nazmKuch Alfaaz

मत शिकायत करो कि सरकार सो रही है ज़बाँ पे लगाम रखो कि सरकार सो रही है महँगाई ने बे-शक जीना मुहाल किया है दिल की दिल में रखो कि सरकार सो रही है मत लगाओ नारे न उतरो सड़क पर जेल जाओगे पिटोगे, डरो कि सरकार सो रही है रोज़ दाम बढ़ाती है शायद हुक्म मिला है कहीं से जल्दी जेब ढीली करो कि सरकार सो रही है ये शाह ख़र्च है कि हुकूमत है इन की आम आदमी हो सड़-सड़ मरो कि सरकार सो रही है क़त्ल-ओ-ग़ारत हो कि इस्मतें लुटें रोज़ाना अपनी जाँ की ख़ैर करो कि सरकार सो रही है

Related Nazm

"तुम अकेली नहीं हो सहेली" तुम अकेली नहीं हो सहेली जिसे अपने वीरान घर को सजाना था और एक शाइ'र के लफ़्ज़ों को सच मान कर उस की पूजा में दिन काटने थे तुम से पहले भी ऐसा ही एक ख़्वाब झूठी तस्सली में जाँ दे चुका है तुम्हें भी वो एक दिन कहेगा कि वो तुम से पहले किसी को ज़बाँ दे चुका है वो तो शाइ'र है और साफ़ ज़ाहिर है, शाइ'र हवा की हथेली पे लिखी हुई वो पहेली है जिस ने अबद और अज़ल के दरीचों को उलझा दिया है वो तो शाइ'र है, शाइ'र तमन्ना के सेहरा में रम करने वाला हिरन है शोब्दा शास सुब्हो की पहली किरन है, अदब गाहे उलफ़त का मेमार है और ख़ुद अपने ख़्वाबों का ग़द्दार है वो तो शाइ'र है, शाइ'र को बस फ़िक्र लोह क़लम है, उसे कोई दुख है किसी का न ग़म है, वो तो शाइ'र है, शाइ'र को क्या ख़ौफ़ मरने से? शाइ'र तो ख़ुद शाह सवार-ए-अज़ल है, उसे किस तरह टाल सकता है कोई कि वो तो अटल है, मैं उसे जानती हूँ सहेली, वो समुंदर की वो लहर है जो किनारो से वापस पलटते हुए मेरी खुरदरी एड़ियों पे लगी रेत भी और मुझे भी बहा ले गया वो मेरे जंगलों के दरख़्तों पे बैठी हुयी शहद की मक्खियाँ भी उड़ा ले गया उस ने मेरे बदन को छुआ और मेरी हड्डियों से वो नज़् में क़सीदी जिन्हें पढ़के मैं काँप उठती हूँ और सोचती हूँ कि ये मसला दिलबरी का नहीं ख़ुदा की क़सम खा के कहती हूँ, वो जो भी कहता रहे वो किसी का नहीं सहेली मेरी बात मानो, तुम उसे जानती ही नहीं, वो ख़ुदा-ए-सिपाह-ए-सुख़न है और तुम एक पत्थर पे नाखुन से लिखी हुई, उसी की ही एक नज़्म

Tehzeeb Hafi

41 likes

क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!

