कमाल कर गया सावन का महीना ,वो चलती सुहानी हवा। और उस हवा में उड़ते गुलाबी दुपट्टे, और लहराते घुंगराले भूरे बालों के बीच, स झांँकता वो ख़ूब-सूरत रूहानी चेहरा, और उस श्यामल देशी चेहरे पर, बड़ी सदाकत और नज़ाकत के साथ सजे, उन मखमली गुलाबी होंठों का, हौले से ये कहना... अजी! सुनते हो! कमाल कर गया
Related Nazm
"ख़ुदा नाराज़" कमाल है कमाल है मज़हब की बात पर क्यूँँ उठ रहे सवाल है बेहाल है बेहाल है सब मकड़ियों के जाल है दुनिया में रहना भी अब बहुत बड़ा जंजाल है बवाल है बवाल है गुज़र रही जो ज़िंदगी ये दिन है या कोई साल है मुझे आज की फ़िक्र तो है मुझे कल का भी ख़याल है नक़ाब है नक़ाब है हर चेहरे पर नक़ाब है जो शख़्स की ये ज़ात है वो साँप का भी बाप है जो दो-रुख़ा किरदार है ग़ज़ब है बे-मिसाल है दलाल है दलाल है सब सोच के दलाल है गुनाह भी उस का माफ़ है सब पैसे की ये चाल है क्या काल है क्या काल है ख़ुदा भी जो नाराज़ है 'इबादतों में मिल रहे जल्दबाज़ी के आ'माल है ख़ुद सोचना अब तो तू ज़रा मज़हब की बात पर क्यूँँ उठ रहे सवाल है कमाल है कमाल है
ZafarAli Memon
17 likes
"नसरी नज़्म" नस्र अब्बा नज़्म अमाँ दोनों को इनकार है ये जो नसरी नज़्म है ये किस की पैदा-वार है सिर्फ़ लफ्फ़ाज़ी पे मब्नी है ये तजरीदी कलाम जिस में अन्क़ा हैं मआ'नी लफ़्ज़ पर्दा-दार है नस्र है गर नस्र तो वो नज़्म हो सकती नहीं नज़्म जो हो नस्र की मानिंद वो बे-कार है क़ाफ़िए की कोई पाबंदी न है क़ैद-ए-रदीफ़ बे-दर-ओ-दीवार का ये घर भी क्या पुरकार है बहरस आज़ाद क़ैद-ए-वज़न से है बे-नियाज़ वाह क्या मदर पिदर आज़ाद ये दिलदार है मर्तबे में 'मीर' ओ 'मोमिन' से है हर कोई बुलंद इन में हर बे-बहर ग़ालिब से बड़ा फ़नकार है जिस के चमचे जितने ज़्यादा हों वो उतना ही अज़ीम आज कल मिसरा उठाना एक कारोबार है दाद सिर्फ़ अपनों को देते हैं गिरोह-अंदर-गिरोह उन के टोले से जो बाहर हो गया मुरदार है बन गया उस्ताद-ओ-अल्लामा यहाँ हर बे-शुऊर कोर-चश्म अहल-ए-नज़र होने का दावेदार है शा'इरी जुज़-शाइरी है है ज़रा मेहनत-तलब और मेहनत ही वो शय है जिस से उन को आर है पाप-म्यूज़िक के लिए मौज़ूँ है नसरी शा'इरी हर रिवायत से बग़ावत की ये दावेदार है तब्अ-ए-मौज़ूँ गर न बख़्शी हो ख़ुदा ने आप को शा'इरी क्यूँँ कीजे आख़िर क्या ख़ुदा की मार है दाद देना ऐसी नज़्मों को बड़ी बे-दाद है जो न समझा और कहे समझा बड़ा मक्कार है
Aasi Rizvi
13 likes
दिसम्बर का महीना और दिल्ली की सर्दी सितारों की झिलमिलाती झुरमुट से परे आसमान के एक सुनसान गोशे में पूनम का ठिठुरता हुआ कोई चाँद जैसे बादलों में खाता है मुतवातिर हचकोले हौले हौले तन्हा मुसाफ़िर और दूर तक कोहरे की चादर में लिपटी बल खाती सड़कें धुंद की ग़ुबार में खोया हुआ इंडिया गेट ठण्ड में ठोकरें खाता मुसाफ़िर ख़ुश नसीब है बादलों में घुस जाता है चाँद मेरी क्रिसमस की रौनक़ें फैली हैं तमाम सितारों से रौशन सजे धजे बाज़ार लज़ीज़ खानों की ख़ुशबुएँ जहाँ फैली हैं हर-सू बाज़ार की गर्म फ़ज़ाओं में मय की सरमस्ती में डूबा हुआ है पूरे शहर का शबाब तन्हा मुसाफ़िर की चंद रोज़ा मसाफ़त भी क्या शय है यारो! हम-वतनों से दूर अपनों से दूर जमुना तट पर जैसे बिन माँझी के नाव बोट क्लब के सर्द पानी में जैसे तैरता रुकता हुआ कोई तन्हा हुबाब तन्हा मुसाफ़िर सोचता है कोई है जिस का वो हाथ थाम ले हौले हौले कोई है जो उस के साथ कुछ दौर चले हौले हौले धुँद में खोई हुई मंज़िलें तवील सड़कें और तन्हा मुसाफ़िर जैसे पूनम का ठिठुरता हुआ कोई चाँद बादलों में खाता है मुतवातिर हचकोले हौले हौले
Perwaiz Shaharyar
9 likes
