चलो हवा के साथ चलें और देखें रुख़ उन लोगों का जो हम से रूठ के बैठे हैं आओ उन की बात सुनें और सुन लें शायद अपनी बात रख कर उन के हाथ पे हाथ कभी तो दिल की बात सुनें और रहें हम उन के पास शायद वो भी हों उदास चलो हवा के साथ चलें
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"अंजाम" हैं लबरेज़ आहों से ठंडी हवाएँ उदासी में डूबी हुई हैं घटाएँ मोहब्बत की दुनिया पे शाम आ चुकी है सियह-पोश हैं ज़िंदगी की फ़ज़ाएँ मचलती हैं सीने में लाख आरज़ुएँ तड़पती हैं आँखों में लाख इल्तिजाएँ तग़ाफ़ुल की आग़ोश में सो रहे हैं तुम्हारे सितम और मेरी वफ़ाएँ मगर फिर भी ऐ मेरे मासूम क़ातिल तुम्हें प्यार करती हैं मेरी दुआएँ
Faiz Ahmad Faiz
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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मिरी हयात ये है और ये तुम्हारी क़ज़ा ज़ियादा किस से कहूँ और किस को कम बोलो तुम अहल-ए-ख़ाना रहे और मैं यतीम हुआ तुम्हारा दर्द बड़ा है या मेरा ग़म बोलो तुम्हारा दौर था घर में बहार हँसती थी अभी तो दर पे फ़क़त रंज-ओ-ग़म की दस्तक है तुम्हारे साथ का मौसम बड़ा हसीन रहा तुम्हारे बा'द का मौसम बड़ा भयानक है हज़ारों क़र्ज़ थे मुझ पर तुम्हारी उल्फ़त के मुझे वो क़र्ज़ चुकाने का मौक़ा तो देते तुम्हारा ख़ून मिरे जिस्म में मचलता रहा ज़रा से क़तरे बहाने का मौक़ा तो देते बड़े सुकून से तुम सो गए वहाँ जा कर ये कैसे नींद तुम्हें आ गई नए घर में हर एक शब मैं फ़क़त करवटें बदलता हूँ तुम्हारी क़ब्र के कंकर हों जैसे बिस्तर में मैं बोझ काँधों पे ऐसे उठा के चलता हूँ तुम्हारा जैसे जनाज़ा उठा के चलता था यहाँ पे मेरी परेशानी सिर्फ़ मेरी है वहाँ कोई न कोई कांधा तो बदलता था तुम्हारी शम-ए-तमन्ना बस एक रात बुझी चराग़ मेरी तवक़्क़ो के रोज़ बुझते हैं मैं साँस लूँ भी तो कैसे कि मेरी साँसों में तुम्हारी डूबती साँसों के तीर चुभते हैं मैं जब भी छूता हूँ अपने बदन की मिट्टी को तो लम्स फिर उसी ठंडे बदन का होता है लिबास रोज़ बदलता हूँ मैं भी सब की तरह मगर ख़याल तुम्हारे कफ़न का होता है बहुत तवील कहानी है मेरी हस्ती की तुम्हारी मौत तो इक मुख़्तसर फ़साना है वो जिस गली से जनाज़ा तुम्हारा निकला था उसी गली से मिरा रोज़ आना जाना है मैं कोई राह हूँ तुम राह देखने वाले कि मुंतज़िर तो मरा पर न इंतिज़ार मरा तुम्हारी मौत मिरी ज़िंदगी से बेहतर है तुम एक बार मरे मैं तो बार बार मरा
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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"ख़त" तुम को ये बताना था या फिर ये समझाना था दिल की बस ये चाहत थी बस तुम पर प्यार लुटाना था तुम को ये बताना था था छेड़ना तुम को थोड़ा थोड़ा तुम्हें सताना था जो रूठ जाते तुम मुझ सेे हाँ मुझ को तुम्हें मनाना था फिर तुम को गले लगाना था तुम को ये बताना था लड़ के भी तुम सोते तो तुम्हारा सिर सहलाना था मक़्सद सिर्फ़ एक था तुम्हारा प्यार कमाना था सारी दुनिया मिट्टी है तुम्हारा साथ ख़ज़ाना था तुम को ये बताना था मिलने