ख़्वाब ही तो मिले हैं हमें रोटी के ख़्वाब ता'लीम के ख़्वाब हुक्मरानों ने दिखाए आज़ादी के बा'द नई तंज़ीम के ख़्वाब पैंसठ साल के बा'द भी हम करते हैं उन की क़दम-बोसी हुक्मरानों ने क्या घोल कर दिए हैं इस यक़ीं के ख़्वाब ना सड़क ना बिजली ना पानी ना रोज़गार है मुयस्सर मुल्क के इक्कीसवीं सदी में पहुँचने के ये हसीन से ख़्वाब मत आवाज़ उठा मत माँग इंसाफ़ जरा सा डर प्यारे वर्ना तू देखेगा हवालात में बैठ के नंगी ज़मीन पे ख़्वाब आँखों में भर ले हक़ीक़त के काँच के टुकड़े ताकि खुली रहें जागते हुए तय करें हम ख़ुद के लिए बेहतरीन से ख़्वाब
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई
Kaifi Azmi
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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं
Tehzeeb Hafi
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फिर वही माहौल वही शोर-शराबा वही कुछ नए पुराने चेहरों का बोल-बाला फिर से सज गई तब्दीलियों की मंडियाँ पर अस्ल में कुछ नहीं बदलने वाला फिर चीख़ते फिर रहे बद-हवा से चेहरे फिर रचे जानें लगें हैं षड्यंत्र गहरे फिर से गूँजने लगें हैं फ़ज़ाओं में नारे पिछलग्गू बन गए हैं कुछ भूक के मारे फिर से ये बताई जाने लगी बदलाव की बातें फिर से कुर्सी क़ब्ज़ाने को होने लगीं हैं घातें फिर से आ गया है चुनाव का मौसम पांच-साला पर अस्ल में कुछ नहीं बदलने वाला कुछ आ जाएँगे चेहरे नए पुराने बन के रहनुमा लग जाएँगे देश को खाने फिर शुरूअ' होगा आम आदमी की तक़दीर से खेल फिर भेजा जाएगा कुछ हारे हुओं को जेल फिर से न्याय का ढोंग रचाया जाएगा आदमी को रोटी के वा'दे से बहलाया जाएगा फिर से होगा लूट-खसूट का नंगा नाच फिर झूठ को बताया जाएगा साँच मुझे जलाएगी मेरे अंदर की आँच और टूटते सपने चुभेंगे बन के काँच फिर से ज़िंदगी बुनने लगेगी मकड़-जाला मैं जानता हूँ कि कुछ नहीं बदलने वाला
Madhav Awana
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नाम बे-शक आम आदमी हो पर मैं तो मसीहा हूँ काँधे पर अपने करमों की सलीब दूर से तमाशाई मेरे हबीब मेरे रिश्ते मेरे फ़र्ज़ मेरा बीते वक़्त की परछाइयाँ सब मुझ पर कोड़े बरसाते ले जा रहें हैं अजनबी से मक़ाम पर लानतें बरसाते मेरे नाम पर मुझे रोज़ धक्कियाते और इस पर मजबूरी कि मुझे ख़ामोश रहना है सब चुप-चाप सहना है कोई न माने की मैं क्या हूँ पर मैं भी मसीहा हूँ
Madhav Awana
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मत शिकायत करो कि सरकार सो रही है ज़बाँ पे लगाम रखो कि सरकार सो रही है महँगाई ने बे-शक जीना मुहाल किया है दिल की दिल में रखो कि सरकार सो रही है मत लगाओ नारे न उतरो सड़क पर जेल जाओगे पिटोगे, डरो कि सरकार सो रही है रोज़ दाम बढ़ाती है शायद हुक्म मिला है कहीं से जल्दी जेब ढीली करो कि सरकार सो रही है ये शाह ख़र्च है कि हुकूमत है इन की आम आदमी हो सड़-सड़ मरो कि सरकार सो रही है क़त्ल-ओ-ग़ारत हो कि इस्मतें लुटें रोज़ाना अपनी जाँ की ख़ैर करो कि सरकार सो रही है
Madhav Awana
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मैं ने कहा ये मुल्क एक है तो सब के लिए एक सा हो क़ानून तो उन्होंने कहा कि मैं फिरका-परस्त की तरह बोलता हूँ मैं ने कहा कि मंदिर मस्जिद से ज़ियादा ज़रूरी है ता'लीम हर इंसान को और हर पेट को रोटी तो उन्होंने कहा कि मैं नास्तिक सा ईश्वर को ज़रूरत में तोलता हूँ मैं ने कहा कि तुम हम ने चुने हो तो हमारा विकास करो न सिर्फ़ अपनी तिजोरियाँ भरो तो उन्होंने कहा कि मैं बे-वज्ह राज़ खोलता हूँ मैं ने कहा सारा मुल्क एक है बस कुछ दिन में बदल देंगे मिल कर हम सारा निज़ाम वो कुछ नहीं बोले अब बस हँसते रहे मेरी बात और मेरे ख़यालात पर अब वो सब ज़ोर से हँस रहे है और मेरे पाँव जैसे धरती में धँस रहे हैं मैं जानता हूँ कि वो सारे मुल्क पर हँस रहे हैं
Madhav Awana
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ऊँची ऊँची इमारतों में मेरे हिस्से का आसमान लापता मसरूफ़ से इस शहर में जिस्म तो हैं इंसान लापता सुनते थे कभी मिला करते थे जहाँ दिल के बदले दिल तेरे इस शहर में अब इश्क़ की है वो दुकान लापता इस शहर में बुत-कदे भी हैं और मस्जिदें भी तमाम इंसान की फ़ितरत देख कर हुए हैं भगवान लापता वाह री जम्हूरियत हम जिन्हें सौंपते हैं मुल्क अपना उन में अक़्ल है होशियारी है ताक़त है बस ईमान लापता न जाने कौन सी बिजली गिरी कि उड़ना भूल गया मेरे दिल के अरमानों के पर तो हैं पर उड़ान लापता
Madhav Awana
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