nazmKuch Alfaaz

"अलामत-ए-इश्क़" दबी दबी सी हँसी पे थी होंठो की जुंबिश या थरथराते लबों पे खिला तबस्सुम था गुदाज़ सुर्ख़ शफ़क़ ज़र्द-पोश गुल-दोज़ी कभी कभी तो लगे इश्क़ की अलामत है झुकी झुकी सी नज़र से ये दिल चुराना था या शर्म से यूँँ निगाहें ज़रा तग़ाफ़ुल थे नज़र मिलाना भी तेरा नज़र चुराना भी कभी कभी तो लगे इश्क़ की अलामत है तुनुक-मिज़ाज सी साँसें ख़फ़ा ख़फ़ा हो के ये ख़त भी पढ़ रहे होंगे तुनुक-मिज़ाजी में तो क्या कहोगे अगर मैं कहूँ कि अब मुझ को कभी कभी तो लगे हाँ यही मुहब्बत है

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कमाल कर गया सावन का महीना ,वो चलती सुहानी हवा। और उस हवा में उड़ते गुलाबी दुपट्टे, और लहराते घुंगराले भूरे बालों के बीच, स झांँकता वो ख़ूब-सूरत रूहानी चेहरा, और उस श्यामल देशी चेहरे पर, बड़ी सदाकत और नज़ाकत के साथ सजे, उन मखमली गुलाबी होंठों का, हौले से ये कहना... अजी! सुनते हो! कमाल कर गया

Alankrat Srivastava

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"नाम तुम्हारा" देखो मैं ने नज़्म लिखी है इक छोटे सादे काग़ज़ पर एक हँसी होंठों पर ले कर तुम इस को चुपके से पढ़ना लोग अगर कुछ पूछें तुम सेे चुप ही रहना कुछ मत कहना ख़्वाब मेरे कुछ लिक्खे होंगे कुछ ख़ुशियों की बातें होंगी अल साए से दिन कुछ होंगे कुछ सहमी सी रातें होंगी एक नदी भी बहती होगी कुछ परियाँ भी उड़ती होंगी चाँद वहीं पर बैठा होगा थक कर घर को लौटा होगा फूल खिले होंगे काग़ज़ पर बरसातों का मौसम होगा तितली होगी पंछी होंगे इठलाता सा सावन होगा एक अँधेरे से जंगल में सावन की बारिश में खिलते नील कँवल को चुनने जाते दिख जाएँगे तुम को बच्चे दूर कहीं इक बस्ती होगी रात गए देखोगे उस में एक दिया जलता सहमा सा औ उस में जलती उम्मीदें उस छोटे काग़ज़ पर मैं ने सारी दुनिया लिख डाली है सारी ख़ुशियाँ भी लिक्खी हैं और ग़मों की हरियाली है पर्वत भी है झरना भी है जीवन है औ मरना भी है और ख़ुदा भी तो लिक्खा है वाँ तो कोने में रक्खा है तुम भी हैराँ सोच रही हो सारी बातें खोज रही हो मैं तुम को पागल लगता हूँ सब लिक्खा है सच कहता हूँ कुछ ही हर्फ़ लिखे थे मैं ने इन में सब दुनिया सिमटी है ग़ौर करो तुम फिर से देखो नाम तुम्हारा लिक्खा है बस

Ashutosh Kumar "Baagi"