तुम सेे आना था या फिर तुम्हें बुलाना था माँग तुम्हारी भरनी थी अपना तुम्हें बनाना था तुम्हारा ही कहलाना था तुम को ये बताना था इस जीवन का हर मंज़र तुम्हारे साथ बिताना था हर फेरे का हर वा'दा तुम्हारे साथ निभाना था मंगलसूत्र इन हाथों से तुम को ही पहनाना था तुम को ये बताना था फ़ासले जितने भी थे उन को मुझे मिटाना था उस ख़ुदा से हर जन्म में तुम्हारा साथ लिखाना था फिर बारात तुम्हारी चौखट पर तुम सेे ही ब्याह रचाना था तुम को ये बताना था बिन बोले बस चुपके से गजरा तुम्हें दिलाना था बनाता मैं एक दिन खाना फिर खाना तुम्हें खिलाना था तुम्हारे हाथों से खाना मुझ को भी तो खाना था तुम को ये बताना था खो दिया तुम को मैं ने ये दुख अब मुझे मनाना था डूब जाता आसमान बस आँसू मुझे बहाना था फिर लिख दिया मैं ने आँसू बस इतना मेरा फ़साना था तुम को ये बताना था बस तुम को ये बताना था
Divya 'Kumar Sahab'
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दरख़्तों से पत्ते तो हर साल गिरते हैं मिट्टी में मिलने की ख़्वाहिश लिए मगर उन को गिन गिन के रखता है कौन सफ़र की थकन से सरासीमा पत्ता जो गिरता है लम्हे की दीवार कर के उबूर बहुत दूर से आ के लेता है मिट्टी की ख़ुशबू की ख़ुशियाँ मगर ज़र्द रंगों के ज़ेवर से आरास्ता ये ख़िज़ाँ की दुल्हन जिस की क़िस्मत के तारे शब-ओ-रोज़ गिरते हैं धरती की आग़ोश पर हैं ये किस के इशारे इन्ही ज़र्द रंगों की ख़ुशबू में शायद नई ख़्वाहिशों के उफ़ुक़ हैं नए चाँद तारे
Ghalib Ahmad
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करम योगी है पैकर-ए-जिस्म में रहता है मिरे साथ उस की आवाज़ मिरे दिल से निकल कर फूँकती है मिरी रूह में नग़्मों का ख़ुमार फूल खिलते हैं सितारों के मिरे आँगन में मेरी सखियाँ मेरी हमजोलियाँ आती हैं मुझे मिलने तो वो मिल बैठता है उस की आसूदगी-ए-दिल दर-ओ-दीवार से बाहर किसी महकी हुई ख़ुशबू की तरह फैलती है फैल कर चूमती है हर कस-ओ-ना-कस के क़दम क्या करूँँ दिल मिरा दीवाना है पैकर-ए-जिस्म में रहता हुआ योगी है वफ़ा की तस्वीर अपनी ता'बीर को ख़्वाबों में बसा लेती हूँ कोई आज़ुर्दा-बदन कोई ख़िज़ाँ-दीदा चमन उस की फैली हुई ख़ुशबू से अगर जाग उठे तो मुझे ग़म होता है
Ghalib Ahmad
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दोस्त रुख़्सत हो गए उन से मुलाक़ातें गईं बातें गईं शहर था आबाद जिन के दम-क़दम से वो हमारी चाँदनी रातें गईं मरने वाले मर गए ज़िंदा मगर हम भी नहीं वो तो ग़ुस्ल-ए-आख़िरी ले कर हुए फिर ताज़गी से आश्ना निथरे सुथरे ओढ़ कर अपनी सफ़ेदी के कफ़न काफ़ूर की ख़ुशबू को नथुनों में समाए सो गए आराम से ठंडे बदन अपनी अपनी क़ब्र पर तकिया किए वो थकन की इस मुसलसल सरसराहट से तो अब आज़ाद हैं साँस की ज़ंजीर से लटके हुए जागते रहने की काविश और लगन इस तग-ओ-दौ से परे आबाद हैं और हम जो इस किनारे पर खड़े रोज़-ओ-शब लहरों का करते हैं शुमार आप-बीती रोज़ सुनते हैं मगर ख़ामोश हैं ख़ामुशी से बहता पानी रोज़ बहता देखते हैं डूब जाने की मगर हिम्मत नहीं कौन जाने डूब ही जाएँ कहीं डूब जाओ या चले आओ इधर बाज़ आओ और फिर ज़िंदा रहो सातवाँ दर भी खुला है मुंतज़िर दाग़-ए-हिजरत दे गए ख़ुशबू के फूल कौन अब बन कर चराग़-ए-राह तुम को हाथ से उँगली पकड़ कर तिफ़्ल-ए-मकतब की तरह ले कर बढ़े और ये कहे मौत का लम्हा हमारी ज़िंदगी का आ गया जिस्म की ठंडक तो दस्तक दे रही है आओ कुछ बातें करें और फिर चलें दोस्त रुख़्सत हो गए
