"ज़िंदगी उस के साथ" हम उस के साथ जीना चाहते हैं हमें उस के साथ ज़िंदगी जीना है हम उस के साथ रहना चाहते हैं हमें उस की यादों में जीना है हम उस के साथ खोना चाहते हैं हमें उस के ख़्वाबों में खोना है हम उस के साथ बैठना चाहते हैं हमें उस की आँखों में डूबना है हम उस के साथ खेलना चाहते हैं हमें उस की ज़ुल्फ़ों से खेलना है हम उस के बालों को चेहरे से हटाना चाहते हैं हमें उस के गर्दन के तिल को देखना है हम उस के साथ मुस्कुराना चाहते हैं हमें उस का चेहरा देख कर मुस्कुराना है हम उस के साथ शादी करना चाहते हैं हमें उस को अपनी दुल्हन बनाना है हम उस के साथ खाना बनाना चाहते हैं हमें उस के हाथों से बना खाना है हम उस के साथ खाना चाहते हैं हमें उस के नाज़ुक हाथों से खाना है हम उस के साथ शा में बिताना चाहते हैं हमें उस के साथ चाँद को देखना है हम उस के साथ चलना चाहते हैं हमें उस का हाथ पकड़ कर चलना है हम उस के होंठों को चूम कर जाना चाहते हैं हमें उस के हाथों से मीठा खाके जाना है हम उस के साथ सोना चाहते हैं हमें उस की बाँहों में सोना है हम उस के साथ उठना चाहते हैं हमें उस का चेहरे देख कर उठना है हम उस के साथ चाय पीना चाहते हैं हमें उस के गाल को चूम कर पीना है हम उस के साथ कुछ ख़रीदना चाहते हैं हमें उस के लिए झुमका पायल साड़ी सब ख़रीदना है हम उस के साथ चुप रहना चाहते हैं हमें उस की गोद में सर रख कर दुख बाँटना है हम उस के साथ गले लगना चाहते हैं हमें उस के आते ही उस का माथा चूमना है हम उस के साथ घंटो बातें करना चाहते हैं हमें उस को गोद में बिठा कर उस की बातें सुनना है हम उस के साथ तैयार होना चाहते हैं हमें उस को साड़ी बिंदी में देखना है हम उस सेे साथ लड़ना चाहते हैं हमें उस को परेशान कर के मनाना है हम उस के साथ नाम बनाना चाहते हैं हमें उस के नाम से अपना नाम जोड़ना है हम उस के साथ जीना चाहते हैं हमें उस के साथ ज़िंदगी जीना है
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती
Abrar Kashif
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"काश" काश तुम को बता पाता तुम्हें कितना प्यार करता हूँ कितना सोचता हूँ कितना चाहता हूँ काश तुम्हें मैसेज कर सकता कॉल कर सकता तुम्हें मना पाता तुम्हारे पास आ पाता काश तुम्हें पास बुला के समझा पाता डाँट कर तुम्हें गले लगा पाता तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँभाल पाता तुम्हारे होंठों को चूम पाता काश बता पाता कितना प्यार करता हूँ कितना डरता हूँ तुम्हें खोने से कितना परेशान करती हो तुम कितना लड़ती हो तुम कितना सताती हैं तुम्हारी यादें काश बता पता कितनी ख़ूब-सूरत हो तुम तुम्हारे गाल पर वो तिल तुम्हारे गर्दन का वो तिल तुम्हारे काले बाल तुम्हारी काली आँखें तुम्हारी लंबी ज़ुल्फ़ें काश तुम्हें बता पता कितना प्यार करता हूँ तुम्हें
Rohit ydv
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नज़्म: उस की याद मेरा कमरा उस की याद दिलाता है वो जब भी आती है पहले गले लगाती है मैं बस उस का इंतिज़ार करता हूँ वो है कि इतनी दूर से आती है मैं बस उस को देखता रहता हूँ वो मुझ को सब कुछ समझाती है मैं बस उस की हाँ में हाँ मिलाता हूँ वो मुझ को सब कुछ बताती है मैं तो बस उस को छूना चाहता हूँ वो मुझ को बोसा देकर जाती है मैं तो बस उस को जाते हुए देखता हूँ वो है कि उसे तो जाना भी होता है मैं हूँ कि मैं कुछ नहीं करता हूँ वो है कि उसे सब कुछ करना होता है मुझे तो बस नाराज़ होना होता है उसे तो रिश्ता भी बचाना होता है मेरा कमरा उस की याद दिलाता है वो जब भी आती है पहले गले लगाती है
Rohit ydv
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“हमारा मिलना” जब तुम मुझ सेे मिलने आती थी मैं कितना बेसब्री से इंतिज़ार करता था जब तुम मेरे पास आ जाती थी मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगता था जब तुम पास मेरे बैठा करती थी मैं बस तुम को ही देखता रहता था तुम धी में से मुस्कराया करती थी तुम उस वक़्त बहुत ही प्यारी लगती थी ऐसा लगता था ये लम्हा यहीं थम जाए मैं धीरे से तुम सेे बोला करता था तुम प्यार से जवाब दिया करती थी जब मैं नाराज़ हो जाता था तब तुम मुझे प्यार से मनाती थी मैं तुम सेे न जाने क्या क्या पूछता था तुम सब कुछ प्यार से समझाती थी तुम कितने शांत सी बैठा करती थी मैं कितना परेशान किया करता था जब तुम प्यार से गाल को चूमती थी मुझे बहुत बहुत बहुत अच्छा लगता था तुम बस एक घंटे के लिए आया करती थी मैं तुम्हारे होंठों को कितनी बार चूमता था तुम कभी कभी मेरी गोद में बैठा करती थी मेरा मोबाइल बच्चों की तरह चलाया करती थी जब तुम घर को वापस जाया करती थी मैं तुम को देर तक गले लगाता था तुम ख़ुद को मुझ सेे छुड़ाया करती थी मैं कस कर तुम को पकड़े रखता था जब तुम मुझ सेे मिलने आया करती थी कितनी प्यारी प्यारी बातें किया करते थे मन करता है वो लम्हें वो यादें वो दिन फिर से आ जाए फिर से हम वही शा में वही दिन वही मुलाक़ातें वही ज़िन्दगी जिएँ
Rohit ydv
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