चलो भय्या तुम को बनाऊँ मैं घोड़ा बनोगे जो घोड़ा तो मारूँगी कोड़ा न आएगी लेकिन ज़रा चोट तुम को सिला दूँगी प्यारा सा इक कोट तुम को चलोगे शपा-शप तो दूँगी मैं चारा रुकोगे तो खाओगे चाँटा करारा ये चाँटा न होगा मगर मार कोई समझ लो कि जैसे करे प्यार कोई तुम्हारे लिए मैं ने गाड़ी बनाई हर इक शय क़रीने से इस में लगाई पड़ा है जो कपड़ों का संदूक़ इस में डराने को रख ली है बंदूक़ इस में और इक नन्ही छतरी भी रख ली है मैं ने कड़ी धूप के ख़ौफ़ से मेंह के डर से कि शायद झुके अब्र बूँदें गिराने तो बच जाऊँ बारिश से छतरी लगा के तुम्हें क्या ज़रूरत कि हो तुम तो घोड़ा चलो अब जुतो वर्ना मारूँगी कोड़ा जो मानोगे कहना तो ले दूँगी लट्टू नहीं तो हो तुम आज से मेरे टट्टू
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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"ख़त" तुम को ये बताना था या फिर ये समझाना था दिल की बस ये चाहत थी बस तुम पर प्यार लुटाना था तुम को ये बताना था था छेड़ना तुम को थोड़ा थोड़ा तुम्हें सताना था जो रूठ जाते तुम मुझ सेे हाँ मुझ को तुम्हें मनाना था फिर तुम को गले लगाना था तुम को ये बताना था लड़ के भी तुम सोते तो तुम्हारा सिर सहलाना था मक़्सद सिर्फ़ एक था तुम्हारा प्यार कमाना था सारी दुनिया मिट्टी है तुम्हारा साथ ख़ज़ाना था तुम को ये बताना था मिलने तुम सेे आना था या फिर तुम्हें बुलाना था माँग तुम्हारी भरनी थी अपना तुम्हें बनाना था तुम्हारा ही कहलाना था तुम को ये बताना था इस जीवन का हर मंज़र तुम्हारे साथ बिताना था हर फेरे का हर वा'दा तुम्हारे साथ निभाना था मंगलसूत्र इन हाथों से तुम को ही पहनाना था तुम को ये बताना था फ़ासले जितने भी थे उन को मुझे मिटाना था उस ख़ुदा से हर जन्म में तुम्हारा साथ लिखाना था फिर बारात तुम्हारी चौखट पर तुम सेे ही ब्याह रचाना था तुम को ये बताना था बिन बोले बस चुपके से गजरा तुम्हें दिलाना था बनाता मैं एक दिन खाना फिर खाना तुम्हें खिलाना था तुम्हारे हाथों से खाना मुझ को भी तो खाना था तुम को ये बताना था खो दिया तुम को मैं ने ये दुख अब मुझे मनाना था डूब जाता आसमान बस आँसू मुझे बहाना था फिर लिख दिया मैं ने आँसू बस इतना मेरा फ़साना था तुम को ये बताना था बस तुम को ये बताना था
Divya 'Kumar Sahab'
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तुम हमारे लिए तुम हमारे लिए अर्चना बन गई हम तुम्हारे लिए एक दर्पण प्रिये तुम मिलो तो सही हाल पूछो मेरा हम न रो दें तो कह देना पत्थर प्रिये प्यार मिलना नहीं था अगर भाग्य में देवताओं ने हम सेे ये छल क्यूँ किया मेरे दिल में भरी रेत ही रेत थी दे के अमृत ये हम को विकल क्यूँ किया अप्सरा हो तो हो पर हमारे लिए तुम ही सुंदर सुकोमल सुघर हो प्रिये देवताओं के गणितीय संसार में ऐसा भी है नहीं कोई अच्छा न था हम अगर इस जनम भी नहीं मिल सके सब कहेंगे यही प्यार सच्चा न था कायरों को कभी प्यार मिलता नहीं फ़ैसला कोई ले लो कि डटकर प्रिये मम्मी कहती थीं चंदा बहुत दूर है चाँद से आगे हम को सितारा लगा यूँँ तो चेहरे ही चेहरे थे दुनिया में पर एक तेरा ही चेहरा पियारा लगा पलकों पे मेरी रख कर क़दम तुम चलो पॉंव में चुभ न जाए कि कंकड़ प्रिये
