अल्फ़ाज़ के जादू से सहर-कारों ने हर वक़्त पत्थर को कभी शीशा कभी आग को शबनम नफ़रत को मोहब्बत कभी इंसान को हैवान..... हैवान बनाया जिस राह पे चलते रहे गुमराह मुसाफ़िर उन राहों को हर मोड़ पे, बे-मोड़ पे इस तरह घुमाया कि जैसे ख़लाओं में सभी घूम रहे हों दीवानों की मानिंद गर्दिश ने उन्हें और भी दीवाना बनाया दीवानों के क़दमों में ये लटकी हुई ज़ंजीर अल्फ़ाज़ की अब चीख़ रही है अल्फ़ाज़ पे दीवाने भरोसा नहीं करते
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है
Sohaib Mugheera Siddiqi
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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम
Tehzeeb Hafi
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नद्दियाँ मेरे क़दमों के नीचे से बहती चली जा रही हैं पहाड़ मेरे घुटनों और दरख़्त मेरे रोंगटों पर रश्क कर रहे हैं फैली हुई ज़मीन पर मैं कितना ऊँचा हो गया हूँ चाँद मेरे माथे पर है और सूरज हाथों का खिलौना है ख़ुदा मेरी खोपड़ी के अंदर चमगादड़ की तरह फड़फड़ा रहा है समुंदर मेरा पाँव चूम रहे हैं और तहज़ीबें तेज़-ओ-तुंद हवाओं की तरह सनसनाहट पैदा कर रही हैं कि मैं ज़मीन को हाथ में ले कर इस तरह उछाल सकता हूँ जैसे बच्चे गेंद उछाला करते हैं हज़ारों बरस से मैं ने यही ख़्वाब देखा था कि मैं ख़ुदा हो जाता अब मुझे ख़ुदा रहना भी गवारा नहीं लोगों ने मेरे क़दमों पे सर रख दिए हैं लेकिन मेरा सर जो अब एक बड़ा सा बोझ बन गया है इसे मैं कहाँ रक्खूँ जन्नत मेरे दाहने हाथ में है और दोज़ख़ बाएँ हाथ में और सर पर नूर का ताज है फ़रिश्ते मेरे चारों तरफ़ हैं लेकिन अब मैं क्या करूँँ मुझे तो डर लगता है कि अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ
Paigham Aafaqi
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ज़मीं पहले ऐसी कभी भी न थी पाँव मिट्टी पे होते थे नज़रें उफ़ुक़ पर हमें अपने बारे में मालूम होता था हम कौन हैं और क्या कर रहे हैं कहाँ जा रहे हैं मगर आज आलम ये है पाँव रुकते नहीं आँख खुलती नहीं अजनबी रास्तों पर मैं बढ़ता चला जा रहा हूँ
Paigham Aafaqi
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ज़ख़्मों के अम्बार, दर-ओ-दीवार भी सूने लगते हैं ख़ुशियों के दरिया में इतनी चोट लगी कि अब इस में चलते रहना दुश्वार हुआ सड़कों पर चलते फिरते शादाब से चेहरे सूख गए वो मौसम जिस को आना था, वो आ भी गया और छा भी गया अश्जार के नीले गोशों से अब ज़हर सा रिसता रहता है गुलज़ार ख़िज़ाँ के शोलों में हर लम्हा सुलगता रहता है इस ख़्वाब-ए-परेशाँ में कब तक इस रूह-ए-अज़िय्यत-ख़ूर्दा को तुम क़ैद रखोगे छोड़ भी दो! इस रूह-ए-अज़िय्यत-ख़ूर्दा को
Paigham Aafaqi
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हम वहाँ पे बैठे थे ब'अद में हुआ मालूम मैं वहाँ अकेला था भूत मैं ने देखे थे ख़ौफ़ से मैं लर्ज़ा था और आज तक तब से दिल मिरा धड़कता है जब भी कोई देता है दिल के पर्दे पर दस्तक मुझ को ऐसा लगता है ये हवा का झोंका था हम तो जाने वाले थे एक साथ ही लेकिन जब वहाँ पे पहुँचे हम मैं वहाँ अकेला था दूर दूर तक कोई साया तक नहीं पाया इक अजीब आलम था इक अजीब धोका था
Paigham Aafaqi
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कैसे खींचूँ तिरी तस्वीर तू गुम है अब तक तुझ को ऐ जान-ए-जहाँ मैं ने तो देखा भी नहीं जब कभी अब्र शब-ए-मह में उड़ा जाता है आबशारों से सदा आती है छन-छन के कहीं या कभी शाम की तारीकी में तंहाई में जब कभी जल्वा झलकता है तिरी यादों का मैं सजाता हूँ ख़यालों में हसीं ख़्वाब कोई सामने आती है दो पल के लिए तू ऐ दोस्त और ऐ पर्दा-नशीं तेरा जो चिलमन है हसीं मैं बढ़ाता हूँ क़दम उस को हटाने के लिए ना-गहाँ दूर से आवाज़ कोई आती है काँप जाता है, धड़कता है मेरा शीशा-ए-दिल और फिर धुँदली फ़ज़ाओं में तू खो जाती है देखता हूँ जो मैं मुड़ कर कि पस-ए-पुश्त है कौन यास के बहर-ए-सियह-पोश पे रक़्साँ रक़्साँ ज़हर-आलूद तबस्सुम की कटारें ले कर कोई लहराता हुआ साया नज़र आता है
Paigham Aafaqi
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