nazmKuch Alfaaz

किसी क़स्बे में एक था अमरूद बीसों में वो नेक था अमरूद पढ़ने जाता था वो नमाज़ वहाँ आदमी इक नज़र न आए जहाँ ख़ौफ़ उस को हमेशा रहता था आदमी कोई मुझ को खा लेगा शौक़ बोला कि एक दिन जाओ किसी मस्जिद में जा नमाज़ पढ़ो छोटी सी मस्जिद इक क़रीब ही थी थे वहाँ डट के बैठे मुल्ला जी चुपके चुपके ख़ुदा की ले कर आस चल के जा बैठा जूतियों के पास जूँही सज्दे में उस ने रखा सर आए मुल्ला जी उस तरफ़ उठ कर ऐसे मुल्ला नदीदे होते हैं देख के खाने होश खोते हैं हलवा खाते हैं नान खाते हैं जब मिले कुछ न जान खाते हैं झपटे उस पर पकड़ लिया अमरूद चीख़ा चिल्लाया रो पड़ा अमरूद कहा अमरूद ने कि मुल्ला जी हो अगर आज मेरी जाँ-बख़्शी फल खिलाउँगा आप को ऐसा अच्छा मुझ से है ज़ाइक़ा जिस का फिर कहा ये कि मेरे साथ आएँ जिस जगह मैं कहूँ ठहर जाएँ इक दुकाँ के क़रीब आ के कहा आईये देखिए है कैसा मज़ा केला जल्दी से इक उठा लीजे और मस्जिद में चल के खा लीजिए मालिक उस का वहाँ न था मौजूद मुल्ला मौजूद था ख़ुदा मौजूद केला मस्जिद के पास ले के चले चलते चलते वो आख़िर आ पहुँचे कहा अमरूद ने निकालिए आप छील कर केला उस को खाइए आप लगे मस्जिद में जाने जब खा कर आ गया उन का पाँव छिलके पर वाए क़िस्मत कि आप ऐसे गिरे एक घंटे से पहले उठ न सके मौक़ा पाते ही चल दिया अमरूद दे के मुल्ला को जुल गया अमरूद हिर्स का ख़ूब ही मज़ा पाया दूध उन को छटी का याद आया

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो

Gulzar

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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है

Sahir Ludhianvi

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जब वो मुझ को कहती थी एक शे'र सुनाओ उस के उपरी लब को चूम के हट जाता था उस के ज़ेहन में क्या आता था? तैश में आ कर कहती थी - “शे'र मुकम्मल कौन करेगा? सानी मिसरा कौन पढ़ेगा?”

Zubair Ali Tabish

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आए हैं आसमान पर बादल छाए हैं आसमान पर बादल अब्र ही अब्र देखते हैं हम है बरसने को जो अभी छम-छम और मालूम ऐसा होता है छुप के ख़ुर्शीद जैसे सोता है घर के कोठे पे एक दो बच्चे चारपाई पे हैं डटे बैठे बोलियाँ भाँत भाँत हैं उन की मीठी मीठी हैं भोली भाली सी एक बोला कि जानते हो क्या क्या है ये आसमान पर छाया रूई के गाले नाम है इन का आना और जाना काम है इन का जब पहाड़ों से लोग आते हैं रूई के गाले साथ लाते हैं कर के अच्छी तरह से इन को साफ़ लम्बे चौड़े बनाते हैं वो लिहाफ़ बात सच ये है दूसरा बोला आसमान पर लगा है इक ख़ेमा है ग़लत ये भी तीसरे ने कहा अस्ल में है ये दूध का दरिया आसमाँ वाले इस को पीते हैं इस को पी कर फ़रिश्ते जीते हैं मिल के यूँँ सब ने ऐसी बातें कीं नन्हे नन्हों ने नन्ही बातें कीं देखते देखते हुआ फिर क्या मूसला-धार मेंह बरसने लगा प्यारे बच्चे ये लाडले बच्चे अपने अपने घरों को भाग गए

Lateef Farooqi

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चलो भय्या तुम को बनाऊँ मैं घोड़ा बनोगे जो घोड़ा तो मारूँगी कोड़ा न आएगी लेकिन ज़रा चोट तुम को सिला दूँगी प्यारा सा इक कोट तुम को चलोगे शपा-शप तो दूँगी मैं चारा रुकोगे तो खाओगे चाँटा करारा ये चाँटा न होगा मगर मार कोई समझ लो कि जैसे करे प्यार कोई तुम्हारे लिए मैं ने गाड़ी बनाई हर इक शय क़रीने से इस में लगाई पड़ा है जो कपड़ों का संदूक़ इस में डराने को रख ली है बंदूक़ इस में और इक नन्ही छतरी भी रख ली है मैं ने कड़ी धूप के ख़ौफ़ से मेंह के डर से कि शायद झुके अब्र बूँदें गिराने तो बच जाऊँ बारिश से छतरी लगा के तुम्हें क्या ज़रूरत कि हो तुम तो घोड़ा चलो अब जुतो वर्ना मारूँगी कोड़ा जो मानोगे कहना तो ले दूँगी लट्टू नहीं तो हो तुम आज से मेरे टट्टू

Lateef Farooqi

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