"मैं ने उस सेे सीखा है" एक ज़माना ऐसा था मैं रूठा रूठा रहता था अब तो लहजा मीठा है मैं ग़ुस्सा ग़ुस्सा रहता था एक घुटन सी रहती थी जज़्बात नहीं बहते थे जिन आँखों में अब नूर है इन में दरिया बहता था यक़ीं न होता था मुझ को और किसी की बातों पर लोगों से तो अब मिलता हूँ तन्हा तन्हा रहता था दिल के सारे दरवाज़े मैं ने अंदर से बंद किए थे एक दरीचा मगर खुला रह गया था मुझ से और उसी से वो अंदर आया और उस ने ला-इल्मी ही सब के सब दरवाज़े खोल दिए तुम हॅंसते मुस्कुराते रहना दिल की बातें खुल के कहना मैं जो कोई रोज़ चली भी जाऊॅं अपने आप से मिलते रहना और उस ने ये जाते वक़्त कहा था कि नाज़ ज़िंदगी खुल के जीना तुम में और मुझ में बस फ़र्क इतना है तुम को शायद आता था मैं ने उस सेे सीखा है
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं
Tehzeeb Hafi
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!
Raghav Ramkaran
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
Faiz Ahmad Faiz
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"इबहाम" ये कौन से नगर आया हूँ मैं कि ख़्वाब यहाँ क़फ़स में हैं कि समेटे हुए हैं इल्म नहीं तसव्वुरात किसी सानिहे की डोरी से उलझ गए कि लपेटे हुए हैं इल्म नहीं निगाह हो कि ज़बाँ हो कि शहर-ए-दिल कि यहाँ हर एक शहर से पेचीदगी ज़ियादा है बॅंधे हुए हैं ख़याल इतने और गहरा सुकूत हर इक ख़याल ज़बाँ से परे निहादा है ये कैसे होंठ कि जो जुम्बिशें नहीं करते ये किस तरह की नज़र जिस में तीरगी है फ़क़त ये चाहते हैं सदाऍं सभी रसन बस्ता ये कान हैं कि जिन्हें रास ख़ामुशी है फ़क़त मैं थक के बैठ गया तो लगा कि दूर कहीं दबी हुई सी सदाएँ पुकारती हैं मुझे क़दम बढ़ाए तो कुछ ख़्वाहिशें दिखी और मैं जिन्हें जिन्हें हूँ मुयस्सर निहारती हैं मुझे शदीद ख़्वाब जो अल्हड़पने में देखे थे मुझे वो आज बड़ी हसरतों से तकते हैं बची हुई वफ़ा और अधमरी उमीद के साथ तमाम शौक़ बड़ी नफ़रतों से तकते हैं मैं इस के बा'द उतर आया और गहरा जहाँ फ़क़त थी याद-ए-गुज़िशता ख़याल-ए-मुस्तक़बिल मैं सेहन कर न सकूॅंगा अब और कुछ कि मुझे यहाँ से ले चलो और छोड़ आओ शहर-ए-दिल हर एक रोज़ वही रट वही सवाल कि 'नाज़' तू जानता है यहाँ हिजरतें नहीं होती ये खेल ज़ेहन में चलता है अहद-ए-फ़ुर्सत में तो ले चलो कि जहाँ फु़र्सतें नहीं होती
Naaz ishq
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"मुहासबा" दोबारा क्यूँँ फिर अब तुम लौट आए हो ग़मों का सिलसिला भी साथ लाए हो मशक़्क़त की बहुत तुम को भुलाने में क़सर छोड़ी न तुम ने याद आने में ख़ला ओ बे-कली तो आम थी पहले तुम्हारी दीद ना-उम्मीद थी जैसे समेटे और फेंके फिर अकेले ने हमारे वादों के टूटे हुए टुकड़े उठाते वक़्त मुझ को कुछ चुभे भी हैं इन्हीं ज़ख़्मों से हर शब खेलता था मैं ख़ुदा कोई करिश्मा कर गया मोहसिन इन्हें भी वक़्त आख़िर भर गया मोहसिन कोई भी रात दिन हाइल नहीं आती तुम्हारी याद अब बिल्कुल नहीं आती हमारे भी ख़ुशी से दिन निकलते हैं तुम्हारे भी ख़ुशी से दिन निकलते हैं तुम इन ज़ख़्मों को फिर से मत कुरेदो अब पुरानी बातों को फिर से न छेड़ो अब दोबारा फिर मेरा तुम दिल दुखाओगे मुझे तुम इस दफ़ा भी छोड़ जाओगे सो तज्दीद-ए-मरासिम क्यूँँ किया जाए शिफ़ा ज़ख़्मों को आख़िर क्यूँँ छुआ जाए कि अब मुझ में न हिम्मत है न ताकत है तुम्हारी अब न आदत है न चाहत है
Naaz ishq
