आए हैं आसमान पर बादल छाए हैं आसमान पर बादल अब्र ही अब्र देखते हैं हम है बरसने को जो अभी छम-छम और मालूम ऐसा होता है छुप के ख़ुर्शीद जैसे सोता है घर के कोठे पे एक दो बच्चे चारपाई पे हैं डटे बैठे बोलियाँ भाँत भाँत हैं उन की मीठी मीठी हैं भोली भाली सी एक बोला कि जानते हो क्या क्या है ये आसमान पर छाया रूई के गाले नाम है इन का आना और जाना काम है इन का जब पहाड़ों से लोग आते हैं रूई के गाले साथ लाते हैं कर के अच्छी तरह से इन को साफ़ लम्बे चौड़े बनाते हैं वो लिहाफ़ बात सच ये है दूसरा बोला आसमान पर लगा है इक ख़ेमा है ग़लत ये भी तीसरे ने कहा अस्ल में है ये दूध का दरिया आसमाँ वाले इस को पीते हैं इस को पी कर फ़रिश्ते जीते हैं मिल के यूँँ सब ने ऐसी बातें कीं नन्हे नन्हों ने नन्ही बातें कीं देखते देखते हुआ फिर क्या मूसला-धार मेंह बरसने लगा प्यारे बच्चे ये लाडले बच्चे अपने अपने घरों को भाग गए
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती
Abrar Kashif
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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किसी क़स्बे में एक था अमरूद बीसों में वो नेक था अमरूद पढ़ने जाता था वो नमाज़ वहाँ आदमी इक नज़र न आए जहाँ ख़ौफ़ उस को हमेशा रहता था आदमी कोई मुझ को खा लेगा शौक़ बोला कि एक दिन जाओ किसी मस्जिद में जा नमाज़ पढ़ो छोटी सी मस्जिद इक क़रीब ही थी थे वहाँ डट के बैठे मुल्ला जी चुपके चुपके ख़ुदा की ले कर आस चल के जा बैठा जूतियों के पास जूँही सज्दे में उस ने रखा सर आए मुल्ला जी उस तरफ़ उठ कर ऐसे मुल्ला नदीदे होते हैं देख के खाने होश खोते हैं हलवा खाते हैं नान खाते हैं जब मिले कुछ न जान खाते हैं झपटे उस पर पकड़ लिया अमरूद चीख़ा चिल्लाया रो पड़ा अमरूद कहा अमरूद ने कि मुल्ला जी हो अगर आज मेरी जाँ-बख़्शी फल खिलाउँगा आप को ऐसा अच्छा मुझ से है ज़ाइक़ा जिस का फिर कहा ये कि मेरे साथ आएँ जिस जगह मैं कहूँ ठहर जाएँ इक दुकाँ के क़रीब आ के कहा आईये देखिए है कैसा मज़ा केला जल्दी से इक उठा लीजे और मस्जिद में चल के खा लीजिए मालिक उस का वहाँ न था मौजूद मुल्ला मौजूद था ख़ुदा मौजूद केला मस्जिद के पास ले के चले चलते चलते वो आख़िर आ पहुँचे कहा अमरूद ने निकालिए आप छील कर केला उस को खाइए आप लगे मस्जिद में जाने जब खा कर आ गया उन का पाँव छिलके पर वाए क़िस्मत कि आप ऐसे गिरे एक घंटे से पहले उठ न सके मौक़ा पाते ही चल दिया अमरूद दे के मुल्ला को जुल गया अमरूद हिर्स का ख़ूब ही मज़ा पाया दूध उन को छटी का याद आया
Lateef Farooqi
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चलो भय्या तुम को बनाऊँ मैं घोड़ा बनोगे जो घोड़ा तो मारूँगी कोड़ा न आएगी लेकिन ज़रा चोट तुम को सिला दूँगी प्यारा सा इक कोट तुम को चलोगे शपा-शप तो दूँगी मैं चारा रुकोगे तो खाओगे चाँटा करारा ये चाँटा न होगा मगर मार कोई समझ लो कि जैसे करे प्यार कोई तुम्हारे लिए मैं ने गाड़ी बनाई हर इक शय क़रीने से इस में लगाई पड़ा है जो कपड़ों का संदूक़ इस में डराने को रख ली है बंदूक़ इस में और इक नन्ही छतरी भी रख ली है मैं ने कड़ी धूप के ख़ौफ़ से मेंह के डर से कि शायद झुके अब्र बूँदें गिराने तो बच जाऊँ बारिश से छतरी लगा के तुम्हें क्या ज़रूरत कि हो तुम तो घोड़ा चलो अब जुतो वर्ना मारूँगी कोड़ा जो मानोगे कहना तो ले दूँगी लट्टू नहीं तो हो तुम आज से मेरे टट्टू
Lateef Farooqi
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