मैं ने आज रात के आख़िरी पहर ख़्वाब देखा है कि मेरी खोपड़ी के अंदर बहुत सारे चमगादड़ फड़फड़ा रहे हैं
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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अल्फ़ाज़ के जादू से सहर-कारों ने हर वक़्त पत्थर को कभी शीशा कभी आग को शबनम नफ़रत को मोहब्बत कभी इंसान को हैवान..... हैवान बनाया जिस राह पे चलते रहे गुमराह मुसाफ़िर उन राहों को हर मोड़ पे, बे-मोड़ पे इस तरह घुमाया कि जैसे ख़लाओं में सभी घूम रहे हों दीवानों की मानिंद गर्दिश ने उन्हें और भी दीवाना बनाया दीवानों के क़दमों में ये लटकी हुई ज़ंजीर अल्फ़ाज़ की अब चीख़ रही है अल्फ़ाज़ पे दीवाने भरोसा नहीं करते
Paigham Aafaqi
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नद्दियाँ मेरे क़दमों के नीचे से बहती चली जा रही हैं पहाड़ मेरे घुटनों और दरख़्त मेरे रोंगटों पर रश्क कर रहे हैं फैली हुई ज़मीन पर मैं कितना ऊँचा हो गया हूँ चाँद मेरे माथे पर है और सूरज हाथों का खिलौना है ख़ुदा मेरी खोपड़ी के अंदर चमगादड़ की तरह फड़फड़ा रहा है समुंदर मेरा पाँव चूम रहे हैं और तहज़ीबें तेज़-ओ-तुंद हवाओं की तरह सनसनाहट पैदा कर रही हैं कि मैं ज़मीन को हाथ में ले कर इस तरह उछाल सकता हूँ जैसे बच्चे गेंद उछाला करते हैं हज़ारों बरस से मैं ने यही ख़्वाब देखा था कि मैं ख़ुदा हो जाता अब मुझे ख़ुदा रहना भी गवारा नहीं लोगों ने मेरे क़दमों पे सर रख दिए हैं लेकिन मेरा सर जो अब एक बड़ा सा बोझ बन गया है इसे मैं कहाँ रक्खूँ जन्नत मेरे दाहने हाथ में है और दोज़ख़ बाएँ हाथ में और सर पर नूर का ताज है फ़रिश्ते मेरे चारों तरफ़ हैं लेकिन अब मैं क्या करूँँ मुझे तो डर लगता है कि अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ
Paigham Aafaqi
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ज़ख़्मों के अम्बार, दर-ओ-दीवार भी सूने लगते हैं ख़ुशियों के दरिया में इतनी चोट लगी कि अब इस में चलते रहना दुश्वार हुआ सड़कों पर चलते फिरते शादाब से चेहरे सूख गए वो मौसम जिस को आना था, वो आ भी गया और छा भी गया अश्जार के नीले गोशों से अब ज़हर सा रिसता रहता है गुलज़ार ख़िज़ाँ के शोलों में हर लम्हा सुलगता रहता है इस ख़्वाब-ए-परेशाँ में कब तक इस रूह-ए-अज़िय्यत-ख़ूर्दा को तुम क़ैद रखोगे छोड़ भी दो! इस रूह-ए-अज़िय्यत-ख़ूर्दा को
Paigham Aafaqi
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जब रेत का सहरा देख के डर जाता है अदीब का सीना भी वो लम्हे अक्सर आते हैं जब ज़ेहन के सारे पर्दे अटके अटके से रह जाते हैं जब शोर मचाती शाख़-ए-ज़बाँ से सारे परिंदे मर मर के गिर जाते हैं वो लम्हे अक्सर आते हैं जब आवाज़ों के पिंजर अपने सूखे सूखे हाथ लिए मेरे सर पर छा जाते हैं और मैं घबरा सा जाता हूँ इक क़ब्रिस्तान की तंहाई इक बे-म'अनी ख़ाली रस्ता और दो पाँव की ख़ाली ख़ाली थकी थकी सी चाप तो अपने-आप से भी डर जाता हूँ जब रेत का सहरा देख के डर जाता है क़लम का सीना भी वो लम्हे अक्सर आते हैं
Paigham Aafaqi
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ज़मीं पहले ऐसी कभी भी न थी पाँव मिट्टी पे होते थे नज़रें उफ़ुक़ पर हमें अपने बारे में मालूम होता था हम कौन हैं और क्या कर रहे हैं कहाँ जा रहे हैं मगर आज आलम ये है पाँव रुकते नहीं आँख खुलती नहीं अजनबी रास्तों पर मैं बढ़ता चला जा रहा हूँ
Paigham Aafaqi
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