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"इक लड़की सीधी साधी सी" इक लड़की सीधी साधी सी उस सेे रोज़ मुख़ातिब होता हूँ रोज़ कुछ ऐसी बात आती है कोई सवाल आता है ऐसा वो जिस सेे भाग जाती है हम दोनों की इक आदत है मेरी कुछ ज़्यादा बतलाना और उस की हर बात छुपाना बातों बातों में ही गर कोई बात जो निकली और कहीं तो बात बदलने लगती है कोई बात छुपाने लगती है उस सेे हाल-ए-दिल पूछूॅं तो ग़ज़ल सुनाने लगती है गाने गाने लगती है एक मुखौटा पहना है बस और वो इतनी देर से पहना है कि अगर उतारे भी कभी तो उस को लगता है ऐसा ये तो और कोई है ना यूँँॅं बात बात पे हॅंसते रहना सब है अच्छा अच्छा कहना घर बार यार और ख़ुद से दूर फिर भी अकेले ख़ुश रहना है सब झूठ छलावा धोका इतना ख़ुश तो कोई नहीं होता

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है

Sohaib Mugheera Siddiqi

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मिरी हयात ये है और ये तुम्हारी क़ज़ा ज़ियादा किस से कहूँ और किस को कम बोलो तुम अहल-ए-ख़ाना रहे और मैं यतीम हुआ तुम्हारा दर्द बड़ा है या मेरा ग़म बोलो तुम्हारा दौर था घर में बहार हँसती थी अभी तो दर पे फ़क़त रंज-ओ-ग़म की दस्तक है तुम्हारे साथ का मौसम बड़ा हसीन रहा तुम्हारे बा'द का मौसम बड़ा भयानक है हज़ारों क़र्ज़ थे मुझ पर तुम्हारी उल्फ़त के मुझे वो क़र्ज़ चुकाने का मौक़ा तो देते तुम्हारा ख़ून मिरे जिस्म में मचलता रहा ज़रा से क़तरे बहाने का मौक़ा तो देते बड़े सुकून से तुम सो गए वहाँ जा कर ये कैसे नींद तुम्हें आ गई नए घर में हर एक शब मैं फ़क़त करवटें बदलता हूँ तुम्हारी क़ब्र के कंकर हों जैसे बिस्तर में मैं बोझ काँधों पे ऐसे उठा के चलता हूँ तुम्हारा जैसे जनाज़ा उठा के चलता था यहाँ पे मेरी परेशानी सिर्फ़ मेरी है वहाँ कोई न कोई कांधा तो बदलता था तुम्हारी शम-ए-तमन्ना बस एक रात बुझी चराग़ मेरी तवक़्क़ो के रोज़ बुझते हैं मैं साँस लूँ भी तो कैसे कि मेरी साँसों में तुम्हारी डूबती साँसों के तीर चुभते हैं मैं जब भी छूता हूँ अपने बदन की मिट्टी को तो लम्स फिर उसी ठंडे बदन का होता है लिबास रोज़ बदलता हूँ मैं भी सब की तरह मगर ख़याल तुम्हारे कफ़न का होता है बहुत तवील कहानी है मेरी हस्ती की तुम्हारी मौत तो इक मुख़्तसर फ़साना है वो जिस गली से जनाज़ा तुम्हारा निकला था उसी गली से मिरा रोज़ आना जाना है मैं कोई राह हूँ तुम राह देखने वाले कि मुंतज़िर तो मरा पर न इंतिज़ार मरा तुम्हारी मौत मिरी ज़िंदगी से बेहतर है तुम एक बार मरे मैं तो बार बार मरा

