"काश" काश तुम को बता पाता तुम्हें कितना प्यार करता हूँ कितना सोचता हूँ कितना चाहता हूँ काश तुम्हें मैसेज कर सकता कॉल कर सकता तुम्हें मना पाता तुम्हारे पास आ पाता काश तुम्हें पास बुला के समझा पाता डाँट कर तुम्हें गले लगा पाता तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँभाल पाता तुम्हारे होंठों को चूम पाता काश बता पाता कितना प्यार करता हूँ कितना डरता हूँ तुम्हें खोने से कितना परेशान करती हो तुम कितना लड़ती हो तुम कितना सताती हैं तुम्हारी यादें काश बता पता कितनी ख़ूब-सूरत हो तुम तुम्हारे गाल पर वो तिल तुम्हारे गर्दन का वो तिल तुम्हारे काले बाल तुम्हारी काली आँखें तुम्हारी लंबी ज़ुल्फ़ें काश तुम्हें बता पता कितना प्यार करता हूँ तुम्हें
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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"ख़ुदा का सवाल" मेरे रब की मुझ पर इनायत हुई कहूँ भी तो कैसे इबादत हुई हक़ीक़त हुई जैसे मुझ पर अयाँ क़लम बन गई है ख़ुदा की ज़बाँ मुख़ातिब है बंदे से परवरदिगार तू हुस्न-ए-चमन तू ही रंग-ए-बहार तू में'राज-ए-फ़न तू ही फन का सिंगार मुसव्विर हूँ मैं तू मेरा शाहकार ये सुब्हें ये शा में ये दिन और रात ये रंगीन दिलकश हसीं क़ायनात कि हूर-ओ-मलाइक व जिन्नात ने किया है तुझे अशरफ़ उल मख़लुक़ात मेरी अज़मतों का हवाला है तू तू ही रौशनी है उजाला है तू ये दुनिया जहाँ बज़्म-आराइयाँ ये महफ़िल ये मेले ये तन्हाइयाँ फ़लक का तुझे शामियाना दिया ज़मीं पर तुझे आब-ओ-दाना दिया मिले आबशारों से भी हौसले पहाड़ों मैं तुझ को दिए रास्ते ये पानी हवा और ये शम्स-ओ-क़मर ये मौज-ए-रवाँ ये किनारा भँवर ये शाख़ों पे ग़ुंचे चटकते हुए फ़लक पे सितारे चमकते हुए ये सब्ज़े ये फूलों भरी क्यारियाँ ये पंछी ये उड़ती हुई तितलियाँ ये शो'ला ये शबनम ये मिट्टी ये संग ये झरनों के बजते हुए जलतरंग ये झीलों में हँसते हुए से कँवल ये धरती पे मौसम की लिक्खी ग़ज़ल ये सर्दी ये गर्मी ये बारिश ये धूप ये चेहरा ये क़द और ये रंग-ओ-रूप दरिंदों चरिंदों पे क़ाबू दिया तुझे भाई देकर के बाज़ू दिया बहन दी तुझे और शरीक-ए-सफ़र ये रिश्ता ये नाते घराना ये घर कि औलाद भी दी दिए वालिदैन अलिफ़ लाम मिम क़ाफ़ और ऐन ग़ैन ये अक़्ल-ओ-ज़हानत शु'ऊर-ओ-नज़र ये बस्ती ये सहरा ये ख़ुश्की ये तर और उसपर किताब-ए-हिदायत भी दी नबी भी उतारे शरी'अत भी दी कि ख़बरें सभी कुछ हैं तेरे लिए बता क्या किया तू ने मेरे लिए
Abrar Kashif
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भारत के ऐ सपूतो हिम्मत दिखाए जाओ दुनिया के दिल पे अपना सिक्का बिठाए जाओ मुर्दा-दिली का झंडा फेंको ज़मीन पर तुम ज़िंदा-दिली का हर-सू परचम उड़ाए जाओ लाओ न भूल कर भी दिल में ख़याल-ए-पस्ती ख़ुश-हाली-ए-वतन का बेड़ा उठाए जाओ तन-मन मिटाए जाओ तुम नाम-ए-क़ौमीयत पर राह-ए-वतन में अपनी जानें लड़ाए जाओ कम-हिम्मती का दिल से नाम-ओ-निशाँ मिटा दो जुरअत का लौह-ए-दिल पर नक़्शा जमाए जाओ ऐ हिंदूओ मुसलमाँ आपस में इन दिनों तुम नफ़रत घटाए जाओ उल्फ़त बढ़ाए जाओ 'बिक्रम' की राज-नीती 'अकबर' की पॉलीसी की सारे जहाँ के दिल पर अज़्मत बिठाए जाओ जिस कश्मकश ने तुम को है इस क़दर मिटाया तुम से हो जिस क़दर तुम उस को मिटाए जाओ जिन ख़ाना-जंगियों ने ये दिन तुम्हें दिखाए अब उन की याद अपने दिल में भुलाए जाओ बे-ख़ौफ़ गाए जाओ ''हिन्दोस्ताँ हमारा'' और ''वंदे-मातरम'' के नारे लगाए जाओ जिन देश सेवकों से हासिल है फ़ैज़ तुम को इन देश सेवकों की जय जय मनाए जाओ जिस मुल्क का हो खाते दिन रात आब-ओ-दाना उस मलक पर सरों की भेटें चढ़ाए जाओ फाँसी का जेल का डर दिल से 'फ़लक' मिटा कर ग़ैरों के मुँह पे सच्ची बातें सुनाते जाओ
Lal Chand Falak
