहर से पेचीदगी ज़ियादा है बॅंधे हुए हैं ख़याल इतने और गहरा सुकूत हर इक ख़याल ज़बाँ से परे निहादा है ये कैसे होंठ कि जो जुम्बिशें नहीं करते ये किस तरह की नज़र जिस में तीरगी है फ़क़त ये चाहते हैं सदाऍं सभी रसन बस्ता ये कान हैं कि जिन्हें रास ख़ामुशी है फ़क़त मैं थक के बैठ गया तो लगा कि दूर कहीं दबी हुई सी सदाएँ पुकारती हैं मुझे क़दम बढ़ाए तो कुछ ख़्वाहिशें दिखी और मैं जिन्हें जिन्हें हूँ मुयस्सर निहारती हैं मुझे शदीद ख़्वाब जो अल्हड़पने में देखे थे मुझे वो आज बड़ी हसरतों से तकते हैं बची हुई वफ़ा और अधमरी उमीद के साथ तमाम शौक़ बड़ी नफ़रतों से तकते हैं मैं इस के बा'द उतर आया और गहरा जहाँ फ़क़त थी याद-ए-गुज़िशता ख़याल-ए-मुस्तक़बिल मैं सेहन कर न सकूॅंगा अब और कुछ कि मुझे यहाँ से ले चलो और छोड़ आओ शहर-ए-दिल हर एक रोज़ वही रट वही सवाल कि 'नाज़' तू जानता है यहाँ हिजरतें नहीं होती ये खेल ज़ेहन में चलता है अहद-ए-फ़ुर्सत में तो ले चलो कि जहाँ फु़र्सतें नहीं होती
Naaz ishq
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"मुहासबा" दोबारा क्यूँँ फिर अब तुम लौट आए हो ग़मों का सिलसिला भी साथ लाए हो मशक़्क़त की बहुत तुम को भुलाने में क़सर छोड़ी न तुम ने याद आने में ख़ला ओ बे-कली तो आम थी पहले तुम्हारी दीद ना-उम्मीद थी जैसे समेटे और फेंके फिर अकेले ने हमारे वादों के टूटे हुए टुकड़े उठाते वक़्त मुझ को कुछ चुभे भी हैं इन्हीं ज़ख़्मों से हर शब खेलता था मैं ख़ुदा कोई करिश्मा कर गया मोहसिन इन्हें भी वक़्त आख़िर भर गया मोहसिन कोई भी रात दिन हाइल नहीं आती तुम्हारी याद अब बिल्कुल नहीं आती हमारे भी ख़ुशी से दिन निकलते हैं तुम्हारे भी ख़ुशी से दिन निकलते हैं तुम इन ज़ख़्मों को फिर से मत कुरेदो अब पुरानी बातों को फिर से न छेड़ो अब दोबारा फिर मेरा तुम दिल दुखाओगे मुझे तुम इस दफ़ा भी छोड़ जाओगे सो तज्दीद-ए-मरासिम क्यूँँ किया जाए शिफ़ा ज़ख़्मों को आख़िर क्यूँँ छुआ जाए कि अब मुझ में न हिम्मत है न ताकत है तुम्हारी अब न आदत है न चाहत है
Naaz ishq
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"मैं ने उस सेे सीखा है" एक ज़माना ऐसा था मैं रूठा रूठा रहता था अब तो लहजा मीठा है मैं ग़ुस्सा ग़ुस्सा रहता था एक घुटन सी रहती थी जज़्बात नहीं बहते थे जिन आँखों में अब नूर है इन में दरिया बहता था यक़ीं न होता था मुझ को और किसी की बातों पर लोगों से तो अब मिलता हूँ तन्हा तन्हा रहता था दिल के सारे दरवाज़े मैं ने अंदर से बंद किए थे एक दरीचा मगर खुला रह गया था मुझ से और उसी से वो अंदर आया और उस ने ला-इल्मी ही सब के सब दरवाज़े खोल दिए तुम हॅंसते मुस्कुराते रहना दिल की बातें खुल के कहना मैं जो कोई रोज़ चली भी जाऊॅं अपने आप से मिलते रहना और उस ने ये जाते वक़्त कहा था कि नाज़ ज़िंदगी खुल के जीना तुम में और मुझ में बस फ़र्क इतना है तुम को शायद आता था मैं ने उस सेे सीखा है
Naaz ishq