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"इक लड़की सीधी साधी सी" इक लड़की सीधी साधी सी उस सेे रोज़ मुख़ातिब होता हूँ रोज़ कुछ ऐसी बात आती है कोई सवाल आता है ऐसा वो जिस सेे भाग जाती है हम दोनों की इक आदत है मेरी कुछ ज़्यादा बतलाना और उस की हर बात छुपाना बातों बातों में ही गर कोई बात जो निकली और कहीं तो बात बदलने लगती है कोई बात छुपाने लगती है उस सेे हाल-ए-दिल पूछूॅं तो ग़ज़ल सुनाने लगती है गाने गाने लगती है एक मुखौटा पहना है बस और वो इतनी देर से पहना है कि अगर उतारे भी कभी तो उस को लगता है ऐसा ये तो और कोई है ना यूँँॅं बात बात पे हॅंसते रहना सब है अच्छा अच्छा कहना घर बार यार और ख़ुद से दूर फिर भी अकेले ख़ुश रहना है सब झूठ छलावा धोका इतना ख़ुश तो कोई नहीं होता
Naaz ishq
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"तशवीश" मुझ को ये डर है कि शायद ये सब कुछ सच हो जाएगा आज का दिन निकला है जैसे यूँँॅं कल का भी निकल जाएगा फिर धीरे-धीरे क्या होगा मेरी सालों की मेहनत पर ये क़िस्मत पानी फेरेगी मैं अल्हड़-पन से निकलूॅंगा और ज़िम्मेदारी घेरेगी कॉलेज ख़त्म हो जाएगा फिर नौकरी करूँॅंगा मैं और दस पंद्रह हज़ार के ख़ातिर दिन और रात मरूॅंगा मैं दिन दफ़्तर में जाएगा और रात ख़यालों में जाएगी फिर इस सोच में दिन निकलेंगे अपनी बारी आएगी मगर नहीं आएगी इक इतवार ज़रूर आएगा छह दिन बा'द कहीं जा कर के एक महीने की तनख़्वाह इक हफ़्ते में ख़त्म फिर दूर-दूर तक नहीं दिखेंगे नाज़ ग़ज़ल और नज़्म शौक़ दबाता जाऊॅंगा फ़र्ज़ निभाता जाऊॅंगा फिर धीरे-धीरे क्या होगा शादी की बातें होंगी दिन दफ़्तर में जाएगा साथ किसी के रातें होंगी जो शाख-ए-उम्मीद पकड़ के बैठा हूँ ये भी इक दिन जल जाएगी फिर धीरे-धीरे क्या होगा नाज़ जवानी ढल जाएगी मुझ को कुछ करना था मुझ को कुछ बनना था मगर नहीं कर पाया मैं बाक़ी सब तो कर लेंगे कुछ अपना ही रह जाएगा ये दुनिया घूमने का सपना सपना ही रह जाएगा फिर हर रोज़ पशेमाँ हो के मैं बीती बातें सोचूॅंगा और ख़ुद को कोसूॅंगा ये भी किया जा सकता था वो भी किया जा सकता था यूँँॅं ज़िन्दगी गुज़ार दी है खुल के जिया जा सकता था और फिर अपनी नज़्म पढूॅंगा उम्र निकलती जाएगी मौत का ख़ौफ़ रहेगा फिर धीरे-धीरे क्या होगा इक दिन इन सब से तंग आके मैं शायद ख़ुद-कुशी करूँॅंगा शे'र लिखा होगा दीवार-ओ-दर पर एक बहुत अच्छा सा लगता है हर रोज़ यही इक ऐसा दिन भी आएगा मुझ को ये डर है कि शायद ये सब कुछ सच हो जाएगा
Naaz ishq
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"फ़ैज़" मुझे तुम छोड़ कर फिर से न जाना दोबारा मैं तुम्हें अपना रहा हूँ पुरानी मैं सभी बातें भुला दूँगा तुम्हें सब याद है या फिर नहीं है क्या पता लेकिन मुझे सब याद है मैं ने यही सब कुछ कहा था मगर तुम ने किया क्या जो तुम्हें करना था तुम उस बरसात के जैसी हो हमेशा जो ग़लत मिक़दार में होती है कभी ज़्यादा कभी कम और बे-मौसम फ़क़त मिट्टी भिगोने के लिए न जाने अब मुझे क्या हो गया है फ़ज़ाओ में कहानी सी नज़र आती है अब हर इक वो चीज़ जो मैं देखता हूँ हमारी ही कहानी लगती है सब , वो नदी देखो तुम्हें लगता नहीं मैं वो नदी हूँ और वो बादल तुम नदी सूखी हुई बादल भरे नदी है मुंतज़िर बरसात की मगर बादल गुज़र जाएगे दोबारा लौट कर आएगे मगर फिर से वही होगा यही होता है मेरे साथ भी हर बार भॅंवर हूँ मैं किनारे तुम ख़ला हूँ मैं नज़ारे तुम मैं हूँ पतझड़ बहारें तुम तुम्हारा मैं हमारे तुम नहीं ऐसा नहीं है अलग है हम बहुत तुम्हें मैं बे सबब ही याद करता रहता हूँ तुम्हारे पास जब कोई नहीं होता वहॉं मैं नफ़ा हो तुम ख़सारा मैं तुम्हीं हो चाँद तारा मैं मोहब्बत और कोई है गुज़ारा मैं दोबारा पास आओगी तुम सहेगा कौन दोबारा मैं सदाए दूँगा तुम को मैं पुकारूॅंगा मगर मेरी ये इल्तिज़ा है तुम सेे मत आना लौट कर
Naaz ishq
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