nazmKuch Alfaaz

क्या एक भी तुम को भाता था - १ हम में तो थे ऐब बहुत सो तुम को पसंद आए नहीं हम भी इतने पागल थे जो आज तलक पछताए नहीं पर वो लड़का जो कॉलेज में , तेरे पीछे पीछे रहता था वो दूजा जो प्यार से तुम को, अपनी बाबू शोना कहता था तीसरा वाला, जो तुम को अक्सर कैंटीन घुमाया करता था और चौथा जो कभी-कबार तेरा समान उठाया करता था अच्छा वो आख़िर वाला, जो घर तक छोड़ कर आता था सच-सच कहना उन में से क्या, एक भी तुम को भाता था?

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया

Faiz Ahmad Faiz

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.

Gulzar

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"तुम" मेरा दिन भी तुम्हीं हो तुम्हीं शाम भी, मेरा अल्लाह भी तुम हो तुम्हीं राम भी। तन मेरा है मगर इस में रहते हो तुम, रक्त की धमनियों में भी बहते हो तुम। दिल की धड़कन भी तुम हो तुम्हीं साँस हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत सा एहसास हो। मेरे चंचल से मन की तुम्हीं मीत हो, जो बजे है हृदय में वो संगीत हो। दिन दुनिया के इस शोर से भाग कर, दिन दुपहरी में औ रात में जाग कर। गढ़ रहा हूँ जिसे वो उपन्यास हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत सा एहसास हो।

Alankrat Srivastava

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क्या एक भी तुम को भाता था - २ बात बस कुछ यूँ है कि एक मुद्दत से शे'र नहीं कहा गया शे'र नहीं सुना गया बस एक ख़याल जो मन में बुन रहा था वो कुछ कुछ इस तरह था की वो ख़त जो तेरे नाम लिखे वो बातें जो तेरे हक़ में हैं वो शे'र जो तेरी खिदमत में मैं अब तक सब को सुनाता था सच-सच कहना उन में से क्या एक भी तुम को भाता था?

Alankrat Srivastava

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"सावन की बारिश" बचाने को सभी दानव व देवों को धरा के जीव जंतु को नदी पेडों को पर्वत को इसी सावन महीने में हलाहल था पिया शिव ने इसी बारे में फिर जब जब सती माँ सोचती होंगी तो इक दो बूंद आँसू की छलक जाती ही होंगी सो सावन की ये बारिश कुछ नहीं है बस उन्हीं के आँख से टपकी हुई आँसू की बूंदे हैं लुड़क कर जो ज़मीं पर आ गिरी हैं

Alankrat Srivastava

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कमाल कर गया सावन का महीना ,वो चलती सुहानी हवा। और उस हवा में उड़ते गुलाबी दुपट्टे, और लहराते घुंगराले भूरे बालों के बीच, स झांँकता वो ख़ूब-सूरत रूहानी चेहरा, और उस श्यामल देशी चेहरे पर, बड़ी सदाकत और नज़ाकत के साथ सजे, उन मखमली गुलाबी होंठों का, हौले से ये कहना... अजी! सुनते हो! कमाल कर गया

Alankrat Srivastava

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"तुम" कुछ तो कहते हैं तुम फूलों का बाग़ हो कुछ का कहना है सब सेे मधुर राग हो जो भी देखे तुम्हें वो ही प्यारा कहे कोई चंदा कहे कोई तारा कहे मेरी मानो तो इनसे कहीं ख़ास हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत सा एहसास हो

Alankrat Srivastava

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