Raghav Ramkaran

42 likes

ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो कि जैसे सच-मुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही हो ये जिस्म-ए-नाज़ुक, ये नर्म बाहें, हसीन गर्दन, सिडौल बाज़ू शगुफ़्ता चेहरा, सलोनी रंगत, घनेरा जूड़ा, सियाह गेसू नशीली आँखें, रसीली चितवन, दराज़ पलकें, महीन अबरू तमाम शोख़ी, तमाम बिजली, तमाम मस्ती, तमाम जादू हज़ारों जादू जगा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो गुलाबी लब, मुस्कुराते आरिज़, जबीं कुशादा, बुलंद क़ामत निगाह में बिजलियों की झिल-मिल, अदाओं में शबनमी लताफ़त धड़कता सीना, महकती साँसें, नवा में रस, अँखड़ियों में अमृत हमा हलावत, हमा मलाहत, हमा तरन्नुम, हमा नज़ाकत लचक लचक गुनगुना रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो तो क्या मुझे तुम जला ही लोगी गले से अपने लगा ही लोगी जो फूल जूड़े से गिर पड़ा है तड़प के उस को उठा ही लोगी भड़कते शोलों, कड़कती बिजली से मेरा ख़िर्मन बचा ही लोगी घनेरी ज़ुल्फ़ों की छाँव में मुस्कुरा के मुझ को छुपा ही लोगी कि आज तक आज़मा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो नहीं मोहब्बत की कोई क़ीमत जो कोई क़ीमत अदा करोगी वफ़ा की फ़ुर्सत न देगी दुनिया हज़ार अज़्म-ए-वफ़ा करोगी मुझे बहलने दो रंज-ओ-ग़म से सहारे कब तक दिया करोगी जुनूँ को इतना न गुदगुदाओ, पकड़ लूँ दामन तो क्या करोगी क़रीब बढ़ती ही आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो

Kaifi Azmi

37 likes

"रायगानी-2" जो बात गिनती के कुछ दिनों से शुरू थी वो साल-हा-साल तक चली है कई ज़मानों में बँट गई है मैं इन ज़मानों में लम्हा लम्हा तुम्हारी नज़रों के बिन रहा हूँ मैं अब तलक भी तुम्हारे जाने का बाक़ी नुक़सान गिन रहा हूँ मुझे ज़माना ये कह रहा था कि राइगानी मुबालगा है भला तुम्हारी जुदाई का दुख ज़माँ मकाँ को हिला रहा है भला रिलेटिविटी की साइंस किसी के मुड़ने से मुंसलिक है इन्हें बताओ तुम्हारे जाने का दुख उठा कर फ़क़त अकेला वो मैं नहीं था जो ज़र्रा ज़र्रा बिखर गया था तुम्हारे जाने के कुछ दिनों में हमारा हॉकिंग भी मर गया था और उस की थ्योरी के काले गड्ढे जिन्हें हमेशा तुम्हारी आँखों में देखना था वो मेरे चेहरे पे पड़ गए हैं, वो मेरी आँखों में गड़ गए हैं तुम्हारे जाने के बा'द सब कुछ ही एक अस्सी के ज़ाविए पर पलट गया है कि मेरा होना तुम्हारे होने से मुंसलिक था तुम्हारी आँखों की रौशनी थी तो मैं भी दुनिया में हो रहा था तुम्हारे लहजे के सुर मिले थे तो मैं बना था तुम्हारे हाथों का लम्स हाथों को मिल रहा था तो देखता था हमारे हाथों में एटमों की दफ़ा की कुव्वत कशिश में कैसे बदल रही है पर अब तुम्हारी नज़र कहीं है तुम्हारा लहजा भी अब नहीं है तो तुम बताओ मैं किस तरीक़े से अपनी हस्ती को नैस्ती से जुदा करूँँगा मैं दंग आँखों से सारी दुनिया को देखता हूँ और अपने होने की कोई इल्लत तलाशता हूँ अजीब तरह का बे-निशान बे-मक़ाम दुख है समझने वाले समझ गए थे ये राइगानी है राइगानी तमाम सदियों का ख़ाम दुख है मैं अब हक़ीक़त समझ रहा हूँ तमाम दुख था तमाम दुख है तुम्हें बताऊँ किसी के होने का कोई मक़सद कोई मआ'नी कहीं नहीं है अगर तो नीत्शे नहीं मरा है तो उस से पूछा क्या करेंगे ज़मीं पे रह के पले बढ़ेंगे बका की ख़ातिर लड़े मरेंगे फिर अपने जैसे कई जनेंगे और इस जहाँ से निकल पड़ेंगे जिन्हे जनेंगे वो सब के सब भी यही करेंगे पले बढ़ेंगे लड़े मरेंगे फिर उन के बच्चे और उन के बच्चे ये क्या तमाशा-ए-हा-ओ-हू है ये ज़िंदगी है तो आख थू है