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नज़्म: उस की याद मेरा कमरा उस की याद दिलाता है वो जब भी आती है पहले गले लगाती है मैं बस उस का इंतिज़ार करता हूँ वो है कि इतनी दूर से आती है मैं बस उस को देखता रहता हूँ वो मुझ को सब कुछ समझाती है मैं बस उस की हाँ में हाँ मिलाता हूँ वो मुझ को सब कुछ बताती है मैं तो बस उस को छूना चाहता हूँ वो मुझ को बोसा देकर जाती है मैं तो बस उस को जाते हुए देखता हूँ वो है कि उसे तो जाना भी होता है मैं हूँ कि मैं कुछ नहीं करता हूँ वो है कि उसे सब कुछ करना होता है मुझे तो बस नाराज़ होना होता है उसे तो रिश्ता भी बचाना होता है मेरा कमरा उस की याद दिलाता है वो जब भी आती है पहले गले लगाती है
Rohit ydv
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“हमारा मिलना” जब तुम मुझ सेे मिलने आती थी मैं कितना बेसब्री से इंतिज़ार करता था जब तुम मेरे पास आ जाती थी मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगता था जब तुम पास मेरे बैठा करती थी मैं बस तुम को ही देखता रहता था तुम धी में से मुस्कराया करती थी तुम उस वक़्त बहुत ही प्यारी लगती थी ऐसा लगता था ये लम्हा यहीं थम जाए मैं धीरे से तुम सेे बोला करता था तुम प्यार से जवाब दिया करती थी जब मैं नाराज़ हो जाता था तब तुम मुझे प्यार से मनाती थी मैं तुम सेे न जाने क्या क्या पूछता था तुम सब कुछ प्यार से समझाती थी तुम कितने शांत सी बैठा करती थी मैं कितना परेशान किया करता था जब तुम प्यार से गाल को चूमती थी मुझे बहुत बहुत बहुत अच्छा लगता था तुम बस एक घंटे के लिए आया करती थी मैं तुम्हारे होंठों को कितनी बार चूमता था तुम कभी कभी मेरी गोद में बैठा करती थी मेरा मोबाइल बच्चों की तरह चलाया करती थी जब तुम घर को वापस जाया करती थी मैं तुम को देर तक गले लगाता था तुम ख़ुद को मुझ सेे छुड़ाया करती थी मैं कस कर तुम को पकड़े रखता था जब तुम मुझ सेे मिलने आया करती थी कितनी प्यारी प्यारी बातें किया करते थे मन करता है वो लम्हें वो यादें वो दिन फिर से आ जाए फिर से हम वही शा में वही दिन वही मुलाक़ातें वही ज़िन्दगी जिएँ
Rohit ydv
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"ज़िंदगी उस के साथ" हम उस के साथ जीना चाहते हैं हमें उस के साथ ज़िंदगी जीना है हम उस के साथ रहना चाहते हैं हमें उस की यादों में जीना है हम उस के साथ खोना चाहते हैं हमें उस के ख़्वाबों में खोना है हम उस के साथ बैठना चाहते हैं हमें उस की आँखों में डूबना है हम उस के साथ खेलना चाहते हैं हमें उस की ज़ुल्फ़ों से खेलना है हम उस के बालों को चेहरे से हटाना चाहते हैं हमें उस के गर्दन के तिल को देखना है हम उस के साथ मुस्कुराना चाहते हैं हमें उस का चेहरा देख कर मुस्कुराना है हम उस के साथ शादी करना चाहते हैं हमें उस को अपनी दुल्हन बनाना है हम उस के साथ खाना बनाना चाहते हैं हमें उस के हाथों से बना खाना है हम उस के साथ खाना चाहते हैं हमें उस के नाज़ुक हाथों से खाना है हम उस के साथ शा में बिताना चाहते हैं हमें उस के साथ चाँद को देखना है हम उस के साथ चलना चाहते हैं हमें उस का हाथ पकड़ कर चलना है हम उस के होंठों को चूम कर जाना चाहते हैं हमें उस के हाथों से मीठा खाके जाना है हम उस के साथ सोना चाहते हैं हमें उस की बाँहों में सोना है हम उस के साथ उठना चाहते हैं हमें उस का चेहरे देख कर उठना है हम उस के साथ चाय पीना चाहते हैं हमें उस के गाल को चूम कर पीना है हम उस के साथ कुछ ख़रीदना चाहते हैं हमें उस के लिए झुमका पायल साड़ी सब ख़रीदना है हम उस के साथ चुप रहना चाहते हैं हमें उस की गोद में सर रख कर दुख बाँटना है हम उस के साथ गले लगना चाहते हैं हमें उस के आते ही उस का माथा चूमना है हम उस के साथ घंटो बातें करना चाहते हैं हमें उस को गोद में बिठा कर उस की बातें सुनना है हम उस के साथ तैयार होना चाहते हैं हमें उस को साड़ी बिंदी में देखना है हम उस सेे साथ लड़ना चाहते हैं हमें उस को परेशान कर के मनाना है हम उस के साथ नाम बनाना चाहते हैं हमें उस के नाम से अपना नाम जोड़ना है हम उस के साथ जीना चाहते हैं हमें उस के साथ ज़िंदगी जीना है
Rohit ydv
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