Zubair Ali Tabish

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"इबहाम" ये कौन से नगर आया हूँ मैं कि ख़्वाब यहाँ क़फ़स में हैं कि समेटे हुए हैं इल्म नहीं तसव्वुरात किसी सानिहे की डोरी से उलझ गए कि लपेटे हुए हैं इल्म नहीं निगाह हो कि ज़बाँ हो कि शहर-ए-दिल कि यहाँ हर एक शहर से पेचीदगी ज़ियादा है बॅंधे हुए हैं ख़याल इतने और गहरा सुकूत हर इक ख़याल ज़बाँ से परे निहादा है ये कैसे होंठ कि जो जुम्बिशें नहीं करते ये किस तरह की नज़र जिस में तीरगी है फ़क़त ये चाहते हैं सदाऍं सभी रसन बस्ता ये कान हैं कि जिन्हें रास ख़ामुशी है फ़क़त मैं थक के बैठ गया तो लगा कि दूर कहीं दबी हुई सी सदाएँ पुकारती हैं मुझे क़दम बढ़ाए तो कुछ ख़्वाहिशें दिखी और मैं जिन्हें जिन्हें हूँ मुयस्सर निहारती हैं मुझे शदीद ख़्वाब जो अल्हड़पने में देखे थे मुझे वो आज बड़ी हसरतों से तकते हैं बची हुई वफ़ा और अधमरी उमीद के साथ तमाम शौक़ बड़ी नफ़रतों से तकते हैं मैं इस के बा'द उतर आया और गहरा जहाँ फ़क़त थी याद-ए-गुज़िशता ख़याल-ए-मुस्तक़बिल मैं सेहन कर न सकूॅंगा अब और कुछ कि मुझे यहाँ से ले चलो और छोड़ आओ शहर-ए-दिल हर एक रोज़ वही रट वही सवाल कि 'नाज़' तू जानता है यहाँ हिजरतें नहीं होती ये खेल ज़ेहन में चलता है अहद-ए-फ़ुर्सत में तो ले चलो कि जहाँ फु़र्सतें नहीं होती

Naaz ishq

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"मुहासबा" दोबारा क्यूँँ फिर अब तुम लौट आए हो ग़मों का सिलसिला भी साथ लाए हो मशक़्क़त की बहुत तुम को भुलाने में क़सर छोड़ी न तुम ने याद आने में ख़ला ओ बे-कली तो आम थी पहले तुम्हारी दीद ना-उम्मीद थी जैसे समेटे और फेंके फिर अकेले ने हमारे वादों के टूटे हुए टुकड़े उठाते वक़्त मुझ को कुछ चुभे भी हैं इन्हीं ज़ख़्मों से हर शब खेलता था मैं ख़ुदा कोई करिश्मा कर गया मोहसिन इन्हें भी वक़्त आख़िर भर गया मोहसिन कोई भी रात दिन हाइल नहीं आती तुम्हारी याद अब बिल्कुल नहीं आती हमारे भी ख़ुशी से दिन निकलते हैं तुम्हारे भी ख़ुशी से दिन निकलते हैं तुम इन ज़ख़्मों को फिर से मत कुरेदो अब पुरानी बातों को फिर से न छेड़ो अब दोबारा फिर मेरा तुम दिल दुखाओगे मुझे तुम इस दफ़ा भी छोड़ जाओगे सो तज्दीद-ए-मरासिम क्यूँँ किया जाए शिफ़ा ज़ख़्मों को आख़िर क्यूँँ छुआ जाए कि अब मुझ में न हिम्मत है न ताकत है तुम्हारी अब न आदत है न चाहत है

Naaz ishq

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"मैं ने उस सेे सीखा है" एक ज़माना ऐसा था मैं रूठा रूठा रहता था अब तो लहजा मीठा है मैं ग़ुस्सा ग़ुस्सा रहता था एक घुटन सी रहती थी जज़्बात नहीं बहते थे जिन आँखों में अब नूर है इन में दरिया बहता था यक़ीं न होता था मुझ को और किसी की बातों पर लोगों से तो अब मिलता हूँ तन्हा तन्हा रहता था दिल के सारे दरवाज़े मैं ने अंदर से बंद किए थे एक दरीचा मगर खुला रह गया था मुझ से और उसी से वो अंदर आया और उस ने ला-इल्मी ही सब के सब दरवाज़े खोल दिए तुम हॅंसते मुस्कुराते रहना दिल की बातें खुल के कहना मैं जो कोई रोज़ चली भी जाऊॅं अपने आप से मिलते रहना और उस ने ये जाते वक़्त कहा था कि नाज़ ज़िंदगी खुल के जीना तुम में और मुझ में बस फ़र्क इतना है तुम को शायद आता था मैं ने उस सेे सीखा है