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"फ़ैज़" मुझे तुम छोड़ कर फिर से न जाना दोबारा मैं तुम्हें अपना रहा हूँ पुरानी मैं सभी बातें भुला दूँगा तुम्हें सब याद है या फिर नहीं है क्या पता लेकिन मुझे सब याद है मैं ने यही सब कुछ कहा था मगर तुम ने किया क्या जो तुम्हें करना था तुम उस बरसात के जैसी हो हमेशा जो ग़लत मिक़दार में होती है कभी ज़्यादा कभी कम और बे-मौसम फ़क़त मिट्टी भिगोने के लिए न जाने अब मुझे क्या हो गया है फ़ज़ाओ में कहानी सी नज़र आती है अब हर इक वो चीज़ जो मैं देखता हूँ हमारी ही कहानी लगती है सब , वो नदी देखो तुम्हें लगता नहीं मैं वो नदी हूँ और वो बादल तुम नदी सूखी हुई बादल भरे नदी है मुंतज़िर बरसात की मगर बादल गुज़र जाएगे दोबारा लौट कर आएगे मगर फिर से वही होगा यही होता है मेरे साथ भी हर बार भॅंवर हूँ मैं किनारे तुम ख़ला हूँ मैं नज़ारे तुम मैं हूँ पतझड़ बहारें तुम तुम्हारा मैं हमारे तुम नहीं ऐसा नहीं है अलग है हम बहुत तुम्हें मैं बे सबब ही याद करता रहता हूँ तुम्हारे पास जब कोई नहीं होता वहॉं मैं नफ़ा हो तुम ख़सारा मैं तुम्हीं हो चाँद तारा मैं मोहब्बत और कोई है गुज़ारा मैं दोबारा पास आओगी तुम सहेगा कौन दोबारा मैं सदाए दूँगा तुम को मैं पुकारूॅंगा मगर मेरी ये इल्तिज़ा है तुम सेे मत आना लौट कर
Naaz ishq
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"तशवीश" मुझ को ये डर है कि शायद ये सब कुछ सच हो जाएगा आज का दिन निकला है जैसे यूँँॅं कल का भी निकल जाएगा फिर धीरे-धीरे क्या होगा मेरी सालों की मेहनत पर ये क़िस्मत पानी फेरेगी मैं अल्हड़-पन से निकलूॅंगा और ज़िम्मेदारी घेरेगी कॉलेज ख़त्म हो जाएगा फिर नौकरी करूँॅंगा मैं और दस पंद्रह हज़ार के ख़ातिर दिन और रात मरूॅंगा मैं दिन दफ़्तर में जाएगा और रात ख़यालों में जाएगी फिर इस सोच में दिन निकलेंगे अपनी बारी आएगी मगर नहीं आएगी इक इतवार ज़रूर आएगा छह दिन बा'द कहीं जा कर के एक महीने की तनख़्वाह इक हफ़्ते में ख़त्म फिर दूर-दूर तक नहीं दिखेंगे नाज़ ग़ज़ल और नज़्म शौक़ दबाता जाऊॅंगा फ़र्ज़ निभाता जाऊॅंगा फिर धीरे-धीरे क्या होगा शादी की बातें होंगी दिन दफ़्तर में जाएगा साथ किसी के रातें होंगी जो शाख-ए-उम्मीद पकड़ के बैठा हूँ ये भी इक दिन जल जाएगी फिर धीरे-धीरे क्या होगा नाज़ जवानी ढल जाएगी मुझ को कुछ करना था मुझ को कुछ बनना था मगर नहीं कर पाया मैं बाक़ी सब तो कर लेंगे कुछ अपना ही रह जाएगा ये दुनिया घूमने का सपना सपना ही रह जाएगा फिर हर रोज़ पशेमाँ हो के मैं बीती बातें सोचूॅंगा और ख़ुद को कोसूॅंगा ये भी किया जा सकता था वो भी किया जा सकता था यूँँॅं ज़िन्दगी गुज़ार दी है खुल के जिया जा सकता था और फिर अपनी नज़्म पढूॅंगा उम्र निकलती जाएगी मौत का ख़ौफ़ रहेगा फिर धीरे-धीरे क्या होगा इक दिन इन सब से तंग आके मैं शायद ख़ुद-कुशी करूँॅंगा शे'र लिखा होगा दीवार-ओ-दर पर एक बहुत अच्छा सा लगता है हर रोज़ यही इक ऐसा दिन भी आएगा मुझ को ये डर है कि शायद ये सब कुछ सच हो जाएगा
Naaz ishq
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