nazmKuch Alfaaz

"दस्तक" बाहर कौन है कोई भी तो नहीं ऐसा लगा जैसे किसी ने दस्तक दी देखो क्या रह गई कोई खिड़की खुली चलो चराग़ बुझा दो रखा है क़रीब ही सोने के वक़्त यहाँ आएगा कौन ही तुम जगा देना मुझे जो सुनो दस्तक कोई पानी रख लिया क्या हाँ, और दवाई भी अब मैं जो सोचती हूँ कह देते हो तुम वही झूठ कहते हैं सब चार दिन की ज़िन्दगी सत्तर बरस के हम साथ हैं आज भी

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई

Kaifi Azmi

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"उस की ख़ुशियाँ" सारी झीलें सूख गई हैं उस की आँखें सूख गई हैं पेड़ों पर पंछी भी चुप हैं उस को कोई दुख है शायद रस्ते सूने सूने हैं सब उस ने टहलना छोड़ दिया है सारी ग़ज़लें बेमानी हैं उस ने पढ़ना छोड़ दिया है वो भी हँसना भूल चुकी है गुलों ने खिलना छोड़ दिया है सावन का मौसम जारी है या'नी उस का ग़म जारी है बाक़ी मौसम टाल दिए हैं सुख कूएँ में डाल दिए हैं चाँद को छुट्टी दे दी गई है तारों को मद्धम रक्खा है आतिश-दान में फेंक दी ख़ुशियाँ दिल में बस इक ग़म रक्खा है खाना पीना छोड़ दिया है सब सेे रिश्ता तोड़ दिया है हाए क़यामत आने को है उस ने जीना छोड़ दिया है हर दिल ख़ुश हर चेहरा ख़ुश हो वो हो ख़ुश तो दुनिया ख़ुश हो वो अच्छी तो सब अच्छा है और दुनिया में क्या रक्खा है ये सब सुन कर ख़ुदा ने बोला बोल तेरी अब ख़्वाहिश क्या है मैं ने बोला मेरी ख़्वाहिश मेरी ख़्वाहिश उस की ख़ुशियाँ ख़ुदा ने बोला तेरी ख़्वाहिश मैं फिर बोला उस की ख़ुशियाँ इस के अलावा पूछ रहा हूँ मैं ने बोला उस की ख़ुशियाँ अपने लिए कुछ माँग ले पगले माँग लिया ना उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ

Varun Anand

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मैं सपनों में ऑक्सीजन प्लांट इंस्टॉल कर रहा हूँ और हर मरने वाले के साथ मर रहा हूँ मैं अपने लफ़्ज़ों के जरिए तुम्हें साँसों के सिलेंडर भेजूँगा जो तुम्हें इस जंग में हारने नहीं देंगे और तुम्हारी देखभाल करने वालों के हाथों को काँपने नहीं देंगे ऑक्सीजन स्टॉक ख़त्म होने की ख़बरें गर्दिश भी करें तो क्या मैं तुम्हारे लिए अपनी नज़्मों से वेंटीलेटर बनाऊँगा अस्पतालों के बिस्तर भर भी जाएँ कुछ लोग तुम सेे बिछड़ भी जाएँ तो हौसला मत हारना क्यूँँकि रात चाहे जितनी मर्ज़ी काली हो गुज़र जाने के लिए होती है रंग उतर जाने के लिए होते हैं और ज़ख़्म भर जाने के होते हैं

Tehzeeb Hafi

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"हब्स" अब तो लौट आओ बीत गए दिन, मह-ओ-साल तुम इसे खेल समझती हो पस-ए-पर्दा तुम हो ना अब तो बाहर निकल आओ ऐसे कौन याद करता है रोज़ किसी का नाम तस्बीह में कौन पढ़ता है कहीं भूल न जाऊँ तुम्हें फ़क़त इतना ही याद आओ किसी रोज़ तुम्हें ख़त लिखूँगा जिस में सिर्फ़ अपना पता लिखूँगा कोई जवाब नहीं चाहिए तुम सेे बस इतना चाहिए ही तुम सेे ढूँढती हुई तुम ख़ुद आओ अब ख़ल्वत में हब्स है देखो मेरा क्या हश्र है तुम्हारा ख़ुदा का ओहदा है मेरे फ़ायदे का सौदा है तुम थोड़ा ज़क उठाने आओ मैं किस की दस्तरस में हूँ तुम्हें इल्म है हर चीज़ का तुम तो सब कुछ जानती हो तुम किस की दस्तरस में हो उस का नाम ही बताने आओ शायद ये आख़िरी नज़्म हो शायद ये आख़िरी ज़ख़्म हो शायद सब कुछ ख़त्म हो तुम्हारा आना न फ़िज़ूल हो सो यूँँ करो तुम मत आओ

Rahul

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"सफ़र" किन्हीं दिनों मैं दरिया हुआ करता था साहिल हुआ करता था एक नाव मेरे साथ सफ़र करती मेरे पास ठहरती थी

Rahul

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"बहाने" क्यूँ आए हो तुम मेरी गली में गाँव में क्यूँ बैठे हो यहाँ मंदिर की छाँव में जहाँ समन के फूल हैं भीड़ है और तुम हो तुम्हारी नज़र में क्या है मेरी नज़र में तुम हो अभी तो हम-तुम मिले भी नहीं हैं अभी मैं ने तुम सेे कुछ कहा भी नहीं है और तुम हो कि उठकर जाने लगे हो कितने झूठे बहाने बनाने लगे हो तुम जा तो रहे हो मगर सुनते जाओ लौट कर जब कभी तुम वापस आओ तो ये न पूछना क्यूँ जाते हुए देखती रही तुम्हें मैं मुस्कुराते हुए

Rahul

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"इंतिज़ार" जब कभी बारिश ज़मीं को छूती है मुझे याद आता है वो वक़्त जब हम दस क़दम की दूरी पर रहते थे दस क़दम की दूरी अब दो सौ दस मील में बदल गई है वो सब कुछ बदल गया है जो सोचा भी नहीं था क्या तू भी बदल गई है अगर हाँ तो उन मसाइल को समझ वक़्त रहते जिन का हल न मिला मुझे मुझे अफ़सोस भी है कि एक लफ़्ज़ भी न कहा तुझ सेे इतना डर लगता था मुझे मैं जानता हूँ मोहब्बत डरने वालों का काम नहीं है ख़बर तुझे भी है ख़बर मुझे भी है मेरी मोहब्बत नाकाम नहीं है नाकाम तो मैं हूँ दुनिया की नज़र में कच्चा घर जिस के सामने कच्ची गलियाँ तेरे शौक़ के लिए यहाँ कुछ भी नहीं है हाँ मगर ज़रूरत का सब सामान है काग़ज़, क़लम, शजर, महकती कलियाँ वो कलियाँ जिन्हें कब से तेरे एक लम्स की दरकार है वो शजर जो बूढ़ा हो गया है उस सेे कहा था कभी किसी ने प्यार तो इंतिज़ार है

Rahul

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"मुझे नहीं मालूम" मुझे नहीं मालूम क्या आबाद करेगा ये शौक़-ए-सुख़न मुझे बर्बाद करेगा मेरा साया तो स्याह तमस है मेरा परतव आख़िर किसे रौशन करेगा ज़िंदा मख़्सूस नहीं किसी के लिए जाने के बा'द कौन याद करेगा सही कहा था लिखना छोड़ दो माना लोग पढ़ेंगे समझा कौन करेगा

Rahul

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