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"ज़िंदगी उस के साथ" हम उस के साथ जीना चाहते हैं हमें उस के साथ ज़िंदगी जीना है हम उस के साथ रहना चाहते हैं हमें उस की यादों में जीना है हम उस के साथ खोना चाहते हैं हमें उस के ख़्वाबों में खोना है हम उस के साथ बैठना चाहते हैं हमें उस की आँखों में डूबना है हम उस के साथ खेलना चाहते हैं हमें उस की ज़ुल्फ़ों से खेलना है हम उस के बालों को चेहरे से हटाना चाहते हैं हमें उस के गर्दन के तिल को देखना है हम उस के साथ मुस्कुराना चाहते हैं हमें उस का चेहरा देख कर मुस्कुराना है हम उस के साथ शादी करना चाहते हैं हमें उस को अपनी दुल्हन बनाना है हम उस के साथ खाना बनाना चाहते हैं हमें उस के हाथों से बना खाना है हम उस के साथ खाना चाहते हैं हमें उस के नाज़ुक हाथों से खाना है हम उस के साथ शा में बिताना चाहते हैं हमें उस के साथ चाँद को देखना है हम उस के साथ चलना चाहते हैं हमें उस का हाथ पकड़ कर चलना है हम उस के होंठों को चूम कर जाना चाहते हैं हमें उस के हाथों से मीठा खाके जाना है हम उस के साथ सोना चाहते हैं हमें उस की बाँहों में सोना है हम उस के साथ उठना चाहते हैं हमें उस का चेहरे देख कर उठना है हम उस के साथ चाय पीना चाहते हैं हमें उस के गाल को चूम कर पीना है हम उस के साथ कुछ ख़रीदना चाहते हैं हमें उस के लिए झुमका पायल साड़ी सब ख़रीदना है हम उस के साथ चुप रहना चाहते हैं हमें उस की गोद में सर रख कर दुख बाँटना है हम उस के साथ गले लगना चाहते हैं हमें उस के आते ही उस का माथा चूमना है हम उस के साथ घंटो बातें करना चाहते हैं हमें उस को गोद में बिठा कर उस की बातें सुनना है हम उस के साथ तैयार होना चाहते हैं हमें उस को साड़ी बिंदी में देखना है हम उस सेे साथ लड़ना चाहते हैं हमें उस को परेशान कर के मनाना है हम उस के साथ नाम बनाना चाहते हैं हमें उस के नाम से अपना नाम जोड़ना है हम उस के साथ जीना चाहते हैं हमें उस के साथ ज़िंदगी जीना है

Rohit ydv

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मुझे बहुत है के मैं भी शामिल हूँ तेरी ज़ुल्फ़ों की ज़ाइरीनों में, जो अमावस की काली रातों का रिज़्क़ बनने से बच गए, मुझे क़सम है उदास रातों में डसने वाले यतीम साँपों की ज़हर-आलूद ज़िंदगी की, तेरे छुए जिस्म बिस्तर-ए-मर्ग पर पड़े हैं, तेरे लबों की ख़फ़ीफ़ जुंबिश से ज़लज़लों ने ज़मीं का ज़ेवर उतार फेंका, तेरी दरख्शाँ हथेलियों पर बदलते मौसम के जायकों से पता चला है के इस तअल्लुक़ की सर ज़मीं पर खीजा बहुत देर तक रहेगी, मैं जानता हूँ के मैं ने ममनू शाहों से हो के ऐसे बहुत से बाबों की सैर की है जहाँ से तू रोकती बहुत थी, ये हाथ जिन को तेरे बदन की चमक ने बरसो निढ़ाल रक्खा, हराम है के इन्होंने शाखों से फूल तोड़े हो, या किसी भी पेड़ के लचकदार बाजुओं से किसी भी मौसम का फ़ल उतारा हो, और अगर ऐसा हो भी जाता तो फिर भी तेरी शरिष्त में इंतकाम कब है, अभी मोहब्बत की सुब्ह रौशन है शाम कब है, ये दिल के शीशे पर पड़ने वाली मलाल की धूल साफ़ कर दे, मैं तुझ से छुप कर अगर किसी से मिला तो मुझे मुआ'फ़ कर दे,

Tehzeeb Hafi

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"कोई नहीं समझता" कोई बात नहीं समझता कोई जज़्बात नहीं समझता कोई समझ लेता है ख़्वाबों को पर कोई रात नहीं समझता कोई दूरी निभाना जानता है पर कोई साथ नहीं समझता कोई बग़ैर देखे चुन लेता है साथी पर कोई ज़ात-पात नहीं समझता कोई जान लेता है झूठी हँसी पर कोई हालात नहीं समझता कोई बात नहीं समझता तो कोई जज़्बात नहीं समझता

ZafarAli Memon

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