Sohaib Mugheera Siddiqi

23 likes

एक सहेली की नसीहत तुम अकेली नहीं हो सहेली जिसे अपने वीरान घर को सजाना था और एक शाइ'र के लफ़्ज़ों को सच मानकर उस की पूजा में दिन काटने थे तुम सेे पहले भी ऐसा ही इक ख़्वाब, झूटी तसल्ली में जाँ दे चुका है तुम्हें भी वो एक दिन कहेगा कि वो, तुम सेे पहले किसी को ज़बाँ दे चुका है वो तो शाइ'र है और साफ़ ज़ाहिर है शाइ'र हवा की हथेली पे लिक्खी हुई वो पहेली है जिस ने अबद और अज़ल के दरीचों को उलझा दिया है वो तो शाइ'र है, शाइ'र तमन्ना के सहरा में रमन करने वाला हिरन है शोबदा साज़ सुब्ह की पहली किरन है अदबगाह-ए-उल्फ़त का मेमार है वो तो शाइ'र है शाइ'र को बस फ़िक्र-ए-लौह-ए-कलम है उसे कोई दुख है किसी का ना ग़म है वो तो शाइ'र है शाइ'र को क्या ख़ौफ़ मरने से शाइ'र तो ख़ुद शहसवार-ए-अजल है उसे किस तरह टाल सकता है कोई, के वो तो अटल है मैं उसे जानती हूँ, वो समुंदर की वो लहर है जो किनारे से वापस पलटते हुए मेरी खुरदुरी एड़ियों पर लगी रेत भी और मुझे भी बहा ले गया वो मेरे जंगलों के दरख़्तों पे बैठी हुई शहद की मक्खियाँ भी उड़ा ले गया उस ने मेरे बदन को छुआ और मेरी हड्डियों से वो नज़्में कशीदी जिन्हें पढ़ के मैं काँप उठती हूँ और सोचती हूँ कि ये मसअला दिलबरी का नहीं ख़ुदा की क़सम खा के कहती हूँ वो जो भी कहता रहे वो किसी का नहीं सहेली तुम मेरी बात मानो तुम उसे जानती ही नहीं वो ख़ुदा-ए-सिपाह-ए-सुख़न है और तुम एक पत्थर पे नाखुन से लिखी हुई उसी की ही एक नज़्म हो

Tehzeeb Hafi

40 likes

More from Madhav Awana

ऊँची ऊँची इमारतों में मेरे हिस्से का आसमान लापता मसरूफ़ से इस शहर में जिस्म तो हैं इंसान लापता सुनते थे कभी मिला करते थे जहाँ दिल के बदले दिल तेरे इस शहर में अब इश्क़ की है वो दुकान लापता इस शहर में बुत-कदे भी हैं और मस्जिदें भी तमाम इंसान की फ़ितरत देख कर हुए हैं भगवान लापता वाह री जम्हूरियत हम जिन्हें सौंपते हैं मुल्क अपना उन में अक़्ल है होशियारी है ताक़त है बस ईमान लापता न जाने कौन सी बिजली गिरी कि उड़ना भूल गया मेरे दिल के अरमानों के पर तो हैं पर उड़ान लापता