Rakesh Mahadiuree
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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आए हैं आसमान पर बादल छाए हैं आसमान पर बादल अब्र ही अब्र देखते हैं हम है बरसने को जो अभी छम-छम और मालूम ऐसा होता है छुप के ख़ुर्शीद जैसे सोता है घर के कोठे पे एक दो बच्चे चारपाई पे हैं डटे बैठे बोलियाँ भाँत भाँत हैं उन की मीठी मीठी हैं भोली भाली सी एक बोला कि जानते हो क्या क्या है ये आसमान पर छाया रूई के गाले नाम है इन का आना और जाना काम है इन का जब पहाड़ों से लोग आते हैं रूई के गाले साथ लाते हैं कर के अच्छी तरह से इन को साफ़ लम्बे चौड़े बनाते हैं वो लिहाफ़ बात सच ये है दूसरा बोला आसमान पर लगा है इक ख़ेमा है ग़लत ये भी तीसरे ने कहा अस्ल में है ये दूध का दरिया आसमाँ वाले इस को पीते हैं इस को पी कर फ़रिश्ते जीते हैं मिल के यूँँ सब ने ऐसी बातें कीं नन्हे नन्हों ने नन्ही बातें कीं देखते देखते हुआ फिर क्या मूसला-धार मेंह बरसने लगा प्यारे बच्चे ये लाडले बच्चे अपने अपने घरों को भाग गए
Lateef Farooqi
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किसी क़स्बे में एक था अमरूद बीसों में वो नेक था अमरूद पढ़ने जाता था वो नमाज़ वहाँ आदमी इक नज़र न आए जहाँ ख़ौफ़ उस को हमेशा रहता था आदमी कोई मुझ को खा लेगा शौक़ बोला कि एक दिन जाओ किसी मस्जिद में जा नमाज़ पढ़ो छोटी सी मस्जिद इक क़रीब ही थी थे वहाँ डट के बैठे मुल्ला जी चुपके चुपके ख़ुदा की ले कर आस चल के जा बैठा जूतियों के पास जूँही सज्दे में उस ने रखा सर आए मुल्ला जी उस तरफ़ उठ कर ऐसे मुल्ला नदीदे होते हैं देख के खाने होश खोते हैं हलवा खाते हैं नान खाते हैं जब मिले कुछ न जान खाते हैं झपटे उस पर पकड़ लिया अमरूद चीख़ा चिल्लाया रो पड़ा अमरूद कहा अमरूद ने कि मुल्ला जी हो अगर आज मेरी जाँ-बख़्शी फल खिलाउँगा आप को ऐसा अच्छा मुझ से है ज़ाइक़ा जिस का फिर कहा ये कि मेरे साथ आएँ जिस जगह मैं कहूँ ठहर जाएँ इक दुकाँ के क़रीब आ के कहा आईये देखिए है कैसा मज़ा केला जल्दी से इक उठा लीजे और मस्जिद में चल के खा लीजिए मालिक उस का वहाँ न था मौजूद मुल्ला मौजूद था ख़ुदा मौजूद केला मस्जिद के पास ले के चले चलते चलते वो आख़िर आ पहुँचे कहा अमरूद ने निकालिए आप छील कर केला उस को खाइए आप लगे मस्जिद में जाने जब खा कर आ गया उन का पाँव छिलके पर वाए क़िस्मत कि आप ऐसे गिरे एक घंटे से पहले उठ न सके मौक़ा पाते ही चल दिया अमरूद दे के मुल्ला को जुल गया अमरूद हिर्स का ख़ूब ही मज़ा पाया दूध उन को छटी का याद आया
Lateef Farooqi
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