लोग तो लोग हैं, अक्सर मज़ाक़ करते हैं वो अलग बात है- कुछ दरमियाँ नहीं, फिर भी हमें मालूम है तुम बे-वफ़ा नहीं, फिर भी सुना है- आजकल तुम बे-क़रार रहते हो और इतने, कि- शायद बेशुमार रहते हो सुना है- आदतन खाना भी छोड़ रक्खा है तुम ने घर से कहीं जाना भी छोड़ रक्खा है हाँ बेशक! हम को मिले एक अर्सा बीत गया हाँ मगर, अजनबी लोगों का भी भरोसा क्या! हमें मालूम है तुम बे-वफ़ा नहीं, फिर भी लोग तो लोग हैं, अक्सर मज़ाक़ करते हैं वो अक्सर तंज़ करते हैं कि इस ज़माने में तुम्हारी तरह कोई दूसरा कहाँ होगा? तुम्हारी रुख़ है, कि है चाँद जैसा नूर इस में जो तुझ पर मरते हैं उन का भी क्या क़ुसूर इस में बड़ा कम्बख़्त है, ये सबकी ख़बर रखता है ज़माना हर किसी हरकत पे नज़र रखता है. यहाँ लोगों की बातों का भरोसा तो नहीं, पर ये बात सच है बहर-हाल इस ज़माने में तुम्हारी तरह कोई दूसरा कहाँ होगा? ख़ैर, लोग तो लोग हैं, अक्सर मज़ाक़ करते हैं
Ravi Prakash
7 likes
" उस का नसीब " नसीब लिखने वाले ने क्या कमाल लिखा है ज़मीर पे मेरे धब्बा उसे रुमाल लिखा है मुरीद हूँ मैं शिक्षा का मज़ीद ज्ञान नहीं है जवाब मुश्किल हो ऐसा उसे सवाल लिखा है लपेट देती है मेरा फ़ुज़ूल बात अगर हो दिमाग़ सुंदरता में भी उसे बवाल लिखा है मुराद मेरी है उस सेे अगर विवाह अभी हो नसीब में मेरे याराँ उसे निहाल लिखा है फ़रीद है वो शुभ उस शख़्स का जवाब नहीं है हयात के रंगों में भी उसे गुलाल लिखा है
Shubham Rai 'shubh'
10 likes
More from Alankrat Srivastava
"सावन की बारिश" बचाने को सभी दानव व देवों को धरा के जीव जंतु को नदी पेडों को पर्वत को इसी सावन महीने में हलाहल था पिया शिव ने इसी बारे में फिर जब जब सती माँ सोचती होंगी तो इक दो बूंद आँसू की छलक जाती ही होंगी सो सावन की ये बारिश कुछ नहीं है बस उन्हीं के आँख से टपकी हुई आँसू की बूंदे हैं लुड़क कर जो ज़मीं पर आ गिरी हैं
Alankrat Srivastava
2 likes
क्या एक भी तुम को भाता था - २ बात बस कुछ यूँ है कि एक मुद्दत से शे'र नहीं कहा गया शे'र नहीं सुना गया बस एक ख़याल जो मन में बुन रहा था वो कुछ कुछ इस तरह था की वो ख़त जो तेरे नाम लिखे वो बातें जो तेरे हक़ में हैं वो शे'र जो तेरी खिदमत में मैं अब तक सब को सुनाता था सच-सच कहना उन में से क्या एक भी तुम को भाता था?
Alankrat Srivastava
6 likes
"तुम" मेरा दिन भी तुम्हीं हो तुम्हीं शाम भी, मेरा अल्लाह भी तुम हो तुम्हीं राम भी। तन मेरा है मगर इस में रहते हो तुम, रक्त की धमनियों में भी बहते हो तुम। दिल की धड़कन भी तुम हो तुम्हीं साँस हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत सा एहसास हो। मेरे चंचल से मन की तुम्हीं मीत हो, जो बजे है हृदय में वो संगीत हो। दिन दुनिया के इस शोर से भाग कर, दिन दुपहरी में औ रात में जाग कर। गढ़ रहा हूँ जिसे वो उपन्यास हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत सा एहसास हो।
Alankrat Srivastava
3 likes
क्या एक भी तुम को भाता था - १ हम में तो थे ऐब बहुत सो तुम को पसंद आए नहीं हम भी इतने पागल थे जो आज तलक पछताए नहीं पर वो लड़का जो कॉलेज में , तेरे पीछे पीछे रहता था वो दूजा जो प्यार से तुम को, अपनी बाबू शोना कहता था तीसरा वाला, जो तुम को अक्सर कैंटीन घुमाया करता था और चौथा जो कभी-कबार तेरा समान उठाया करता था अच्छा वो आख़िर वाला, जो घर तक छोड़ कर आता था सच-सच कहना उन में से क्या, एक भी तुम को भाता था?
Alankrat Srivastava
8 likes
"मांँ" आओ बैठो प्रेम की एक गाथा सुनानी है ये नज़्म आज की नहीं बेहद पुरानी है कि चोट लगी है मुझ को आँखों में उस के पानी है ये इश्क़ की नहीं ममता की कहानी है और मैं सलाम करता हूँ उन को, जो अपनी माँ पे मरते हैं अफ़सोस कि वैसे अब ज़रा मुश्किल से मिलते हैं पर माँ, माँ आज भी वैसे की वैसी है माँ काँटों के बीच खिले फूलों के जैसी है और उसी माँ के साए में मैं भी हूँ पला बड़ा नमन उस माँ को जिस पे कविता बना आज यूँँ खड़ा यूँँ खड़ा की लोग सुनते हैं तो नाम करते हैं ये मेरी मांँ की दुआ है कि कुछ लोग दूर से भी सलाम करते हैं
Alankrat Srivastava
4 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Alankrat Srivastava.
Similar Moods
More moods that pair well with Alankrat Srivastava's nazm.