Naaz ishq

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ऐ उदास लड़की जहाॅं से रूठी हुई ऐ उदास लड़की तुझे ख़बर नहीं तिरा हुस्न ओ जमाल ढल रहा है कई बरस से बदन पे वही दरीदा लिबास तेरा ये चेहरा मगर पैरहन बदल रहा है निगाह से नज़र आता है मुंतज़िर है तू लबों पे वज़्न-ए-गोहर गर्द-ए-राह ख़्यालों पर अगर कभी कोई जो गुफ़्तगू करे तुम सेे तो होगी इब्तिदा और इंतिहा सवालों पर तेरे मिज़ाज में ये ख़ामोशी न थी पहले मैं जानता हूँ कि इस का तवील सिलसिला है तमाशबीन कोई भी क़यास कर लेगा ये कम सुख़न किसी ग़म में ज़रूर मुब्तिला है उमीद-ए-यार में बुझती हुई ये चश्म-ए-तर इसी गुमान में तू कब तलक जलाएगी भुला के दहर तू जिन साअ'तों में खोई है न कट सकेंगी मगर उम्र बीत जाएगी सराब-ए-नक़्श इस उम्मीद के मिटा दो तुम मैं शहर-ए-ख़्वाब के ख़ाकों में रंग भर दूँगा मैं जानता हूँ कि मुश्किल है पर तू मेरी तरफ़ क़दम बढ़ा मैं तुम्हें फिर हसीन कर दूँगा

Naaz ishq

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"फ़ैज़" मुझे तुम छोड़ कर फिर से न जाना दोबारा मैं तुम्हें अपना रहा हूँ पुरानी मैं सभी बातें भुला दूँगा तुम्हें सब याद है या फिर नहीं है क्या पता लेकिन मुझे सब याद है मैं ने यही सब कुछ कहा था मगर तुम ने किया क्या जो तुम्हें करना था तुम उस बरसात के जैसी हो हमेशा जो ग़लत मिक़दार में होती है कभी ज़्यादा कभी कम और बे-मौसम फ़क़त मिट्टी भिगोने के लिए न जाने अब मुझे क्या हो गया है फ़ज़ाओ में कहानी सी नज़र आती है अब हर इक वो चीज़ जो मैं देखता हूँ हमारी ही कहानी लगती है सब , वो नदी देखो तुम्हें लगता नहीं मैं वो नदी हूँ और वो बादल तुम नदी सूखी हुई बादल भरे नदी है मुंतज़िर बरसात की मगर बादल गुज़र जाएगे दोबारा लौट कर आएगे मगर फिर से वही होगा यही होता है मेरे साथ भी हर बार भॅंवर हूँ मैं किनारे तुम ख़ला हूँ मैं नज़ारे तुम मैं हूँ पतझड़ बहारें तुम तुम्हारा मैं हमारे तुम नहीं ऐसा नहीं है अलग है हम बहुत तुम्हें मैं बे सबब ही याद करता रहता हूँ तुम्हारे पास जब कोई नहीं होता वहॉं मैं नफ़ा हो तुम ख़सारा मैं तुम्हीं हो चाँद तारा मैं मोहब्बत और कोई है गुज़ारा मैं दोबारा पास आओगी तुम सहेगा कौन दोबारा मैं सदाए दूँगा तुम को मैं पुकारूॅंगा मगर मेरी ये इल्तिज़ा है तुम सेे मत आना लौट कर

Naaz ishq

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