Ghalib Ahmad
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1 हम किसी और सितारे से यहाँ आए थे याद रखना थी यही बात मगर भूल गए हम ने जब चाँद पे रक्खा था क़दम याद आया था हमें उस का बदन हम मगर अपनों की बातों में मगन वादी-ए-याद की गहराई में उतरे ही नहीं काश उस लम्हे की आवाज़ को हम सुन लेते फिर हमें वक़्त के चंगुल से रिहाई होती ग़ार के पार सफ़ेदी न सियाही होती 2 ज़मीं का ज़माना है ये हम ज़मीं-बोस हुए सब्ज़ रंगों के सराब नीलगूँ सत्ह-ए-आब हम फ़लक-बोस हुए और ये भूल गए थे कभी अपने बदन पर तेरे क़दमों के निशाँ सब्ज़ पत्तों के सिवा और भी रंग थे रंगों से सिवा कौन सा कैफ़ था इन चीज़ों में जिन की तुम रूह थे हम पैकर थे नूर हो साया हो कि तारीकी हो लाख मैं जिस्म से और रूह से आरास्ता पैरास्ता हो कर उठ्ठूँ बन भी जाए ये ज़मीं मेरी करिश्मा-गह-ए-आलात-गरी तू मगर और ही कुछ चीज़ है तू न नूरी है न नारी है न ख़ाक-ए-आबी तू न शमसी है न अर्ज़ी है न है महताबी तू न मिर्रीख़ से ज़ोहरा से न सरतान से है तेरे क़दमों के निशाँ और कहीं देखे थे जिस्म क़द शक्ल ये अतवार ये तेवर तेरे तेरी बू-बास लिबास फूल ये ज़ेवर तेरे ख़ामुशी तेरी ये आवाज़ ये चलना तेरा आना जाना ये सितारों का ग़ुबार सिलसिला है ये अदाओं का कि है जिस्म के पर्दों पे तेरी रूह के नग़्मों का ख़ुमार इक नई शान का हर रोज़ निखार और फिर सोचता हूँ तू तो कुछ और है इन चीज़ों का मजमूआ' नहीं तू तो कुछ और है इन से भी सिवा इन के होने का न होने का भी पाबंद नहीं तेरा वजूद तेरे क़दमों के निशाँ और कहीं देखे थे तेरे क़दमों से तो है आज भी शादाब मिरा सारा वजूद याद रखने की यही बात थी इब्न-ए-आदम तुम ने जब चाँद पे रक्खा था क़दम तुम किसी और सितारे से यहाँ आए थे
Ghalib Ahmad
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चश्म-ए-तमन्ना जिसे नींद आई थी सदियों की बीमारियों की थकन से जाग उट्ठी है शायद बदन में नया दिन शगूफ़े की मानिंद उभरा शफ़क़-ज़ार बन कर दिल की आग़ोश में आ बसा है नज़ारे में मसहूर रहने की ख़्वाहिश जनम ले रही है बसा कर उसे अपनी नज़रों में शादाब आँखों में रहने को जी चाहता है वही रंग-ओ-बू की हरारत की हल्की लकीरें तमाज़त के झोंके बदन छू रहे हैं बहार आ गई याद की वादियों में सफ़र के इरादों से मायूस कश्ती किनारे पे यूँँ आ लगी है कि ठहरी हुई झील की रौशनी में नया घर बसा है ये चश्म-ए-तमन्ना की कश्ती बनी है नया आशियाना नीलगूँ रौशनी तैरती है मगर ये खड़ी है ज़माने मोहब्बत के फिर लौट आए हैं शायद वक़्त के ठहर जाने की शायद घड़ी है क़यामत कड़ी है
Ghalib Ahmad
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