Madhav Awana

0 likes

नाम बे-शक आम आदमी हो पर मैं तो मसीहा हूँ काँधे पर अपने करमों की सलीब दूर से तमाशाई मेरे हबीब मेरे रिश्ते मेरे फ़र्ज़ मेरा बीते वक़्त की परछाइयाँ सब मुझ पर कोड़े बरसाते ले जा रहें हैं अजनबी से मक़ाम पर लानतें बरसाते मेरे नाम पर मुझे रोज़ धक्कियाते और इस पर मजबूरी कि मुझे ख़ामोश रहना है सब चुप-चाप सहना है कोई न माने की मैं क्या हूँ पर मैं भी मसीहा हूँ

Madhav Awana

0 likes

फिर वही माहौल वही शोर-शराबा वही कुछ नए पुराने चेहरों का बोल-बाला फिर से सज गई तब्दीलियों की मंडियाँ पर अस्ल में कुछ नहीं बदलने वाला फिर चीख़ते फिर रहे बद-हवा से चेहरे फिर रचे जानें लगें हैं षड्यंत्र गहरे फिर से गूँजने लगें हैं फ़ज़ाओं में नारे पिछलग्गू बन गए हैं कुछ भूक के मारे फिर से ये बताई जाने लगी बदलाव की बातें फिर से कुर्सी क़ब्ज़ाने को होने लगीं हैं घातें फिर से आ गया है चुनाव का मौसम पांच-साला पर अस्ल में कुछ नहीं बदलने वाला कुछ आ जाएँगे चेहरे नए पुराने बन के रहनुमा लग जाएँगे देश को खाने फिर शुरूअ' होगा आम आदमी की तक़दीर से खेल फिर भेजा जाएगा कुछ हारे हुओं को जेल फिर से न्याय का ढोंग रचाया जाएगा आदमी को रोटी के वा'दे से बहलाया जाएगा फिर से होगा लूट-खसूट का नंगा नाच फिर झूठ को बताया जाएगा साँच मुझे जलाएगी मेरे अंदर की आँच और टूटते सपने चुभेंगे बन के काँच फिर से ज़िंदगी बुनने लगेगी मकड़-जाला मैं जानता हूँ कि कुछ नहीं बदलने वाला

Madhav Awana

0 likes

बड़ा आसान है मेरे लिए मैं आज़ादी के गीत गाऊँ और सड़कों पर जलसे सजा इंक़लाब के नारे लगाऊँ बड़ा आसान है मेरे लिए मैं किसी पर ज़ुल्म होता पाऊँ तो आँखों वाला अंधा हो जाऊँ बड़ा आसान है मेरे लिए सियासतदानों पर झल्लाऊँ और कुछ करने के नाम पर अपनी मजबूरियाँ गिनाऊँ बड़ा आसान है मेरे लिए कि मैं ज़िंदा लाश हो जाऊँ ख़ुद डरूँ और परिवार को डराऊँ। पर मेरे भीतर जो है एक रूह सी जब पूछती है मुझ से कहाँ जाऊँ ज़िंदा लाश होना भी आसान नहीं मैं इसे कैसे समझाऊँ

Madhav Awana

0 likes

ख़्वाब ही तो मिले हैं हमें रोटी के ख़्वाब ता'लीम के ख़्वाब हुक्मरानों ने दिखाए आज़ादी के बा'द नई तंज़ीम के ख़्वाब पैंसठ साल के बा'द भी हम करते हैं उन की क़दम-बोसी हुक्मरानों ने क्या घोल कर दिए हैं इस यक़ीं के ख़्वाब ना सड़क ना बिजली ना पानी ना रोज़गार है मुयस्सर मुल्क के इक्कीसवीं सदी में पहुँचने के ये हसीन से ख़्वाब मत आवाज़ उठा मत माँग इंसाफ़ जरा सा डर प्यारे वर्ना तू देखेगा हवालात में बैठ के नंगी ज़मीन पे ख़्वाब आँखों में भर ले हक़ीक़त के काँच के टुकड़े ताकि खुली रहें जागते हुए तय करें हम ख़ुद के लिए बेहतरीन से ख़्वाब

Madhav Awana

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Madhav Awana.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Madhav Awana's nazm.